दलजीत एमी कृत ‘नॉट एव्री टाइम’ वृत चित्र का मंचन एंव समीक्षा
१२, अगस्त १९९७ बरनाला के छोटे से गाँव महलकला की किरनजीत कौर को अगुवा करके उसका बलात्कार किया जाता है फिर उसकी हत्या करके उसे एक खेत में दबा दिया जाता है। इस भयंकर अपराध के बाद समाज की जो ज़बरदस्त प्रतिक्रिया हुई वह सबक-आमेज़ है।
अपराधाधियों के खिलाफ कार्यवाही करने हेतु महल कला और आस पास के गावों के राजनीतिक अगुवा तत्वों ने एक एक्शन कमेटी बनाई और पुलिस, प्रशासन, राजनेताओं के गठजोड़ की जड़ों पर जनांदोलन के जरिये प्रहार शुरू किया।
जिला कलक्ट्रेट से लेकर राज्य की राजधानी चंडीगढ़ तक प्रदर्शन, धेराव और रैलियां हुईं। पुलिस को अपराधियों को पकड़ना पड़ा और जनदबाव के समक्ष झुकना पड़ा। अदालती कार्यवाहियों के बीच एक अभियुक्त की पेशी के दौरान न्यायालय परिसर में ही हत्या हो गयी, जिसमें पुलिस ने आन्दोलन का नेतृत्व कर रही एक्शन कमेटी के ही तीन सदस्यों को बलात्कार के अभियुक्त की हत्या के दोष में नामज़द कर जेल भेज दिया।
भारतीय अदालतों ने अपने आकाओं की पीठ खुजाते हुए तीनों को उम्र कैद की सजा सुना कर अपनी वर्गीय तत्परता का स्पष्ट उदहारण दिया। आन्दोलन को तोड़ने की इस चिर परिचित अग्रेजों के ज़माने की प्रशासनिक नीतियों से महलकला की आंदोलनरत जनता जानती थी, इस तरह उन्होंने किरनजीत कौर हत्याकांड के प्रश्न को और मजबूती से उठाया।
अदालत परिसर में हजारों लोगों ने भारतीय न्याय सेवा मुर्दाबाद के नारे लगाए, अन्ततः एक्शन कमेटी के तीन सदस्यों में से दो को पंजाब हाई कोर्ट ने बरी किया, जबकि तीसरे सदस्य की सजा कम करके आठ वर्ष की सजा सुना दी।
उपरोक्त कथा वस्तु पर पंजाब के प्रसिद्द मीडिया कर्मी, सामाजिक कार्यकर्त्ता, ब्लागर दलजीत एमी ने इस आन्दोलन पर लगातार कई वर्षों के अथक प्रयासों के बाद २००६ में एक वृत्त चित्र बनाया, जिसका नाम है ‘नाट एवरी टाइम’। यह वृत चित्र अपने आप में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है जिसके माध्यम से पूरी दुनिया में यह बताया जा सकता है कि लगभग ७० साल पुराने दुनिया के सबसे विशाल कथित जनतंत्र में आम जनता की क्या हालत है? गाँव देहात में महिलाओं की क्या स्थिति है? अपराध होने की स्थिति में देश का पुलिस प्रशासन, न्यायालय और राजनीतिक ताकतों का व्यवहार किस कदर जनविरोधी है?
कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली के निर्भया बलात्कार काण्ड ने देश भर के प्रचार माध्यमों में बहुत सुर्खियां बटोरीं, जनता के स्वत: स्फूर्त आन्दोलन के समक्ष देश की राजधानी में राजकीय संस्थानों ने बहुत तत्परता के साथ इस केस का निपटारा किया, परंतु देश की जनता के सामने महल कला (पंजाब) किरणजीत कौर को समर्पित जन आन्दोलन को देशवासियों से छुपाये रखा।
इसी आपराधिक साजिश और खामोशी का जवाब दलजीत एमी ने अपने वृत चित्र के जरिये प्रस्तुत किया है। जाहिर है देश का कोई भी प्रचार माध्यम इस वृत्त चित्र को अपने वर्गीय चरित्र के अनुरूप किसी भी चैनल पर प्रसारित नहीं कर सकेगा, लिहाजा दलजीत एमी इस वृत्त चित्र को निजी स्तर पर जनता के समक्ष रख कर अपनी बात बहुत मजबूती के साथ रखते हैं।
महल कला का ‘जन-आन्दोलन प्रयोग’ अपनी अंतरवस्तु में भारतीय समाज में पल रहे युगों युगों पुराने महिला विरोधी कोढ़ को धोने की एक सचेतन लड़ाई है, जिसका समाजशास्त्रीय अध्ययन अवश्य किया जाना चाहिए। इस आन्दोलन में महिलाओं की प्रभावशाली भूमिका अपने आप में एक नज़ीर कायम करती है और मेन स्ट्रीम राजनीति के बरअक्स एक सशक्त विकल्प सुझाती है।
महल कला आन्दोलन निःसंदेह भारतीय राज्य की समस्त प्रशासनिक इकाइयों और जनविरोधी बंजर राजनीतिक भूमि के विरुद्ध एक वैकल्पिक राजनीति का ‘महाबीज’ है। जनपक्ष की राजनीति से सरोकार रखने वाली राजनीतिक शक्तियों को यह आन्दोलन पंजाब की जुझारू जनता द्वारा दिया गया नायाब तोहफा है। निःसंदेह इस आंदोलन के सबक पूरे देश में लोक पक्ष की राजनीति करने वाले हर कार्यकर्ता को सीखने चाहिए, लगातार बढ़ रहे अँधेरे के खिलाफ महल कला आन्दोलन पूरे देश की जुझारू जनता को किसी गुफा में दिए की रोशनी की मानिंद संबल देगा।
गत १२ अगस्त को महल कला में इस आन्दोलन की १८वीं वर्षगांठ मनाई गयी, जिसमें भारी संख्या में आवाम ने शिरकत की। जब तक ज़ुल्म है तब तक ज़ुल्म से लड़ने वाली शक्तियों समाज में हमेशा सक्रिय रहती हैं, यह आन्दोलन इसी ऐतिहासिक साक्ष्य को मज़बूती के साथ पेश करता है।
गत रविवार, भारत से हजारो मील दूर ब्राम्पटन कनैडा में दलजीत एमी की ‘नाट एव्री टाइम’ का शो ‘पीपुल्स वायस फ़ोरम’ के तत्वावधान में किया गया। फिल्म को उपस्थित जन समूह ने अपलक अवलोकन किया। फिल्म के बाद दलजीत एमी के साथ दर्शकों को बेहद रोचक संवाद भी हुआ, जिसे दलजीत एमी बहुत पेशेवर तरीके से, बहुत सी जानकारियों के साथ दर्शकों के साथ सांझा किया।
दलजीत एमी ने अपने विचारों को व्यक्त करते हुए कहा, ‘किसी भी समस्या को दो तरह से देखा जा सकता है, या तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँच जाएँ कि कुछ नहीं हो सकता, या दूसरा तरीका हो सकता है कि लड़ें और हार जाएँ, मैंने दूसरे तरीके को चुना।’
जाहिर है दूसरा तरीका ही इतिहास को गति देता है और समाज में बेहतर बनाये रखने में मदद करता है।
शमशाद इलाही शम्स की कनाडा से रिपोर्ट