आशुतोष कुमार

रेप केवल यौन हिंसा नहीं है। वह वर्ग-हिंसा, धर्म - हिंसा और साम्प्रदायिक हिंसा भी है। भारत में रेप सबसे पहले और सबसे ज़्यादा जाति-हिंसा है।

डीका की क्षत-विक्षत लाश आम्बेडकर गर्ल्स होस्टल, हाजीपुर के नाले से बरामद हुई थी। उसके निजी अंगों पर भयानक घाव थे, खून बह रहा था। इसके बाद भी मेडिकल रिपोर्ट कहती है कि रेप सिद्ध नहीं हुआ।

डीका ने माँ को पहले ही बताया था कि कोई टीचर उसे परेशान कर रहा है।

माँ कुसुमा देवी उसे घर ले जाने आईं तो भी डीका को जाने नहीं दिया गया।

माँ कुसुमा देवी का बयान एफ आई आर में शामिल नहीं किया गया।

आरोपी टीचर और जिला वेलफेयर आफीसर का नाम भी शामिल नहीं किया गया।

माँ को एफ आइ आर की कॉपी तक नहीं दी जा रही। सत्रह दिन गुजर गए। कोई गिरफ़्तारी नहीं हुई।

डीका को उसकी निर्भीकता और साहस की सज़ा मिली। उसने इंकार किया, इसलिए दबंगों ने उसे सबक सिखाया। वे दिखा देने पर आमादा हैं कि किसी बेटी ने मना किया तो उसकी कटी फटी लाश नाले में मिलेगी और कोई चूं भी नहीं कर पाएगा।

शायद इसी पर मुहर लगाने के लिए सामाजिक न्याय के पुरोधा शरद यादव कहते हैं कि वोट की इज्ज़त बेटी की इज्ज़त से बड़ी होती है। उस वोट की क्या इज्ज़त है जो दलित बेटी की बर्बर ह्त्या और रेप से शर्मिंदा न हो सके ?

बिहार के दलित छात्रावासों में क्या हो रहा है ? नीतीश-लालू-शरद कुनबे को शर्म क्यों नहीं आ रही ?

डीका की रेप हत्या पर केवल आइसा और माले के ही कार्यकर्ता क्यों सक्रिय दिख रहे हैं ?

फेसबुक के भी सामाजिक क्रांतिकारियों की बोलती क्यों बंद है ?

यह कैसा सामाजिक न्याय है जो डीका के खिलाफ़ दबंगों के साथ खड़ा दिख रहा है ?

महिला आन्दोलन के भीतर इतनी ठंढी खामोशी क्यों है ? महिला-आन्दोलन क्या दिल्ली -मुम्बई-बंगलोर तक सीमित रहेगा। डीका के लिए इंडिया गेट पर मोमबत्तियां भी नहीं मिलेंगी क्या ?