आम चुनाव 2014- कोर्पोरेट की कोख से जन्मा दक्षिणपंथी शमशाद इलाही शम्स। दुनिया भर ने धड़कते दिलों के साथ 16 मई को सम्पन्न हुए प्रतिष्ठा के सबसे विशाल जनतंत्र के चुनावी नतीजों को देखा। भाजपा की हिंदुत्ववादी भारतीय जनता पार्टी ने निचली सीटें जीतकर दो तिहाई बहुमत प्राप्त किया। निरंतरता शासक दल कांग्रेस को मातर 44 सीटों पर संतोष करना पड़ा, कांग्रेस की हुई दुर्गति का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अन्य क्षेत्रीय दलों द्वारा जीती गई सीटों की संख्या कांग्रेस की 44 सीटों से कहीं अधिक है। जाहिर है कांग्रेस की कुम्भकर्ण के दौरांत पिछले दस सालों, विशेषकर पिछले पांच वर्षों में इसके कुशासन, जनविरोधी आर्थिक नीतियों, आसन्न भ्रष्टाचार, भयावह बेरोजगारी और गैर जवाबदेही वाले तंत्र से जनता में भारी रोष था, जिसका परिणाम उसे अपने संसदीय इतिहास में सबसे करारी हार के रूप में भुगतना पड़ा। 2014 के भारतीय आम चुनावों का मूल्यान्कन भारतीय राज्य के अपने अनन्तनिहित द्वंद्वों की सही मायने में व्याख्या करने से ही किया जा सकता है। चुनाव परिणामों के बाद स्वाभाविक रूप से भारत की राजनीति में दक्षिणपंथी उभार अपनी तार्किक परिणति यानी पूर्ण वृत्त की दशा में पहुँच गया है जिसकी जूस्तजु में वह पिछले तीन दशकों से प्रयासरत था। कांग्रेस सरकार के दौरान पिछले एक दशक में विशेष रूप से पिछले पांच वर्षों में इसके कुशासन, जनविरोधी आर्थिक नीतियों, आसन्न भ्रष्टाचार, भयावह बेरोजगारी और गैर जवाबदेही वाले तंत्र से जनता में भारी रोष था, जिसका परिणाम उसे अपने संसदीय इतिहास में सबसे करारी हार के रूप में भुगतना पड़ा।