जुगनू शारदेय

बिहार की सुशासनी सरकार ने फिर एक छक्का मारा है । यह छक्का पुराने चौकों - छक्कों से अलग होते हुए भी उसी की परंपरा का है । अब बिहार में असंगठित क्षेत्रों के कामगारों को काम पर जाने के लिए सायकिल देने वाली है ।
बिहार की सुशासनी सरकार अण्णा युग के भ्रष्टाचार मार्केटिंग से बाहर निकल कर वह काम कर रही है जिसे करना टीम अण्णा की समझ के बाहर है । अण्णा टीम सफेदपोशों की व्यथा कथा है तो नीतीश कुमार असंगठित क्षेत्र की आवाजाही की तकलीफ को दूर करने की कोशिश कर रही है । हमारे देश की उदारवादी आर्थिक नीति इस असंगठित मजदूर क्षेत्र का इस्तेमाल अपने इंफ्रास्ट्रक्चरीय विकास और निर्माण के लिए तो करती है लेकिन इनकी बुनियादी सुविधा पर ध्यान नहीं देती है । बिहार ने इस पर न केवल ध्यान दिया बल्कि उनकी मेहनत को एक खजाने में बदल दिया है । अब मेहनतकश को उनकी मेहनताना से बनी खजाने की रकम बिहार सरकार उन्हें वापस कर रही है । राजनीतिक मन इसे वोटवादी समझेगा । समाजशास्त्रीय मन तो अण्णा की भ्रष्टाचार लीला प्रदर्शन से गदगद है , उसे यह समझ में ही नहीं आएगा । तो चलिए बता ही दें आपको कि यह छक्का क्या है और किस चालाकी से सुशासनी सरकार ने इस खेल में बिना कुछ किए एक खजाना
बना लिया । यह खजाना बना बिहार में बन रहे मकानों दे । बिहार में नियम है कि दस लाख से ज्यादा खर्च के बनने वाले निर्माण कार्य पर एक प्रतिशत कर देना पड़ता है । यह नियम 2005 से लागू है । इस निर्माण कर ने बिहार के श्रमिक कल्याण बोर्ड के पास लगभग 132 करोड़ जमा करा दिया है । इसी रकम से सायकल बांटी जाएगी । 2010 के विधान सभा चुनावों में नीतीश कुमार की सफलता का एक कारण बालिका सायकल योजना भी मानी जाती है । अब बालकों को भी सायकल दी जाएगी ।
यह तो सबको पता है कि तुलनात्मक दृष्टि बिहार में जमीन और मकान बहुत ज्यादा महंगा होता जा रहा है । इसी के साथ साथ पटना और बिहार अपार्टमेंट का स्लम बनता जा रहा है । बिहार के बारे में कहना तो थोड़ी बहुत सुनी सुनाई बात हो सकती है , लेकिन पटना तो स्लम बनता ही जा रहा है । स्वंय मुख्य मंत्री पटना के बारे में कहते हैं कि कभी भूकंप आया तो क्या हाल होगा उन्हें भी नहीं मालूम । लेकिन अभावग्रस्त राज्य बिहार में पटना में एक डेरा होना आजादी के पहले भी शान की बात मानी जाती थी । अब पटना में अपार्टमेंट होना महान बात मानी जाती है । यह अपार्टमेंट इंट - सिमेंट - सरिया - बालू से नहीं उस मजदूर की मेहनत से बनता है जिसके लिए होते हुए भी कोई अस्पताल नहीं होता है । 1970 के पहले तो असंगठित क्षेत्र के मजदूर की कोई चर्चा भी नहीं होती थी । अंतरराष्ट्रीय मजदूर संगठन के प्रयास से
असंगठित क्षेत्र के श्रमिक की परिभाषा तय हुई । हालांकि यह परिभाषा आज भी भ्रामक है । हमारे देश में तो कुछ ज्यादा ही है क्योंकि सड़क पर बाल श्रमिक का विरोध करने वालों के घर पर भी ' छोटू 'पाया जाता है । बिहार में घरों में काम करने वाले दाई - नौकरों का भी एक संघ है ।
बहरहाल असंगठित मजदूर श्रेणी में आने वाले मजदूर हैं : 1 निर्माण कार्य़ में लगे मजदूरों सहित अनुबंधित श्रमिक 2 गाहे बगाहे काम के मजदूर 3 लघु उद्योग में कार्यरत मजदूर 4 बीड़ी और सिगार मजदूर 5 हैंडलुम - पावरलुम कामगार 6 दुकान और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में काम करने वाले लोग 7 सफाई कर्मचारी और भंगी मजदूर 8 चमड़ा उद्योग में काम करने वाले 9 आदिवासी कामगार और 10 अन्य असुरक्षित श्रमिक । मजे की बात है कि यहां खेतिहर मजदूर को असंगठित मजदूर नहीं माना गया है । बिहार के लाखों रिक्शा चलाने वालों को किस क्षेत्र का मजदूर माना जाएगा , इसकी भी परिभाषा तय नहीं हुई है । बिहार के मुख्य मंत्री के इस नए छक्के के बाद असंगठित क्षेत्र की बिहार में नई परिभाषा गढ़ी जाएगी । पहले भी दलित समुदाय की परिभाषा बनाई जा चुकी है - दलित और महादलित । महादलित में सिर्फ पासवान समुदाय को शामिल नहीं किया गया है । यह एक संयोग ही है कि पासवान समुदाय खेत मजदूर भी है और निर्माण क्षेत्र में भी काम करता है । हालांकि दूसरी तरफ सच यह भी है कि भयंकर बेरोजगारी के कारण बिहार के लगभग सभी समुदाय के लोग असंगठित क्षेत्र के ही मजदूर हैं । बिहार में दैनिक मजदूरी दिल्ली - पंजाब - केरल और ढेर सारे अन्य राज्यों की तुलना में कम है । यही कारण है कि बिहार से बड़ी संख्या में बिहार से बाहर जा कर काम करते हैं । अभी बिहार में असंगठित क्षेत्र में लगभग 21 हजार निबंधित मजदूर हैं । अब सायकल के कारण निबंधित मजदूरों की संख्या में बढ़ोतरी होगी । हालांकि इसमें थोड़ी बहुत गोलमाल की भी गुंजायश है । बहुत सारे लोगों को यह नहीं मालूम कि उनका निबंधन कहां और कैसे होगा । यह भी साफ नहीं हो पा रहा है कि खेतिहर मजदूर इस क्षेत्र में आते हैं या नहीं । निजी क्षेत्र में आपसी मोल भाव से असंगठित मजदूर की दिहाड़ी तय होती है । बिहार सरकार के श्रम विभाग का वेब साइट अपटेटेड नहीं होता है । ऐसी स्थिति में जरूरी हो जाता है कि असंगठित मजदूरों की साफ साफ परिभाषा और उनका दैनिक वेतन सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर आज की महंगाई के अनुसार तय हो । वेब साइट अभी भी बिहार में अजूबा है । इसलिए जरूरी हो जाता है कि समाचार पत्रों में भी इसे प्रचारित किया जा सकता है ।