ग्लोबल स्वरूप ले चुका बिरहोर का गांव
गमला जिला के विशुनपुर से 4 किलो मीटर अन्दर बिरहोर का एक टोला पगडंडी से हो कर जहनगुटूआ में बसा है आदिम जनजाति बिरहोर के एकलवता टोला जिसमें 35 से 40 घर,
आदिमजनजाति बिरहोर ने कड़ी मेहनत से बदल दिया अपनी बिरहोर टोली का जीवन।
सन् 1955 से ये आदिमजनजाति गुमला के जहनगूटूआ पंचायत हेलता बिशूनपूर के 5 कि0 मि0 अंदर के गांव में निवास करती है। उस वक्त वन छोड़कर उनके पास जीविका का कोई आधार नहीं था। वन घना और वन जीव के संख्या वन के अंदर अधिक थी। लोग शिकार करने की कला में पारंगत थे। वन से फल फूल तोड़ कर अपनी आजीविका चलाते थे। घर गुगू पतों से बना कर रहते हैं। अपनी तमाम परम्परागत व्यवस्था के साथ अपने समुदाय के साथ जीवन यापन करते थे। वन माफियाओं का वन में लकड़ी का दोहन तेजी से होने लगा वन कटने लगे और वनजीव कम पड़ने लगे, ऐसी स्थिति में उनके पास जीविका का संकट उत्पन्न हो गया। गांव में लोगों ने पलायन करना शुरू कर दिया। स्थिति यहां तक आ पहुंची कि आदिमजनजाति बिरहोर के भूखों मरने की स्थिति उत्पन्न हो गयी। अपने समय के संघर्ष के साथ कड़ी मेहनत से बिरहोर समुदाय ने अपने जीवन में बदलना शुरू किया। 1981- 82 आते-आते बिरहोर समुदाय वन से निर्भरता समाप्त कर दी और श्रम की निर्भरता की ओर बढ़ते चले गये। अपने पूर्वजों के बल पर अपने गांव को सजाना संवारना शुरू कर दिया। विकास भारती ने बिरहोर समुदाय से सम्पर्क कर उनके जीवन स्तर को सुधारने के लिए सरकार से गुहार लगाई और सरकारी योजना बिरसा आवास से उनकी मुलाकात हुई। बिरहोर अब वो पत्ते वाले घर में नहीं रहते हैं। उनका घर मिटटी का बन चुका है। वे छोटी-छोटी जमीन पर धान का उत्पाद के साथ जानवर रखने लगे हैं। युवा वर्ग मजदूरी करता है। महिलाएं घर और रस्सी बनाने के काम करती हैं। बुजुर्ग मवेशी चराने जंगल में जाते हैं। अपने गांव में खाने वाले पेड़ पौधो के बारे में जानकारी हासिल कर उन्हे अपने हित के लिए प्रयोग करना शुरू किया। गांव की दशा सुघरी और गांव के बाहर लोगों का सम्पर्क हुआ।
बिरहोर समुदाय अब सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए ब्लॉक कार्यालय जाते हैं। गांव में मिटटी का घर और मवेशी और छोटी खेत के अलावा श्रम बेचना रस्सी बना कर बाजार में बेचना उनका पेशा हो गया है।
जेहनगुटूआ में जाने के क्रम पर पता चला कि बिरहोर समुदाय के पास घर के अलावा उनके जीने खाने के लिए उनकी जरूरत का सभी कुछ है। पर उस पर मालिकाना हक नहीं है। कुछ लोगों को सरकार की ओर से वन भूमि पर पट्टा दिया गया है। नये परिवार को नजरअंदाज किये हुए है बिरहोरों की बढ़ती आबादी को देखते हुए एक आंगनबाडी की स्थापना कर दिये गये है जिसमें बिरहोर समुदाय की एक महिला वहां बच्चों को शिक्षा देने का काम करती हैं जिसमें 40 बच्चे हैं। बच्चे उस आंगनबाडी को खीचड़ी स्कूल बोलते हैं। गांव में सर्वशिक्षा अभियान के तहत 5वां कलास तक के बच्चें के लिए स्कूल की व्यवस्था करनी है वह नहीं हो पाया है 1 कि0 मी की दूरी में आदिमजनजाति के आवासीय विधालय है जिसकी स्थिति र्जजर है।
बिरहोर अपना श्रम बेच कर अपने बच्चों को शिक्षा के लिए 4 से 6 कि0 मी0 पैदल पढ़ाने भेजते हैं। जिससे गांव में संजय बिरहोर एक साल पहले सीआरपीएफ में गया है अभी चैन्य में है। गांव का रोल मॉडल है। गांव का पहला लड़का जिसको अपनी मेहनत के बल पर सरकार ने नौकरी दिया है। जबकि 2008 में राज्य सरकार ने आदिमजनजाति समुदाय के शिक्षित लोगों को सीधे नियुक्ति का प्रवधान किया गया था, जिसको गुमला के डीसी आज तक पूरा नहीं कर पाये है।
बिरहोर कॉलनी में बलदिना बिरहोर बी ए फाइनल की छात्रा है और मरकिन बिरहोर इंटर तक पढ़ चुकी है। सलेम बिरहोर मैट्रिक कर के घर में है। इनको नौकरी नहीं मिली है।
गांव के विजय बिरहोर ने बताया कि सरकार डीसी और डीडीसी बिरहोर का विकास नहीं चाहते हैं। वे चाहते तो गांव शिक्षित युवाओं को नौकरी मिलती। यहां की डीसी ने पूरे गुमला में एक भी बिरहोर को सरकारी नौकरी नहीं दिया है। लम्बे समय से 32 कि0लो0 चावल और 4 लिटर मिट्टी तेल दे रही है। परिवार बढ़ रहा है। वन भूमि पर पट्टा नहीं दिया। हमारे पास परिवार चलाने के लिए श्रम बेचने के अलावा कोई दूसरा कोई विकल्प नहीं है। चावल लाने के लिए हमें खुद भाड़ा लग जाता है। वनभूमि में दावा पत्र भरने के लिए ब्लॉक कार्यालय जाना पड़ता है उसके लिए भी खर्च करना पड़ता है। एक दिन में सरकार काम नहीं करती है। और सरकार वन भूमि दे भी देगी तो सिंचाई के लिए पानी कहां से लाएंगे।
बिरहोर कॉलोनी में स्वास्थ्य की कोई व्यवस्था नहीं है। स्वास्थ्य समस्या आने पर खुद से इलाज के लिए बाहर निकल कर इलाज कराते हैं।
जितेन्द्र पाहन बिरहोर टोली सामाजिक काम के साथ जुड़े हैं। उन्होंने बताया कि बिरहोर के नाम पर कई योजना चलती है। सरकार के उदासीन रवैये के कारण इसका लाभ बिरहोर समुदाय नहीं उठा पा रहा। बिरहोर के पास भोजन का संकट है, वे दिन भर मेहनत मजदूरी कर जीवन चला रहे हैं। आदमी की एक मात्र जरूरत चावल नहीं। एक आदमी के जीवन में कई जरूरत हैं, जिसकी पूर्ति का एक छोटा सा भाग भी सरकार पूरा करती तो बिरहोर को दिशा मिलती, पर सरकार ने कभी चाहा ही नहीं।
बिरसा आवास, बिरहोर की जरूरत है तो समस्या भी- आदिम जनजाति के बिरहोर समुदाय को बिरसा आवास मिला। जिनका आवास पक्का का उसके लिए अब वह समस्या बन गया है। आवास में टूट-फूट हो जाए तो उनके पास सीमेंट बालू लाने के लिए पैसा नहीं है। वे किसी तरह मिट्टी से उसकी मरम्मत करते हैं। बारिश और ठंड में समस्या हो जाती है ऐसी स्थिति में खपड़ा और मिट्टी के बने घर ज्यादा उपयोगी हैं। सरकार इन दिनों टीन की चादर के शीट छत पर डाल रही है जिससे गरमी के दिनों में गरमी अधिक लगती है। बारिश के दिनों में आवाज अधिक आती है और ठंड के दिनों में ठंड अधिक लगती है।
बिरहोर का घर बनता जरूर है पर उसका समय-समय पर मैंटीनेन्स नहीं होता है। जिससे कई बिरहोर के घर टूट-फूट गया है। बनाने का प्रावधान नहीं है।
बिरहोर महिला की स्थिति सबसे दयनीय
मंजू बिरहोर, मंजू बिरोहर, सरस्वती बिरहोर, रीमा बिरहोर, से करीब 2 घंटे तक बातचीत के क्रम में उसने अपने समुदाय की औरतों की स्थिति के बारे में बताया कि हम अपने समुदाय में रहते हैं। हमने बाहर की दुनिया नहीं देखी है। हमारे पास पूरे दिन और आधी रात का काम होता है। अपने घर के बच्चों के लालन-पालन के अलावा जंगल से वन उत्पादन को लाकर घर में जमा करते हैं। घर के लिए खाना बनाना घर की सफाई, पति की देख भाल के अलावा घर का खर्च चलाने के लिए औरतें रस्सी बना कर परिवार को सहयोग करती हैं। औरतें दिन के खाली समय में सीमेंट के बोरा को जमा कर उससे रस्सी बनाने का काम करती हैं, जिसे सप्ताहिक हाट में बेच कर दिन भर में 70 से 80 रूपये कमाते हैं। इससे कभी कभी साग सब्जी के अलावा बच्चों के कपड़े दवा और कुछ अन्य जरूरी समान खरीदते हैं।
चुनाव नहीं जानती हैं, पर मंजू बिरोहर सरस्वती बिरहोर रीमा बिरहोर और गांव की सभी महिलाएं चुनाव आने पर वोट डालने जाती हैं। पर उन्हों नहीं पता कि सरकार क्या होती है। सरकार का मतलब वे ब्लॉक कार्यालय ही जानते हैं। प्रधानमंत्री कौन है झारखण्ड राज्य का मुख्य मंत्री कौन है। इनका कहना है हम पढ़े नहीं है इसलिए जानते नहीं है शायद राजनीतिज्ञ को जानने के पढ़ा लिखा होना जरूरी नहीं है। इन लोगों ने कहा चुनाव के समय आने से गांव में चर्चा होती है और स्कूल में जाकर वोट डालते हैं, पर मेरे वोट से क्या होता है, नहीं जानती हैं। इन महिलाओं की बाहर की दुनिया से कोई मतलब नहीं इनकी दुनिया जंगल और घर है इसके अलावे अपने मां के घर जाते हैं। मां के घर से वापस अपने पति के घर आती है। ये लोग नहीं जानते हैं, रांची कहां है। गांव में रांची की चर्चा होती है, पर वह कहां है, नहीं पता। औरतों के अधिकार के बारे में कोई जानकारी नहीं। गांव से बाहर निकलती नहीं। गांव के ग्राम सभा होती है, वहां जाती हैं पर कुछ नहीं बोलती हैं। उनका मानना है ग्राम सभा हमारी बातो को नहीं सुनेगी।
युवाओं के बल पर टिका है बिरहोर का जीवन- 10 से 12 युवाओं का एक समूह जेहनगुटूआ में है। ये युवा के कम शिक्षित हैं। कॉलेज की दूरियां और आर्थिक तंगी के चलते उन्होंने हाई स्कूल और कॉलेज का मुंह नहीं देखा। घर में खाने की समस्या है, जिसकी पूर्ति के लिए वे आने श्रम को बेच कर परिवार चलाने में मदद करते हैं। श्रम की सारी शक्ति युवाओं के ऊपर है। युवाओं ने गांव के लिए श्रम कर रहे उन्हें टेक्टर चलाने का काम सीख लिया है। दूसरे के खेतों में हल चलाने का काम सीख लिया है। वे दिन भर गांव से बाहर ट्रेक्टर चलाकर पैसा कमाते हैं। जहेनगुटूआ में 8 से 10 युवा हैं। जो इस तरह के काम में जुटे हुए हैं। प्रति दिन ट्रेक्टर चलाने का काम करते हैं। उन्होंने यह काम इस लिए चुना कि इसमें लोगों से सम्पर्क के साथ तकनीकी ज्ञान हो सकेगा, साथ में अपने लिए रोजगार के साधन है।
आंगनबाड़ी के 40 बच्चे का भविष्य अंधर में - जेहनगुटूआ में सरकार ने आंगनबाड़ी केन्द्र की स्थापना कर दी है। जहां बिरहोर के 40 बच्चे आते हैं। ये बच्चे 3 साल बाद क्या करेंगे, इनके माता पिता को नहीं पता है। गांव से सरकारी स्कूल की दूरी 4 कि0 मी0 है। बच्चे को सरकारी स्कूल में पढ़ाने के लिए प्रतिदिन 5 रू0 भाड़ा खर्च करना पड़ेगा। यह 5 रूपये कहां से आएंगे। यह सवाल विजय बिरहोर के दिमाग और मन में है। अपने बच्चे को पढ़ाना चाहते हैं। संजय बिरहोर के 3 बच्चे हैं, इनकों स्कूल में पढ़ाने की इच्छा पर 4 कि0मी0 की दूरी बच्चे तय नहीं कर पायेंगे। वहां बच्चे को पहुंचाना पड़ेगा जिसके लिए हमारे पास साधन नहीं है। आने वाली पीढ़ी भी शिक्षा से वंचित ही रहेगी। संजय बिरहोर बताते हैं- हम जब तक आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होगे अपने बच्चों को शिक्षित नहीं कर पाएंगे।
O- आलोका रांची
(सी एस डी एस/ यू एन डी पी फेलोशिप के तहत)

आलोका। लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता व स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। कई फेलोशिप एवं झारखण्ड सरकार द्वारा शोध में प्राप्त एवार्ड साथ ही भारत के महिला आंदोलन से जुड़ी जूडाव, झारखण्ड में विस्थापन आंदोलन के साथ जुड़ाव