भगत सिंह ने जो हमें दिया उसके बदले में हमने क्या दिया? एक विचारवान, प्रगतिशील और आज़ादी, बदलाव, व्यवस्था को एक नए और खुले ढंग से देखने, समझने वाले युवा को ज़बरदस्ती एक पिस्तौल लिए गुस्सैल, लड़ाके, हठी दीवाने तक सीमित कर दिया गया. उनके विचार पक्ष को हमेशा छिपाया गया. उनकी चेतना और शब्दों को हमेशा अतल गरहाइयों में दफ़्न रखने की साजिश रची गई. कहा गया कि राजनीति से भगत सिंह का कोई लेना-देना नहीं. कहा गया कि भगत सिंह एक बलिदानी थे. उन्होंने देश के लिए जान दे दी. राष्ट्रवाद की चाशनी में डूबे गीतों और जनवाद को कुचलती राजनीति वाले मंचों पर भगत सिंह को पूजा के लिए टांग दिया गया और कहा गया कि सीखो और मरते रहो. कभी नहीं कहा गया कि व्यवस्था को बदलने के लिए लड़ो, खड़े हो और आंखें खोलने के लिए जन-मन को आंदोलित करो.
सबसे बड़ा कुप्रचार चलाया दक्षिणपंथियों ने. एक आर्यसमाजी परिवार में पैदा हुए भगत सिंह कहते रहे कि वो नास्तिक हैं और इन्होंने उन्हें टीका लगा दिया. वैलेंटाइन डे से भगत सिंह की शहादत को साजिश के तहत जोड़ा जाता रहा. इतिहास झुठलाने वाले ये लोग जब-तब भगत सिंह की तस्वीर अपने पोस्टरों, बैनरों में चिपकाए घूमते हैं. कांग्रेस भी इसमें पीछे नहीं है. जो भगत सिंह खड़े ही हुए गांधी और कांग्रेस वाली आज़ादी से असहमति के प्रति, उन्हें उन्होंने अपने इतिहास में ऐसा काट-तराश के परोसा कि जैसे भगत सिंह उसी आज़ादी के आंदोलन की एक धारा थे, जिसे कांग्रेस ने खड़ा किया और हासिल किया. सारी धाराओं को ये अपने संगम तक ले आए. यहां तक कि वामपंथी पार्टियां भी भगत सिंह को न तो प्रचारित कर पाईं और न ही अपने नायक की तरह खड़ा कर पाईं. चे ग्वेरा की तस्वीर वाले कमरों और कार्यालयों में भगत सिंह को जो जगह और महत्व मिलना था, नहीं मिल सका.
1931 की 23 मार्च ही नहीं, आज़ादी के दिन से आजतक व्यवस्था के हाथों भगत सिंह और उनके सपनों को रोज़ फांसी दी जा रही है. इन हत्यारों को पहचानिए, इन हत्याओं का विरोध कीजिए और इनके ख़िलाफ़ खड़े हो जाइए, यह भगत सिंह को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी और यही सच्ची देशभक्ति भी. इंक़लाब ज़िंदाबाद.
पाणिनि आनन्द
पाणिनि आनंद, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।