भारतसरकार ने बताया था इसे आदिवासियों की जमीन हड़पने की कोलंबस के बाद की सबसे बड़ी कार्रवाई
भारतसरकार ने बताया था इसे आदिवासियों की जमीन हड़पने की कोलंबस के बाद की सबसे बड़ी कार्रवाई
आनंद स्वरूप वर्मा
भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 2008 में केंद्रीय ग्राम विकास मंत्री की अध्यक्षता में एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट तैयार की थी जिसका शीर्षक है ‘कमेटी ऑन स्टेट ऐग्रेरियन रिलेशन्स ऐंड अनफिनिश्ड टॉस्क ऑफ लैंड रिफॉर्म्स’।
इस रिपोर्ट में बताया गया है कि छत्तीसगढ़ में विकास परियोजनाओं के नाम पर कितने बड़े पैमाने पर उपजाऊ जमीन और वन क्षेत्र को उद्योगपतियों को दिया गया। इसकी वजह से बहुत बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ और इसने एक व्यापक अशांति को जन्म दिया।
‘आदिवासियों की जमीन हड़पने की कोलंबस के बाद की सबसे बड़ी कार्रवाई’ उपशीर्षक के अंतर्गत भारत सरकार की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि-
‘‘छत्तीसगढ़ के तीन दक्षिणी जिलों बस्तर, दांतेवाड़ा और बीजापुर में गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है। यहां एक तरफ तो आदिवासी पुरुषों और महिलाओं के हथियारबंद दस्ते हैं जो पहले पीपुल्स वॉर ग्रुप में थे और अब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के साथ जुड़े हैं तथा दूसरी तरफ सरकार द्वारा प्रोत्साहित सलवा जुड़ुम के हथियारबंद आदिवासी लड़ाकू हैं जिनको आधुनिक हथियारों और केंद्रीय पुलिस बल के तमाम संगठनों का समर्थन प्राप्त है।
यहां जमीन हड़पने की अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई चल रही है और जो पटकथा तैयार की गयी है वह अगर इसी तरह आगे बढ़ती रही तो यह युद्ध लंबे समय तक जारी रहेगा। इस पटकथा को तैयार किया है टाटा स्टील और एस्सार स्टील ने, जो सात गांवों पर और आसपास के इलाकों पर कब्जा करना चाहते थे ताकि भारत के समृद्धतम लौह भंडार का खनन कर सकें।‘‘
शुरू में जमीन अधिग्रहण और विस्थापन का आदिवासियों ने प्रतिरोध किया। प्रतिरोध इतना तीव्र था कि राज्य को अपनी योजना से हाथ खींचना पड़ा... सलवा जुडुम के साथ नये सिरे से काम शुरू हुआ।
अजीब विडंबना है कि कांग्रेसी विधायक और सदन में विपक्ष के नेता महेंद्र कर्मा ने इसकी शुरुआत की, लेकिन भाजपा शासित सरकार से इसे भरपूर समर्थन मिला... इस अभियान के पीछे व्यापारी, ठेकेदार और खानों की खुदाई के कारोबार में लगे लेाग हैं जो अपनी इस रणनीति के सफल नतीजे की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
सलवा जुडुम शुरू करने के लिए पैसे मुहैया करने का काम टाटा और एस्सार ग्रुप ने किया, क्योंकि वे ‘शांति’ की तलाश में थे।
सलवा जुडुम का पहला प्रहार मुड़िया लेागों पर हुआ जो अभी भी भाकपा (माओवादी) के प्रति निष्ठावान हैं। यह भाई-भाई के बीच खुला युद्ध बन गया।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 640 गांव खाली करा दिये गये, इन गांवों के मकानों को ढाह दिया गया और बंदूक की नोंक पर तथा राज्य के आशीर्वाद से लोगों को इलाके से बेदखल कर दिया गया।
साढ़े तीन लाख आदिवासी, जो दांतेवाड़ा जिले की आधी आबादी के बराबर हैं, विस्थापित हुए, उनकी औरतें बलात्कार की शिकार हुईं, उनकी बेटियां मारी गयीं और उनके युवकों को विकलांग बना दिया गया। जो भागकर जंगल तक नहीं जा पाये उन्हें झुंड के झुंड में विस्थापितों के लिए बने शिविरों में डाल दिया गया जिसका संचालन सलवा जुडुम द्वारा किया जाता है। जो बच रहे वे छुपते-छुपाते जंगलों में भाग गये या उन्होंने पड़ोस के महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में जाकर शरण ली।
‘‘640 गांव खाली हो चुके हैं। हजारों लाखों टन लोहे के ऊपर बैठे इन गांवों से लोगों को भगा दिया गया है और अब ये गांव सबसे ऊंची बोली बोलने वाले के लिए तैयार बैठे हैं। ताजा जानकारी के अुनसार टाटा स्टील और एस्सार स्टील दोनों इस इलाके पर कब्जा करना चाहते हैं ताकि वहां की खानें इनके पास आ जायं।’’ (पृ. 160-161)"


