मसीहुद्दीन संजरी

भाजपा ने उत्तर प्रदेश में प्रचंड बहुमत प्राप्त किया है।

अगर ईवीएम विवाद को छोड़ दें तो उसकी जीत में दो विपरीत ध्रुव सवर्ण समाज और गैर–चमार गैर–जाटव दलित व अति पिछड़ा वर्ग की बड़ी भूमिका है।

भाजपा के सामने सबको संतुष्ट करने की चुनौती होगी।

सवर्ण समाज दो मुद्दों को लेकर बहुत मुखर रहा है। पहला आरक्षण और दूसरा एससी/एसटी एक्ट समाप्त करने या निष्प्रभावी बनाने का मामला। संघ और भाजपा के भीतर पहले भी इन दोनों मुद्दों को लेकर आवाजें उठती रही हैं।

संघ के शीर्ष नेतृत्व ने भी विगत में इसमें संशोधन की वकालत की है।

इस बहुमत के बाद भाजपा को लोक सभा के साथ ही राज्य सभा में भी बहुमत मिल जाएगा। इसलिए उस पर दबाव होगा कि इन मुद्दों पर अपनी स्थति स्पष्ट करे और कोई ठोस कदम उठाए। लेकिन एक साथ दोनों को खुश कर पाना सम्भव नहीं है।

यह कहना बिल्कुल गलत है कि भाजपा जाति–सम्प्रदाय की राजनीति नहीं करती। टिकट बँटवारे में न केवल उसने मुसलमान प्रत्याशी ही नहीं उतारे बल्कि एसएसी उम्मीदवारों में उसने गैर–जाटव व चमार को ही वरीयता दी। इसलिए जाति आधारित आरक्षण और एससी/एसटी एक्ट का मुद्दा जीवित रहेगा।

शायद काल्पनिक शत्रु आवश्यकता बनी रहेगी।