बीती ताही बिसारिए
बीती ताही बिसारिए
जुगनू शारदेय
यह महान वाक्य कम से कम मेरा नहीं है । यह भी तो कहा गया जो बीत गया ,वह बीत गया अब आगे की सुधी लेय । प्रणव बाबू के बजट के पहले हम तिरुवल्लुवर के बारे में जान जाते थे । प्रणव बाबू कोशिश करते हैं कि रवींद्र नाथ ठाकुर और ममता वंद्धोपायय की कविताओं में संतुलन बनाए रखें । यही तो खासियत है उनमें कि वह संतुलन बनाए रख सकते है । प्रणव बाबू के जीवन का भी मूलमंत्र बीती ताही बिसारिए ही है ।
यह बीती ताही बिसारिए उनके भी काम आता है जिनके ऊपर प्रेम रोग बरास्ता भूत वैलेंटाइन आता है । यह बेचारा भूत तो कब का मर खप गया था । पर कुछ लोगों ने इनकी मार्केटिंग करने की सोची । महीने भर पहले से मांग शुरु उपहार की । फिर सिलसिला चलता रहता है । अचानक मार्केटिंग ने बिठा दिया कि 14 फरवरी वैलेंटाइन डे है । तो पकड़े रहो अपने वैलेंटाइन को । जैसे पकड़े हुए हैं निर्वहन कुमार भ्रष्टाचार को ।
दुनिया जानती है कि इमारतें जनता के पैसे से बनती हैं । अपने देश में एक वैलेंटाइन वाली इमारत भी है । उसके बारे में तो साहिर लुधियानवी ने लिख
ही दिया कि यह है हम गरीबों की मोहब्बत का मजाक । निर्वहन कुमार को यह बात कभी समझ मे नहीं आएगी पटना में हर रोज बनता हुआ अपार्टमेंट का स्लम बिहार के गरीबों का है मजाक ।
फिर किसी ने उन्हें गलत जानकारी दी कि भ्रष्टिया नौकरशाह अपार्टमेंट में पूंजी लगा कर उसका भाव बढ़ा रहे हैं । निर्वहन कुमार बुम तो चाहते हैं ,
पर ब्लैकमनी के बिना चाहते हैं । यह तो वही हुआ कि बिना फूल के वैलेंटाइन डे मना लिया जाए ।
हमारी समझ में तो आता ही नहीं कि हम हिंदुस्तानी लोग क्यों वैलेंटाइन डे मनाते हैं । बहुत खोज बीन के बाद पता चला कि संघ परिवार के विरोध के कारण वैलेंटाइन डे मनाते हैं । कल परसो संघपरिवार का विरोध सामने होगा । उन्हें यह भी समझ नहीं होगी कि वैलेंटाइन को समझाएं कि हमारा पूरा वसंत ही वैलेंटाइन है । समझ हो तो , धीरे धीरे उनके सारे मुद्दे हवा हवाई होते जा रहे है ।
हमें तो लगता है कि होली के गीत को संघ परिवार पिछड़ों दलितों का तराना न मान ले । कुछ कताबों में ऐसा लिखा भी है कि वसंत के मदन मे लोग,खास कर सवर्ण दलित – पिछड़ों को छेड़ते थे । घर वर में भी कहा जाता था कि भर फागुन बुढ़वा देवर लागे । और भी किस्से हैं जिन्हें हम सब जानते हैं । एकाध उदाहरण को छोड़ कर हर जगह स्त्री के सेक्सिया – दूधिया अंग पर आंख टिकी होती थी । पर हमारी दिलचस्पी ईश्क – मुश्क में नहीं हैं ।
हम तो बीती ताही बिसारिए के मूड में हैं । यह अच्छी तरह जानते हैं कि हमारा काला धन जहां हैं , वहां से निकल कर कहीं और चला गया होगा । धन का काम ही आना जाना है । रोज नए नए किस्से आएंगे कि कैसे किसी ने सलाह दे कर कुछ कमा लिया । हमने नहीं कमाया तो हमारी बैवकूफी । हमें अब कसम खा लेनी चाहिए कि हम किसी भी भ्रष्टाचार का भडाफोड़ नहीं करेंगे । बशर्ते वह कुछ पत्रम पुष्पम दे रहा हो ।
तो साब मेरी तरफ से वैलेंटाईन का गोभी का फूल ।


