बेशक, अँधेरा गाढ़ा होता जा रहा है- यह नवआपातकाल है
बेशक, अँधेरा गाढ़ा होता जा रहा है- यह नवआपातकाल है
किशन पटनायक स्मृति व्याख्यान (भाग-1)
वास्तविक लोकतंत्र : सारी सत्ता स्वशासी संस्थाओं को
रविकिरण जैन
‘‘हरेक गाँव में जम्हूरी सल्तनत होगी। उसके पास पूरी सत्ता और ताक़त होगी। यहाँ तक कि वह सारी दुनिया के खि़लाफ़ अपनी हिफाज़त ख़़ु़द कर सके।........ऐसा समाज अनगिनत गाँवों का बना होगा, उसका फैलाव एक के ऊपर एक के ढंग पर नहीं, बल्कि लहरों की तरह एक के बाद एक की शक्ल में होगा। जि़न्दगी मीनार की शक्ल में नहीं होगी, जहाँ ऊपर की तंग चोटी को नीचे के चैड़े पाये पर खड़ा होना होता है। समुद्र की लहरों की तरह जि़न्दगी एक के बाद एक घेरे की शक्ल में होगी और व्यक्ति उसका मध्य बिन्दु होगा।’’
महात्मा गाँधी
हरिजन सेवक: 28.07.1946,
‘‘जागते में फिर से याद आने लगा वह स्वप्न,
फिर से याद आने लगे अँधेरे में चेहरे,
और, तब मुझे प्रतीत हुआ भयानक
गहन मृतात्माएँ इसी नगर की
हर रात जुलूस में चलतीं,
परन्तु, दिन में
बैठती हैं मिलकर करती हुई षड़यन्त्र
विभिन्न दफ़्तरों-कार्यालयों, केन्द्रों में, घरों में
हाय, हाय! मैंने उन्हें देख लिया नंगा,
इसकी मुझे और सज़ा मिलेगी।’’
गजानन माधव मुक्तिबोध
अँधेरे में: 1960
साठ के दशक की शुरुआत में जब गजानन माधव मुक्तिबोध इन पंक्तियों को ‘फाइनल टच’ दे रहे थे, अँधेरा गाढ़ा हो रहा था। इस कविता का शीर्षक भी है ‘अँधेरे में’। तब से आज तक यह कविता हमारे राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य की गवाह बनती गई है। यह कविता अपने गहन अर्थ संकेतों में जितनी 1960 के दशक की है, उससे शायद कहीं ज्यादा 2013-14 की है। बेशक, अँधेरा गाढ़ा होता जा रहा है।
अर्थव्यवस्था चरमरा रही है, धार्मिक और जातीय उन्माद बढ़ रहा है, और ऐसे में समाज किसी तानाशाह मसीहा के इन्तजार में है। हो सकता है 2014 का चुनाव हमारे लिये उन सारी प्रक्रियाओं की तार्किक परिणति लेकर आये, जो प्रक्रियायें 1947 से लेकर आज तक चली हैं और खासकर पिछले पच्चीस वर्षों में जिन्होंने असाधारण रूप से रफ़्तार पकड़ ली है। ज़मीन पर सरकारी और गै़रसरकारी ज़मींदारियां, जंगलों का उजाड़, विशालकाय विनाशकारी बाँध और उनसे उजड़ते आदिवासी, थर्मल पॉवर और न्यूक्लियर पॉवर से ज़हरीली होती हवा, महँगी होती खेती और आत्महत्या करते किसान, विराट महानगर और उनमें पैबन्द की तरह लगती चली जाती झोपड़पिट्टयाँ, असाधारण चमक के साये में पलते अँधेरे, उन अँधेरों में औरतों और बच्चों के पीछे भागते बलात्कारी, बेसहारा बुजु़र्ग और, हाँ, वहाँ नज़र डालिये जहाँ हमारी भविष्य की क्रांति का नायक मजदूर बैठा है - छंटनी का शिकार, राज्य की पुलिस और कंपनी मालिकों के बाउंसरों से मार खाता हुआ! वह गले में गुटखे की माला पहने घूम रहा है।
मामाला इतना ही नहीं है; इस प्रक्रिया के लाभार्थी भी हैं- नौकरशाह, बिल्डर, बड़े व्यापारी,पूँजीपति, नेता, माफिया, मध्यवर्ग, मीडिया मालिक, इज़ी मनी के सैकड़ों नये धंधों के उस्ताद, और हाँ, ‘शासक वर्ग से नाभिनाल बद्ध’ देश के बुद्धिजीवी। ये लाभार्थी मिलकर माहौल बना रहे हैं, उन्हें एक निरंकुश शासक की जरूरत है जो पूँजी की राह में आने वाली सारी चट्टानों को तोड़ दे। जो एक इशारे में सारे संसाधन जुटाकर थैलीशाहों के कदमों पर डाल दे। भारतीय पूँजीवाद को अब एक ज्यादा ‘स़ख्त राज्य’ की ज़रूरत है और 2014 का चुनाव शायद यह रास्ता आसान कर दे। बेलगाम शहरीकरण, विशाल उद्योग, सत्ता और सम्पति का अभूतपूर्व केन्द्रीकरण और इन सबके के लिये ख़ौफनाक कानूनों से लैस मानवाधिकारों को रौंदने वाला राज्य। ‘अँधेरे में’ कविता में मुक्तिबोध ने जिस अँधेरे का जिक्र किया है, वह पूरी तरह से वह अब तारी हो रहा है। यह नवआपातकाल है, जिसने आपातकाल के जुल्मों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। अब सब कुछ कानूनन है - आदिवासियों से उनके जंगल और किसानों से रातों-रात ज़मीन छीन लेना भी कानूनन!
आगे जारी.............


