भारत इजरायल मित्रता मुर्दाबाद !
भारत इजरायल मित्रता मुर्दाबाद !
मधुवनदत्त चतुर्वेदी
मि. प्राइम मिनिस्टर !
विदेश नीति को तो अपनी साम्प्रदायिक और धार्मिक दुराग्रही दृष्टि से बचाकर रख लेते। या, भारत का सब कुछ श्रेष्ठ अपने यार सरमायेदारों पर लुटा कर ही दम लोगे ? हम जानते हैं इजरायल से रक्षा सौदों में उनकी कंपनी की साझीदार अडानी साहब की कंपनी का फायदा है। इजरायल से संबंधों पर आपके भक्तों की ख़ुशी मुसलमानों के प्रति उनकी नफ़रत का इजहार है और ये ख़ुशी अडानी जी को फायदा पहुंचाने की इस कोशिश पर पर्दा भी डाल रही है। इजरायल से गलबहियां हों या विदेशी दौरों में धार्मिक पुस्तकें भेंट करने, मंदिरों में मत्था टेकने की दिखावटी आस्था, भारत में आपके हिन्दू राष्ट्रवादियों की छिछली उम्मीदों को संतुष्ट कर सकती हैं किंतु इससे भारत गणराज्य का नुकसान ही होगा।
साम्प्रदायिक दृष्टिकोण मनुष्य के अन्दर से सभी उदात्त विचारों को निचोड़ फेंकता है। फिलिस्तीनियों पर इजरायलियों के जुल्मो सितम में भी संघी संतोष और सुख केबल इसलिए पाते हैं कि फिलिस्तीनी मुसलमान हैं।
इसी तरह बहुत से मुसलमान सांप्रदायिक फिलिस्तीन से हमदर्दी का इजहार सिर्फ इसलिए करते हैं कि वे मुसलमान हैं। फिलिस्तीनियों का मुसलमान होना भर ही उनके हक में या उनके खिलाफ खड़े होने का आधार बना दिया गया है।
एक कौम के तौर पर एक मुल्क के तौर पर फिलिस्तीन हददर्जे नाइंसाफी का शिकार हुआ है। इसलिए हर इंसाफ पसंद व्यक्ति का कर्तव्य बनता है कि उनके साथ खड़ा हो।
मैं फिलिस्तीन के साथ हूँ, फिलिस्तीनी मुसलमान हैं तब भी और वे मुसलमान न हों तब भी।
एक जमाना था जब हिंदुस्तानी पासपोर्ट पर इजरायल के लिए मनाही लिखी होती थी। आज हिंदुस्तान का वजीर-ए-आज़म एक अतिक्रमणकर्ता के साथ खड़ा होकर इतरा रहा है। खुद पर शर्मिंदा हूँ। भारत की संस्कृति उसका स्वभाव तो अन्याय के शिकार के साथ खड़े होने में है। ये कैसा हिंदुस्तानी है ? बापू ने तब भी फिलिस्तीन पर अरबों के हक़ की बात की थी जब उन्हें भगोड़ों ने खदेड़ा था। भारत इजरायल मित्रता मुर्दाबाद !


