बुआ-बबुआ की ब्लैकमेलिंग के आगे नहीं झुकना चाहिए कांग्रेस को !
बुआ-बबुआ की ब्लैकमेलिंग के आगे नहीं झुकना चाहिए कांग्रेस को !
महागठबंधन से कांग्रेस को अलग करने की बात सुनी जा रही है। सबसे ज्यादा बड़े पैरोकार ही अब बाहर करने की बात कह रहे हैं। थोड़ा गौर से देखिये तो यूपी में भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों में बसपा कुछ नहीं बोल रही है, कांग्रेस चुप है premature बोलने का कोई मतलब भी नहीं होता।
गुजरात में कांग्रेस ने सपा को 5 सीटें दी थीं, जिनके हारने की घोषणा आदरणीय श्री मुलायम सिंह जी ने चुनाव से पहले ही कर दी थी और वो ही हुआ भी। बसपा ने 20 सीटों पर 5 हजार के आस-पास वोट लिए और कांग्रेस वो ही सीटें दो से चार हजार वोटों से हार भी गई और सरकार बनने से भी कांग्रेस 12 विधायकों से चूक गई।
राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में यूपी में गठबंधन करने की एवज में कांग्रेस से जितनी सीटें दोनों ही दल मांग रहे थे, वह जायज नहीं था। इसे ऐसे समझें कि कांग्रेस यूपी में 40 सीटों पर दावा करे। जबकि सपा कहती है कि यूपी में कांग्रेस के लिये दो सीटें ही काफी हैं।
बसपा को सम्मानजनक सीटें चाहिएं, यह एक रहस्यमयी संख्या है।
खैर यह एक हकीकत है कि बसपा या सपा कोई भी इंद्रप्रस्थ में मोदी जी के राजसूय यज्ञ के घोड़े को रोकने में अकेले या दोनों ही मिल कर समर्थ नहीं हैं। कांग्रेस ऐसा कर सकती है, बशर्ते क्षेत्रीय दल उसे सहयोग करें, न कि ब्लैकमेल करें। कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों की जरूरत है तो क्षेत्रीय दलों को भी कांग्रेस की जरूरत है।
छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान में महागठबंधन न होने की एक बड़ी वजह IRCTC मामले में लालू प्रसाद जी को झूठा फंसाने का भी set example था, जिसने कुछ नेताओं की रीढ़ की हड्डी ही सुन्न कर दी थी और जिसकी वजह से उन्हें समझौता करना ही नहीं था। लेकिन ठीकरा कांग्रेस के सर पर ही फोड़ना था।
बहरहाल महागठबंधन यदि नहीं होता है तब भी कोई बहुत चिंता की बात नहीं है। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान के चुनाव के परिणाम निश्चित रूप से एक माहौल बनाने में सहायक होंगे। भाजपा जीती तो मोदी अजेय ही जायंगे, कांग्रेस जीती तो कांग्रेस के प्रति मतदाता में विश्वास लौटेगा।
दावा कोई करता रहे लेकिन लगता नहीं कि सपा या बसपा कोई भी दहाई का अंक किसी भी इन राज्य में छू पाएंगे। कांग्रेस, भाजपा के अलावा अन्य राजनीतिक दलों के हालात ये रहे कि सपा को एलानियाँ कहना पड़ा कि जिनको कांग्रेस से टिकट न मिले वे लोग हमारी पार्टी से टिकट लेकर लड़ लें।
हाँ, बसपा ने अपने विस्तार के लिये हरियाणा में जरूर ताऊ देवीलाल जी के कुनबे से समझौता किया है, राखी भी बंधवाई है और सीनियर सजायाफ्ता चौटाला मायावती जी को प्रधानमंत्री बनाने की कसमें खा रहे हैं, लेकिन उनकी खुद की पार्टी/कुनबे में फूट पड़ी हुई है, आगे की राम जाने।
कर्नाटक में देवेगौड़ा जी की पार्टी व कांग्रेस से बसपा समझौता करके लड़ी थी और वहाँ उनका एक विधायक जीता भी, जो मंत्री बना, लेकिन इन तीनों राज्यों में गठबंधन न होने की स्थिति में उनसे इस्तीफा दिला दिया गया।
अब लौटते हैं यूपी पर।
आज की तारीख में यूपी में कांग्रेस के पास कम से कम 35 ऐसे कद्दावर नेता हैं, जो अपने बलबूते चुनाव लड़ सकते हैं और चुनाव जीतने के प्रबल दावेदार भी हैं। यदि कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ती है और इन 35 में से 15 से 20 सांसद उसके जीत कर आ जाते हैं तो महागठबंधन में तो कुल जमा इतनी सीटें मिलनी भी नहीं है। दूसरे सपा, बसपा जितनी भी सीटें जीत कर ले आएं वे चाहें तो चुनाव बाद UPA में शामिल हो ही सकता है।
अब बात करें असली पेंच की ...
2019 का चुनाव यूपी के दोनों क्षेत्रीय दलों के लिये समस्या नहीं है।
समस्या दो हैं:-
नम्बर एक वोट ट्रांसफर की ~ बसपा का वोट ट्रांसफर हो जाएगा, यह बड़ी संभावना होती है, लेकिन सपा का समर्थक गैर-मुस्लिम वोट बसपा को ट्रांसफर होने से पहले हिन्दू न हो जाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है।
शिवपाल जी का भी factor है, यदि उनसे कोई समझ सपा ने नहीं कायम की तो समझौते का कोई मतलब नहीं रहेगा। जहाँ सपा का प्रत्याशी नहीं होगा वहाँ शिवपाल जी के प्रत्याशी को सपा का वोट चला जाएगा।
नम्बर 2 ~ दोनों ही क्षेत्रीय दल यूपी के हैं, दोनों को ही मुख्यमंत्री की कुर्सी चाहिए। 2019 के बाद तीन साल बचेंगे यूपी विधानसभा चुनाव में, 2019 के गठबंधन में ही यह भी तय होगा कि 2022 में कौन "बड़ा दिल" दिखाएगा और यूपी की गद्दी त्यागेगा!
दोनों ही दल अपनी-अपनी चालाकी में हैं। एक दल कहता है कि बहिनजी को दिल्ली भेजेंगे भैयाजी लखनऊ सम्हालेंगे। हाथी वाले सावधानी बरतते हुए चुप्पी साधे हैं, लेकिन हाथी की चालें भी कम सधी हुई नहीं है। इसलिये कांग्रेस को कोसने से बेहतर है कि जिस स्थानीय गठबंधन को लेकर भुजाएं फड़काई जा रही हैं उस पर सही से होमवर्क करके उसे ही जमीन पर उतार लिया जाए।
कांग्रेस के लिये इस बार गठबंधन न करना यूपी में उसके पुनरुज्जीवन की संभावना को बढ़ाएगा। इस बार जहाँ भी कांग्रेस का प्रत्याशी मजबूती से लड़ेगा, वहाँ परेशान हाल, बेरोजगार, अल्पसंख्यक, पिछड़ा, किसान, मजदूर और दलित और ग्रामीण वोटर उसको वोट करेगा। इन लोगों में कांग्रेस के लिये under current है।
मैं खुद कांग्रेस के यूपी में अकेले लड़ने के पक्ष में हूँ। बाकी जो पार्टी का फैसला होगा वह सर माथे होगा।
(लेखक उप्र पीसीसी के पूर्व सदस्य व भीमनगर जिला कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष हैं। )
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