अमरीकी सैनिक अड्डे-मोदी सरकार, अमरीका के दबाव के आगे घुटने टेकने के लिए तैयार
0 प्रकाश कारात
रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर की पहली वाशिंगटन यात्रा के फलस्वरूप, अमरीका के साथ रक्षा सहयोग के मामले में अनेक पहलें हुई हैं। इनमें सबसे गंभीर और सबसे चिंताजनक है, रक्षा मंत्री का इसके संकेत देना कि भारतीय सैनिक अड्डों तथा बंदरगाहों तक अमरीका को पहुंच मुहैया करायी जा सकती है। मीडिया की रिपोर्टें बताती हैं कि पर्रिकर ने, अपने अमरीकी समकक्ष एस्टन कार्टर को बताया है कि लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट (एलएसए) पर भारत सरकार खुले दिगाम से विचार करने के लिए तैयार है।
याद रहे कि 2005 में भारत-अमरीका रक्षा रूपरेखा समझौते पर दस्तखत होने के बाद से अमरीका, भारत से इसके लिए आग्रह करता आया है कि उसके साथ लॉजिस्टिक्स सपोर्ट समझौते (एलएसए) और कम्युनिकेशन एंड इन्फार्मेशन सीक्योरिटी मैमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (सिसमोआ) पर दस्तखत कर दे। वामपंथी पार्टियों ने, रक्षा रूप रेखा समझौते पर दस्तखत किए जाने का और इन दोनों ठोस समझौतों का कड़ा विरोध किया था। एलएसए पर दस्तखत होने से अमरीकी सेनाओं को अपनी सैन्य कार्रवाइयों के लिए भारतीय हवाई अड्डों तथा नौसैनिक अड्डों का उपयोग करने का मौका मिल गया होता। इनमें दूसरे समझौते, सिसमोआ का मकसद दोनों देशों के सैन्य बलों के संचार नैटवर्कों का आपस में जोड़ऩा है। अगर इन समझौतों पर दस्तखत हो जाते तो भारत, पूरी तरह से अमरीका का सैन्य सहयोगी बन गया होता। यूपीए सरकार ने अंतत: इन दोनों समझौतों पर दस्तखत नहीं किए। तत्कालीन रक्षा मंत्री, ए के अंथनी ने इस संबंध में स्पष्ट रुख अपनाया था।
बहरहाल, मौजूदा भाजपा सरकार अमरीका के साथ सैन्य गठजोड़ के लिए बहुत उत्सुक नजर आती है। इसके स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। इसी साल जनवरी में हुई ओबामा की भारत यात्रा के दौरान एक संयुक्त विज़न दस्तावेज पर दस्तखत किए थे, जो भारत को एशिया-प्रशांत तथा हिंद महासागर क्षेत्र के लिए अमरीकी रणनीति के साथ बांधता है। वाणिज्यिक नौपरिवहन सुरक्षा के नाम पर भारत, हिंद महासागर में अमरीकी नौसेना के साथ तालमेल कर के चल रहा है। मौजूदा रक्षा मंत्री पर्रिकर, ऐसे पहले भारतीय रक्षा मंत्री बन गए हैं, जिन्होंने हवाई में अमरीकी प्रशांत कमांड का दौरा किया था। अमरीका, भारत के लिए रक्षा उपकरणों का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया है।
इसी साल जून में भारत-अमरीका रक्षा रूपरेखा समझौते का अगले दस साल के नवीनीकरण कर दिया गया। इसी रूपरेखा समझौते के तहत अमरीका एक बार फिर भारत पर एलएसए, सिसमोआ और बेसिक एक्सचेंज एंड कोआपरेशन एग्रीमेंट (बीईसीए) नाम का एक तीसरा समझौता और करने के लिए दबाव डाल रहा है। रक्षा मंत्री पर्रिकर का इस मुद्दे पर बात करने के लिए राजी होना और अपना दिमाग खुला होने का संकेत देना, वास्तव में इस खतरे का ही संकेत है कि मोदी सरकार, अमरीका के दबाव के आगे घुटने टेकने के लिए तैयार हो रही है।
अमरीकी यह रुख अपनाए रहे हैं कि उच्च प्रौद्योगिकी के विभिन्न घटक भारत को तब तक नहीं दिए जा सकते हैं, जब तक भारत उक्त दोनों समझौतों पर दस्तखत नहीं कर देता है। रक्षा उपकरणों के संयुक्त उत्पादन में अमरीका को जोडऩे की अपनी उत्सुकता में मोदी सरकार को अमरीका ने राष्टï्रीय संप्रभुता के साथ और शसस्त्र बलों की अखंडता के साथ ही समझौता करने के लिए पटा लिया लगता है।
अमरीकी सशस्त्र बलों को भारतीय नौसैनिक बंदरगाहों तथा हवाई अड्डïों का अपने युद्घ-पोतों, जंगी जहाजों की सर्विसिंग, तेल भराई तथा उनके रख-रखाव के लिए इस्तेमाल करने की इजाजत देने का मतलब होगा, हमारे देश द्वारा अब तक अपनाए जा रहे स्वतंत्र रुख से और किसी सैन्य गठजोड़ में शामिल न होने की उसकी नीति से पूरी तरह से हट जाना। दोनों देशों के सशस्त्र बलों की प्रणालियों को आपस में जोडऩा तथा परस्पर परिचालनीय बनाना, भारतीय सशस्त्र बलों को अमरीकी रक्षा ढांचों के साथ पूरी तरह से नत्थी कर देगा।
भाजपा सरकार ने इन समझौतों पर दस्तखत नहीं करना चाहिए, जो भारत की संप्रभुता को सीमित करेंगे, उसकी रणनीतिक स्वायत्तता को क्षति पहुंचाएंगे और भारत को, अमरीका का अधीनस्थ सैन्य सहयोगी बनाकर रख देंगे। 0