आशीष मिश्रा के साथ राकेश कुमार
राजस्थान में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियाँ तेज हो गयी हैं। इस बार गहलोत सरकार ने हालाँकि कुछ सराहनीय कार्य किये हैं और योजनाओं को अंजाम तक पहुँचाया है। बाड़मेर में रिफायनरी, मुफ्त चिकित्सा एवं जयपुर मेट्रो इसके उदाहरण हैं। लेकिन चुनाव सिर पर आने के बाद निम्बाहेड़ा विधायक आंजना और दूदू विधायक बाबूलाल नागर पर लगे देह शोषण और दुष्कर्म के मामलों ने कांग्रेस की साख को बट्टा लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। भारतीय जनता पार्टी इस अवसर का राजनीतिक लाभ उठाने में अभी तक नाकामयाब साबित हुयी है। प्रदेश भाजपाध्यक्ष और मुख्यमंत्री की उम्मीदवार वसुंधरा राजे ने गहलोत सरकार को घेरते हुये ’नैतिकता’ का पाठ पढ़ाना चाहा। लेकिन मुख्यमंत्री गहलोत ने पलटवार करते हुये कह दिया कि ’नैतिकता’ का और ’वसुंधरा राजे’ का आपस में कोई सम्बंध नहीं है, इसलिये यह बात उनके मुँह से शोभा नहीं देती। इशारों इशारों में गहलोत ने पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की नैतिकता पर ही सवाल उठा दिये।

वसुंधरा राजे ने 2003 से 2008 तक राजस्थान में बतौर मुख्यमंत्री राज किया। लेकिन राजनीतिक तालमेल की कमी, वरिष्ठ भाजपा नेताओं से दूरी, सेज मामला, भू-माफियाओं का तंत्र, गुर्जर आरक्षण आन्दोलन में गोलीकांड आदि ऐसे बड़े मामले थे जिन्होंने वसुंधरा को बैकफुट पर धकेल दिया। इसके अलावा कभी उनका नाम ललित मोदी से जोड़ा गया, कभी लंदन में घर लेने की बात पर बवाल बचा, कभी सहेली के साथ सरेआम लिपलॉक करने तो कभी किसी पार्टी में हाथ में पैमाना लिये उनकी तस्वीर ने विपक्ष को ’नैतिकता’ के मामले पर वसुंधरा पर प्रहार करने का मौका दिया।

वसुंधरा राजे को भैरोंसिंह शेखावत राजनीति में लाये थे। ग्वालियर राजघराने की बेटी का विवाह धौलपुर राजपरिवार में हुआ। इसके बाद पति से तलाक लेकर वसुंधरा राजनीति के दंगल में उतर आयीं। वसुंधरा राजे पर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का वरदहस्त था इसलिये उन्हें ’सब कुछ’ करने की खुली छूट दी गयी। राजस्थान में भाजपा की सरकार लाने में हालाँकि वसुंधरा राजे कामयाब भी हुयीं, लेकिन इन पाँच सालों में उन्होंने न जनता का विश्वास जीता और न ही प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का। 2008 के विधानसभा चुनाव में जब भारतीय जनता पार्टी औंधे मुँह गिरी तब वसुंधरा राजे के प्रति अन्दर ही अन्दर सीजने वाली खिचड़ी भी बाहर आयी और कई नेता खुलकर वसुंधरा के खिलाफ हो गये। नतीजन राजे को नेता प्रतिपक्ष के पद से इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन राजपरिवार में पली बढ़ी और राजपरिवार में ब्याही गयीं वसुंधरा राजे अब तक राजनीति को बहुत अच्छी तरह समझ चुकी थीं। राजनीति में मँझ चुकी थीं और सारे दावँ-पेंच जान-समझ चुकी थीं। उन्होंने राष्ट्रीय भाजपा के दिग्गज नेताओं में अपनी साख जमा ली थी। विधानसभा के साथ साथ वसुंधरा के राज में राजस्थान से लोकसभा सीटों का भी सत्यानाश हुआ। लेकिन दिल्ली में बैठे भाजपा के बड़े नेताओं ने वसुंधरा को अभयदान दिया हुआ था। इधर, पार्टी में आंतरिक कलह मची हुयी थी। जब-तब अखबारों के मुखपृष्ठों पर भाजपा का यह अन्तर्कलह शोभायमान होने लगी। खींचातान और विरोध इतना बढ़ गया कि वसुंधरा को नेता प्रतिपक्ष के पद से इस्तीफा देना पड़ा। आलाकमान ने इतनी जहमत भी नहीं उठायी कि इस्तीफे के बाद प्रदेश के आम कार्यकर्ता से मिल बैठकर वसुंधरा के विकल्प के बारे में विचार किया जाये और कई दशकों से पार्टी की सेवा कर रहे नेताओं के बारे में इस लिहाज से सोचा जाये। वसुंधरा राजे ने प्रदेश की जनता को कुछ सिखाया या न सिखाया विधायकों को चापलूसी जरूर सिखा दी। नतीजन वसुंधरा से नजदीकी बनाने के लिये उनके समर्थक विधायकों ने वसुंधरा का इस्तीफा वापस लेने के लिये आलाकमान पर दबाव बनाना आरम्भ किया। यह दबाव इतना बढ़ गया कि साल भर बाद ही नेता प्रतिपक्ष और मुख्यमंत्री उम्मीदवार के वसुंधरा के नाम विधायकों के वोट माँगे गये। 78 में से 62 विधायक वसुंधरा के साथ हो गये और जैसा कि आलाकमान को झुकना था, आलाकमान वसुंधरा के आगे नतमस्तक हो गया।

धीरे धीरे वसुंधरा विरोखी खेमा भी टूटने लगा और एक-एक कर विरोधी नेता वसुंधरा के सुर में सुर मिलाने लगे। विरोधी खेमें में सिर्फ घनश्याम तिवाड़ी, रामदास अग्रवाल और नरपत सिंह राजवी जैसे वरिष्ठ नेता ही रह गये। चार साल प्रदेश से गायब रहने वाली नेता प्रतिपक्ष वसुंधरा राजे ने गहलोत सरकार के दौरान विधानसभा में महज 18 उपस्थितियाँ ही दर्ज करायीं। वे किसी बड़े मुद्दे पर सरकार को घेरती भी नहीं दिखीं। मूक-बधिर बालिकाओं के शोषण तक के मामले में वसुंधरा का कहीं कोई अता-पता नहीं चला। चुनाव करीब आने पर आनन-फानन सुराज संकल्प यात्रा निकाली गयी और वसुंधरा प्रदेश की सबसे बड़ी हितैषिणी बन गयीं। इसके बाद जयपुर में सुराज संकल्प यात्रा के समापन में मोदी को बुलाकर सारे पाप धो दिये गये।

हालात को अपने पक्ष में मोड़ने के लिये वसुंधरा राजे असंतुष्ट नेताओं से भी बारी-बारी से मिलीं और ’इस दफा तो दर्द पी जाओ’ की अपील कर चुनाव में साथ खड़े रहने की याचना भी कर दी। आलाकमान भी खुश और वसुंधरा भी। लेकिन विरोधी धड़ा अब भी असमंजस में है। करे तो क्या करे। विरोध करता है तो भाजपा विरोध कहलाता है और साथ देता है तो आत्मा गवाही नहीं देती। आत्मा गवाही दे या न दे। उसे तो किसी भी हालत में भाजपा को मजबूत करना है, भाजपा का साथ देना है। क्योंकि भाजपा को इन वरिष्ठ नेताओं ने अपने खून पसीने से सींचा है। कुछ भी हो। सच ये है कि एक बार फिर आलाकमान ने वसुंधरा को आगे कर एक भारी भूल की है। यह कदम भाजपा को एक बार फिर गर्त में धकेलने वाला कदम साबित न हो जाये।