बिखरने लगा सामाजिक तानाबाना, कैशलेस दरअसल फेसलेस लेन देन है
सबिता बिश्वास

हड़प्पा मोहनजोदोड़ो समय से भारतीय सभ्यता में सामाजिक जीवन बेहद महत्वपूर्ण रहा है और सामाजिक तानाबाना राजनैतिक उथल पुथल से टूटा कभी नहीं है।
नगर सभ्यता हो, या आरण्यक सभ्यता हो या फिर ग्राम सभ्यता याआधुनिक महानगरीय सभ्यता, विभिन्नताओं विविधताओं के बावजूद तरह तरह के संकट के मध्य सामजाजिक संबंधों में कोई फर्क नहीं पड़ा है।
भारतीय अर्थव्यवस्था दरअसल इसी सामाजिक तानाबाना के मुताबिक चलती रही है। इसमें उत्पादन प्रणाली, उत्पादन संबंधों, हाट बाजार का भारी योगदान रहा है।
हाट बाजार चौपाल का विस्तार रहा है जहां दूर दराज के लोगों के बीच संवाद का सिलसिला बना रहा है।
भारत में बाजार सामाजिक संबंधों का ही विस्तार रहा है। मुक्तबाजार और खुली अर्थव्यवस्था के बावजूद वह पंरपरा अटूट रही है।
हमारे यहां भिन्न भिन्न आस्थाओं के कर्मकांड जितने धार्मिक हैं, उससे कहीं ज्यादा लोक रीति रिवाज है। इसलिए अलग अलग जनपदों और भाषा क्षेत्र में ये कर्म कांड और अनुष्ठान भिन्न भिन्न होते हैं।
महानगरीय सभ्यता के चपेट में जनपदों और देहात के आधुनिकीकरण के बावजूद वह लोकजमीन खत्म हुई नहीं है।

इसी वजह से बाजार में भी आम आदमी को जान पहचान के चेहरे की खोज ज्यादा जरूरी लगती है।
जैसे तीसरी कसम में गाड़ीवान हीरामन का मन है, बहुत हद तक अत्याधुनिक भारतीय नागरिक का दिलोदिमाग वैसा ही है।
चेहरा पहचाने बिना, बिना जान पहचान के बाजार में हो या मंडियों में, खरीद फरोख्त में लोगों को हिचकिचाहट होती है।
इसी वजह से लोग अब भी शापिंग माल की बजाय मोहल्ले के किराने की दुकान पर महानगरों और उपनगरों में भी ज्यादा भरोसा करते हैं, क्योंकि किराने के दुकानदार से व्यावसायिक संबंधों के अलावा उनके सामाजिक संबंध भी होते हैं।
गांवों में अभी अमीर-गरीब विभाजन उस तरह काम नहीं करता, जैसा कि शहरों में।
जात-पांत के बावजूद मुंहबोले रिश्ते बने रहते हैं। लोग बाजार में जाकर एक ही सब्जी वाले, मछली वाले, फल वाले, दूध वाले, ठेले वाले, हाकर, फेरी वाले से सौदा करने के अभ्यस्त हैं। इन तमाम लोगों के साथ उनके सामाजिक संबंध भी बने रहते हैं।

मुक्त बाजार ने ईटेलिंग के मार्फत वह खुदरा बाजार खत्म कर दिया है।
उत्पादन प्रणाली सिरे से ध्वस्त हैं जिससे उत्पादन संबंधों की बुनियाद पर सामाजिक ताना बाना रहा है, वह आहिस्ते-आहिस्ते खत्म होता जा रहा है।
ऐसा जाहिर है कि गांव देहात में भी हो रहा है।
बुनियादी जरूरतों के लिए, बुनियादी सेवाओं के लिए हम चुनिंदा चेहरों पर अब तक निर्भर रहे हैं, जिनके साथ हमारे कामचलाऊ संबंध रहे हैं।
अब यह कैशलेस लेनदेन दरअसल फेसलेस लेन देन है।
क्योंकि हाट बाजार का खुदरा कारोबार खत्म है। मनुष्य नहीं कंपनियों पर हमें निर्भर होना है बुनियादी जरूरतों और बुनियादी सेवाओं के लिए, जिनमें किसी व्यक्ति के साथ हमारे कामचलाउ संबंध नहीं हो सकते।
हम ताजिंदगी जिनके भरोसे बाजार में लेनदेन करते हैं, एक मुश्त उन सभी का कत्लेआम हो गया है।
आइये हम दो मिनट का मौन करोड़ों उन मृत परिजनों की आत्माओं की शांति के लिए और दो मिनट का मौन भारतीय सभ्यता की सामाजिक विरासत के लिए रखें।