बैंक कंगाल हो गए, जिसे गरीब लाइन में लगकर अपने पैसे से वापस भर रहे
बैंक कंगाल हो गए, जिसे गरीब लाइन में लगकर अपने पैसे से वापस भर रहे
नोटबंदी के खिलाफ आदिवासियों ने समाजवादी जन परिषद के बैनर तले प्रदर्शन किया।
बैतूल, 1 दिसंबर। नोटबंदी के खिलाफ जिले के आदिवासियों ने समाजवादी जन परिषद के बैनर तले प्रदर्शन किया। इसमें उन्होंने पोस्टर के जरिए सवाल उठाया कि विजय माल्या बैंकों को लूट विदेश भागकर मजे कर रहा है; ऐसे कॉर्पोरेट से बैंकों का बट्टाखाता तीन लाख 71 हजार करोड़ रु. हो गया और बैंक कंगाल हो गए हैं, जिसे गरीब लोग लाइन में लगकर अपने पैसे से वापस भर रहे हैं।
दूसरा, उन्होंने पोस्टर में सवाल उठाया कि रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार 27 नवम्बर तक बैंकों में पुराने नोट जमा हुए 8.45 लाख करोड़ रु. के और उसके बदले दिए 2.16 लाख करोड़ रु.।
यानी रोगी को बचाने के नाम पर उसका खून निकाला चार बोतल और नया चढ़ाया एक बोतल, तो रोगी कैसे बचेगा।
सजप के प्रदेश उपाध्क्ष राजेन्द्र गढ़वाल ने बताया कि आदिवासियों पर रोजी-रोटी का भारी संकट आ गया है। ऊपर से नई फसल ना बो पाने और बैंकों की कर्जवसूली का खतरा अलग।
आदिवासियों ने उपरोक्त पोस्टर ले प्रदर्शन के बाद राष्ट्रपति के नाम संबोधित ज्ञापन कलेक्टर को सौपा।
आदिवासियों ने बताया कि 8 नवम्बर को जो नोटबंदी का फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने लिया है, उसने हम आदिवासियों का भारी नुकसान किया है। सुना है, यह कालाधन खत्म करने के लिए किया गया है; हम लोगों के पास तो धन ही नहीं होता है, तो फिर कालाधन तो बहुत दूर की बात है। लेकिन, जो सेठ लोग हमारी फसल खरीदते थे, उनके पास नया पैसा नहीं है, इसके कारण 12 रु. किलो बिकने वाला मक्का 8 रु. किलो बिक रहा है। तीन साल बाद अच्छी फसल आई थी, सोचा था इस साल कुछ कमाई होगी। हम तो मजदूरी पर पल जाते; लेकिन, अब तो मजदूरी भी नहीं मिल रही है। हम पर रोजी-रोटी का संकट मंडरा रहा है। और, इस नोटबंदी से लम्बे समय बाद हमारा जो विश्वास भारतीय मुद्रा में लेन-देन करने के प्रति बैठा था, उसे भी हिलाकर रख दिया।
उन्होंने कहा हम, पहले तो वस्तु-विनिमय या अट्टा-सट्टानोट पद्धति से लेन-देन करते थे।
लेन-देन समझने में हमारी कई पीढ़ियां निकल गई; हमें बहुत लूटा गया। अब सुना है: आपकी सरकार नगदी में लेनदेन की बजाए मोबाईल और कोई अन्य माध्यमों से लेन-देन करने की बात कर रही है। इसे सीखने में हमें फिर कई पीढ़ियां निकल जाएंगी। और हम बार फिर पिछड़ जाएंगे।
आदिवासियों ने मीडिया को बताया कि उनके पुराने नोट 300 और 400 में चले। नए दो हजार के नोट तो छोड़े, 5 सौ के छुट्टे मुश्किल हो रहे हैं। अगर सरकार को गरीब की फ़िक्र है और कालाधन मिटाना है, तो सबसे पहले 100 रु. के नए नोट छापना था।
होशंगाबाद जिले से आई गुलिया बाई ने बताया कि उन्हें तो नोट गिनना सीखने में लम्बा समय लगा, और अब सरकार मोबाइल से भुगतान की बातें कर रही है, उससे तो उनकी लूट बढ़ेगी।
आदिवासियों ने राष्ट्रपति को संबोधित ज्ञापन में मांग की है:
अगर नगदी का चलन कम करना या खत्म करना है, तो सरकार हमारे परम्परागत वस्तु-विनिमय की पद्धति को बढ़ावा दे।
रोजी-रोटी के संकट से निपटने के लिए गाँव-गाँव में काम खोले।
हमारी मक्का आदि की फसल खरीदने काम सरकार करे।
नोटबंदी के चलते तो जो लोग बैंकों का कर्जा नहीं चुका पाएंगे, या बिजली का बिल बकाया नहीं भर पाएंगे, उन्हें कर्ज और बिल में माफी दी जाए। अगर सरकार कंपनियों का साढ़े तीन लाख करोड़ से ज्यादा बट्टे खाते में डाल, उनके
गरीब और अमीर के बीच खाई नोटबंदी से पटेगी नहीं और बढ़ेगी। अगर यह खाई वाकई में खत्म करना है, तो एक मजदूर और कलेक्टर की कमाई के अंतर को मिटाए। और कंपनियों को करोड़ों का फायदा पहुंचाने वाले नियम रद्द करो।
भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए, जो नेताओं और अधिकारियों के हाथ में सारे अधिकार दे दिए हैं, उसे धीरे-धीरे कम करो।


