जगदीश्वर चतुर्वेदी
भारतीय साहित्य की अवधारणा का कोई भी परिप्रेक्ष्य क्षेत्रीयतावादी या कुछ क्षेत्रीय भाषाओं के सहमेल से नहीं बनाया जा सकता। इस प्रसंग में किसी भी किस्म का कॉमन-सेंस या साहित्यिक-सामाजिक-भाषायी सरलीकरण समस्यामूलक है। भारतीय साहित्य के बुनियादी तत्व क्या हैं ? क्या भाषा, राष्ट्रीयता या जातीयता, धर्म, परंपरा आदि के आधार पर भारतीय साहित्य की अवधारणा पर विचार करना सही होगा ? क्या साहित्यिक प्रवृत्तियों और संवृत्तियों को आधार बनाकर विवेचन किया जाए ?
साहित्य की अभिव्यक्ति भाषा में होती है। फलतःसाहित्य और भाषा का स्वाभाविक सम्बंध बनता है। लेकिन महज इस सम्बंध के आधार पर साहित्य का समुचित मूल्याँकन करना सम्भव नहीं है। खासकर भारतीय साहित्य की अवधारणा के बारे में तो एकल भाषिक आधार पर सही निर्णय सम्भव नहीं है। भारतीय साहित्य की अवधारणा एक-दो-तीन भाषाओं के आधार पर निर्मित करने से समग्र समझ नहीं बन पाएगी। बहुभाषिकता-बहुसांस्कृतिकता के बीच में लिंग, जाति, सामाजिक-राजनीतिक, व्यवस्थागत प्रक्रियाओं के गर्भ से भारतीय साहित्य की विभिन्न संवृत्तियों का निर्माण हो रहा है। भारत में एक ही भाषा-भाषी इलाके में साहित्यरूपों और विधाओं का विकास समान रूप में नहीं हुआ है। ऐसे में कोई भी सरलीकरण खतरा पैदा कर सकता है। भाषा तो एक दूरी के बाद बदल जाती है लेकिन साहित्य नहीं बदलता। यह भी धारणा है कि एक कोस के बाद भाषा बदल जाती है। यह भी सम्भव है कि एक भाषायी क्षेत्र में अन्य भाषा और बोलियों का भी प्रयोग हो रहा हो, जैसा कि हिंदी-भाषी क्षेत्र में होता है। दूसरी बात यह है कि हिंदी साहित्य का जो भी परिप्रेक्ष्य बनेगा वो ग्लोबल होगा। हिंदी भाषी क्षेत्र के अलावा दक्षिण में हिंदी लिखने वाले और विदेशों में हिंदी लिखने वाले लेखकों का भिन्न परिप्रेक्ष्य होगा।
साहित्य के इतिहास में साहित्यकारों की देशज या स्थानीय परंपरा का महत्व होता है। साहित्य के उत्पादन में विभिन्न परंपराएं, विधाएं और साहित्यकार के बीच की अंतर्क्रियाओं की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए। प्रत्येक पाठअन्य भाषा और विधारूप से जुड़ा होता है।उस पर निर्भर होता है। वह इतिहासबोध और समुदाय विशेष से जुडा होता है। पाठकिस समय रचा गया,  किस समय और कैसे पढ़ा जाता है, इसका आलोचना पर गहरा असर होता है, इससे पाठमें नए अर्थ की सृष्टि होती है।
शिशिर कुमार दास ने ‘ए हिस्ट्री ऑफ इंडियन लिटरेचर’ (1991) में लिखा है राष्ट्रीय साहित्य का विचार वस्तुतः जनता और साहित्य के अन्तस्संबंध की अंशतः स्वीकृति है। लेकिन इस जटिल सम्बंध को एकमात्र जातीयता या राजनीतिक अवधारणा के रूप में ही परिभाषित नहीं किया जा सकता है।
शिशिर कुमार दास ने लिखा है ग्रीक साहित्य वहाँ की जनता का साहित्य है। यह कोई राजनीतिक केटेगरी पर आधारित साहित्य नहीं है। इसी तरह संस्कृत साहित्य भारत की जनता का साहित्य है। साहित्य इसलिए कहते हैं क्योंकि उसमें साझेदारी का भाव है। उसे शेयर करते हैं। जब किसी भाषा में साहित्य लिखा जाता है तो राजनीतिक केटेगरी की बहुत कम और सामुदायिक अनुभूतियों की बड़ी भूमिका होती है। संस्कृत साहित्य देश के विभिन्न क्षेत्रों में लिखा गया, विभिन्न भाषायी इलाकों में लिखा गया लेकिन वो किसी क्षेत्र विशेष या राजनीति विशेष या भाषा विशेष का साहित्य नहीं कहलाता। बल्कि पूरे देश का साहित्य है।
साहित्य में आम लोगों की अस्मिता अभिव्यक्त होती है। लेकिन इसे राजनीति या अस्मिता की राजनीति के आधार पर नहीं परखा जा सकता। क्योंकि उसमें आम लोगों की साझा अनुभूतियाँ व्यक्त होती हैं। यही वजह है कि साहित्य को विशेष स्थान देते हैं।
इसी तरह मारीशस के हिन्दी लेखक और भारत के हिन्दी लेखक की साझा अनुभूतियाँ एक नहीं हैं, इसलिए एक भाषा का साहित्य होते हुए भी इसे एकीकृत रूप में देखना ठीक नहीं होगा। भारत, ब्रिटेन, अमेरिका और कनाडा के अंग्रेजी लेखकों की सामुदायिक अनुभूतियाँ अलग हैं फलतः इन देशों के अंग्रेजी साहित्य की परंपरा भी अलग है। कहने का अर्थ है भाषिक पहचान या जातीय पहचान के दायरे के बाहर आकर साहित्य और जनता के अन्तस्संबंध का विश्लेषण किया जाना चाहिए।
संस्कृत साहित्य को भारत की सभी राष्ट्रीयताएं अपना साहित्य मानती हैं। भक्ति आंदोलन के साहित्य को विभिन्न भाषाओं में अलग-अलग समय पैदा होने का मौका मिला। यही हाल प्रगतिशील आंदोलन के प्रभाववश लिखे गए प्रगतिशील साहित्य़ का है। उसकी भी भारतीय पहचान है। रामविलास शर्मा और उनकी धारणाओं के आधार पर हिन्दी को जातीय साहित्य घोषित करने वालों की मुश्किलें यहीं पर हैं। वे हिन्दी साहित्य को परिभाषित करने लिए राजनीतिक आधारों का इस्तेमाल करते हैं और राजनीतिक केटेगरी और साहित्य का सरलीकृत याँत्रिक सम्बंध बना लेते हैं।
फ्रिट्ज अर्नेस्ट ने लिखा है सचेत राष्ट्रीय एकता क्षेत्रीय, भाषायी और धार्मिक आधार के परे होती है। इन दिनों इस विचार को तिलांजलि दे दी गयी है अब तो एकल भाषा के रूप में स्विस साहित्य की बात की जा रही है। यह स्विस साहित्य की धारणा तो राजनीतिक है, यह सांस्कृतिक यथार्थ को व्यक्त नहीं करती।
इसी तरह जो लोग भारतीय साहित्य की बात करते हैं वे भूल जाते हैं कि भारत का नक्शा बदलता रहा है। भारत आज वह नहीं है जो पाँच सौ साल पहले था। सम्राट अशोक और अकबर महान के जमाने में भारत एक जैसा नहीं था। ब्रिटिश शासन और आज का भारत एक नहीं है। कहने का अर्थ है भारत की भौगोलिक-राजनीतिक व्यवस्था बदलती रही है। भाषा और धर्म के मानने वालों की संख्या और भौगोलिक अवस्था भी बदलती रही है। असल में भारतीय साहित्य की अवधारणा राजनीतिक मंशाओं से प्रेरित है लेकिन इसके पक्ष में प्रमाण नहीं हैं।
शिशिर कुमार दास ने लिखा है विगत 100सौ साल से भारत और पश्चिम के विद्वान लगातार भारतीय साहित्य की अवधारणा पर विचार करते आ रहे हैं, लेकिन उनके विचार एक जैसे नहीं हैं। आम तौर पर पश्चिमी विद्वानों ने भारतीय साहित्य के मूल्यांकन के नाम पर संस्कृत साहित्य का ही विवेचन किया है। अन्य भारतीय भाषाओं का साहित्य इनकी चिंता के केन्द्र में नहीं है। खासकर पश्चिम के प्राच्यविदों ने यह काम खूब किया है। जो लोग भारत में संस्कृत के अलावा अन्य भाषाओं के साहित्य को भी मानते हैं वे एक तरह से एक भाषा के रूप में संस्कृत का वर्चस्व मानकर चलते हैं। भारत की अन्य भाषाओं को संस्कृत के मातहत मानकर चलते हैं। इसमें भी वे बुद्धिजीवी, नैतिकता और सौंदर्यबोधीय परंपरा पर जोर देते हैं।
भारतीय साहित्य की अवधारणा को मानने वालों में ऐसे लोग भी हैं जो यह मानते हैं कि भारत की प्रत्येक भाषा के साहित्य की अपनी निजी विशेषताएं हैं। इनमें कुछ समान लक्षण हैं तो अन्य अनेक लक्षण अलग हैं। कुछ लक्षण ऐसे भी हैं जो जातीय, क्षेत्रीय,  भाषायी और धार्मिक सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं।
शिशिर कुमार दास ने लिखा है भारत की एकता को ब्रिटिश शासन की देन समझना भूल होगी। यह कहना भी सही नहीं है कि यह एकता स्वाधीनता संग्राम की देन है। यह उस विचारधारा की भी देन नहीं है जो एक परंपरा को राष्ट्रीय और बाकी को क्षेत्रीय कहते हैं। भारत एक पुरानी सभ्यता है। यह सभ्यता जितनी पुरानी है उतनी ही पुरानी यहाँ की संस्कृति और आम लोगों की एकता है। भारतीय संस्कृति के निर्माण में अनेक प्रधान कारक हैं। भारत वर्ष की अवधारणा कम्युनेलिटी या सामुदायिकता पर आधारित है। यही भारतीय साहित्य की अवधारणा का आधार है।
भारतीय साहित्य की अवधारणा का दूसरा प्रमुख आधार है भारतीय मनोदशा। शिशिर कुमार दास के अनुसार भारतीय मनोदशा या अनुभूतियों की अभिव्यक्ति है भारतीय साहित्य। यहाँ पर राजनीतिक कारक प्रमुख नहीं हैं बल्कि सामुदायिक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति प्रमुख है। भारतीय जन की सामाजिक, धार्मिक और बौद्धिक गतिविधियों को एक धागे में बाँधे रखने का काम साहित्य करता रहा है। इसके कारण साहित्य में वैविध्यपूर्ण सर्जनात्मक आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति हुई है। भारतवर्ष का विचार वस्तुतःबहुभाषिकता का स्वाभाविक परिणाम है। जिस तरह अन्य कला रूप जैसे संगीत, स्थापत्य, चित्रकला, मूर्तिकला आदि में वैविध्य की अभिव्यक्ति हुई है। वैसे ही भारतीय साहित्य में भी भाषायी विविधता की अभिव्यक्ति हुई है। उल्लेखनीय है विभिन्न समुदायों में आर्थिक और सामाजिक भेद हैं, ये भेद साहित्य के लिए महत्वहीन हैं।
भारतीय साहित्य का तीसरा प्रधान कारक है दर्शन या विचार विशेष। विचार विशेष के आधार पर एकीकृत भारतीय साहित्य की अवधारणा बनी है। जिन लेखकों में दर्शन और विचार की एकता है वे सर्जनात्मक अभिव्यक्ति के लिए एक ही विधा में या स्वतंत्र रूप से एकाधिक भाषा का इस्तेमाल करते हैं। लेखक का बहुभाषिकता का आग्रह अमीर खुसरो, विद्यापति, कालिदास आदि सबमें है। इसी तरह जैन और बौद्ध साहित्य में विचार विशेष के आधार पर सर्जनात्मक अभिव्यक्ति हुई है। विगत दो हजार सालों में अनेक लेखक मिलते हैं जिन्होंने एकाधिक भाषा में लिखा है।
भाषा को प्रधान कारक मानेंगे तो यह निश्चित करने में असुविधा होगी कि आखिरकार एक ही लेखक ने एक ही किस्म की अनुभूतियों को एकाधिक भाषा में क्यों व्यक्त किया और ऐसे में उस भाषाभेद को व्याख्यायित करने में असुविधा होगी। इसके विपरीत यदि अनुभूति और कल्पनाशीलता को आधार बनाएंगे तो दो भाषा में लिखने के बावजूद उसे एक इकाई के रूप में देखने में आसानी होगी। सारी दुनिया में भाषा के आधार पर देखने को वैधता प्रदान की गई है लेकिन अनुभूति और कल्पना के आधार पर साहित्य और साहित्यकार को देखने को अभी स्वीकृति नहीं मिली है। किसी लेखक की व्यक्तिवादिता महज एक भाषा में व्यक्त नहीं होती बल्कि वह बहुभाषिकता में भी व्यक्त होती है। यदि हम लेखक या कलाकार के विजन में भाषा, विषय और शैलीगत विविधता को स्वीकार कर लेते हैं तो साहित्य के बुनियादी आधार को रेखांकित कर सकते हैं। महत्वपूर्ण है लेखक का विजन। बाकी चीजें उसकी पूरक हैं। भाषा, राजनीतिक आंदोलन, राष्ट्रीयता,  राष्ट्रवाद, लिंग, वर्णाश्रम व्यवस्था या जाति आदि महत्वपूर्ण नहीं हैं। इन तत्वों की लेखक के विज़न में अभिव्यक्ति होती है लेकिन निर्णायक तत्व है लेखक का विज़न और सामुदायिक भावना।
भारतीय साहित्य की अवधारणा पर विचार करते समय चौथा कारक है लेखक के हृदय का विश्व पर कितना अधिकार है। उसका कितना अंश स्थायी आकार में व्यक्त हुआ है। साहित्य हो या भारतीय साहित्य इसमें महत्वपूर्ण है मनुष्य का हृदय और मनुष्य का चरित्र। यह हृदय साहित्य में किस रूप में और कितना स्थान प्राप्त करता है। मनुष्य की किस रूप में और कितनी विविधता के साथ लेखक सृष्टि करता है इसे देखा जाना चाहिए। इसके अलावा मनुष्य के वे कौन से पहलू हैं जिनको लेखक चिरस्थायी बनाना चाहता है।
इसी प्रसंग में रवीन्द्रनाथ टैगोर का उल्लेख करना समीचीन होगा। टैगोर के अनुसार “ साहित्य जो कुछ हमें जनाना चाहता है पूरी तरह जनाता है, अर्थात् स्थायी की रक्षा करके, अवान्तर को छोड़कर, छोटे को छोटा करके, बड़े को बड़ा करके, दरार को भरकर, बिखरे हुए को जमा करके खड़ा कर देता है। प्रकृति के पक्षपातहीन प्राचुर्य में मन जो कुछ करना चाहता है साहित्य वही करता है।मन प्राकृतिक चीज को मानसिक बना लेता है, साहित्य उसी मानसिक चीज को साहित्यिक बना लेता है।”
भारतीय साहित्य की विशेषता है यहाँ एक नहीं दर्जनों भाषाओं में साहित्य सैंकड़ों सालों से लिखा जा रहा है। इनमें आपस में आदान-प्रदान भी होता रहा है। शिशिर कुमार दास ने भारतीय साहित्य को इसी आधार पर साहित्य का महासंघ कहा है। इसमें भारतीय जनता का समग्र साहित्य शामिल है। अथवा यों कहें कि उसमें समस्त क्षेत्रीय और आंचलिक भाषा और बोलियों का साहित्य शामिल है। लेकिन इसे भाषाओं के समस्त साहित्य का कुलयोग नहीं मान सकते। मसलन् मैथिली +बंगला +तमिल +तेलुगू आदि। विभिन्न भाषाओं के साहित्य को किसी पुस्तक या ग्रंथमाला में सजा भर देने से भारतीय साहित्य की अवधारणा नहीं बनती अपितु इस तरह के संकलन से विभिन्न भाषाओं के साहित्य के अन्तस्संबंध और उससे जुड़ी समस्याओं का खुलासा नहीं होता। यदि प्रत्येक भाषा का साहित्य सर्वतंत्र-स्वतंत्र है और अपनी एकांत साधना में व्यस्त है जो ऐसी अवस्था में भारतीय साहित्य की अवधारणा का कोई महत्व नहीं है। भारतीय साहित्य का महत्व तब है जब विभिन्न भाषाओं के बीच के अन्तस्संबंध को रेखांकित किया जाए। साहित्य के इतिहासकार का काम यहाँ से आरंभ होता है।
भारतीय साहित्य का अर्थ किसी एक विषय या आंदोलन या प्रवृत्ति विशेष पर विभिन्न भाषाओं की रचनाओं का संकलन नहीं है। यह किसी एक भाषा विशेष का अध्ययन भी नहीं है। मसलन् अनेक प्राच्यविदों ने ब्रिटिश शासन के दौरान संस्कृत साहित्य को भारतीय साहित्य का नाम दिया है। भारतीय साहित्य का मतलब संस्कृत साहित्य नहीं है। भारतीय साहित्य का अर्थ न तो किसी एक भाषा का साहित्य है जैसे ‘संस्कृत’ या ‘अंग्रेजी’ या ‘हिन्दी’। इसी तरह भारतीय साहित्य का अर्थ भाषाओं का संकलन मात्र नहीं है। भारतीय साहित्य का अर्थ ‘राष्ट्रीय’ और ‘क्षेत्रीय’ के नाम पर भाषाओं का विभाजन नहीं है। और उसमें से फिर सुविधानुसार चयन करना भी नहीं है।
भारतीय साहित्य की अवधारणा का बुनियादी आधार है साहित्य और मनुष्य के अन्तस्संबंध की अवधारणा। इस बुनियाद में क्रमशः समाज, व्यक्तिमन और उसके ऊपर सामाजिकमन का स्वराज है। इसे विश्वमन भी कहते हैं, इसमें ही साहित्य रचा जाता है। इसमें रचनाकार की प्रतिभा और सामाजिक समझ की केन्द्रीय भूमिका होती है।
भारतीय साहित्य की अवधारणा का भारतीय अन्तर्मन से गहरा सम्बंध है। यह खाली भाषाओं और बोलियों के साहित्य का संकलनमात्र नहीं है। अपितु इसमें भारतीय मन की धड़कनें सुनीं जा सकती हैं,  भारतीय साहित्य को जानने के लिए भारतीय मन के लक्षणों का ज्ञान बेहद जरूरी है।
भारतीय साहित्य की धारणा का तथाकथित भारतीयता या हिन्दुत्व के साथ कोई सम्बंध नहीं है। पश्चिम के विचारक प्राच्यवादी नजरिए से और भारत के पुनरूत्थानवादी इसे भारतीयता के नजरिए से देखते हैं। रामविलास शर्मा द्वारा “भारतीय साहित्य की भूमिका” नामक किताब को लिखने का मूल मकसद था देशी रूढिवादियों और पश्चिमी ‘वैज्ञानिक’ विचारकों से अलग हटकर भिन्न नजरिए से भारतीय साहित्य पर विचार करना। साथ ही यह भी लिखा कि इस किताब में भारतीय साहित्य और उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के कुछ पक्षों पर विचार किया गया है।
हिन्दी में हजारीप्रसाद द्विवेदी ने सबसे पहले “हिन्दी साहित्य की भूमिका” में हिन्दी साहित्य को भारतीय साहित्य के परिप्रेक्ष्य में देखने की बात कही थी और हिन्दी साहित्य को भारतीय साहित्य के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित किया था। डा.रामविलास शर्मा ने इससे आगे जाकर “भारतीय साहित्य की भूमिका” (1996) में नए और व्यापक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित किया है। इसी किताब में रामविलासजी ने एक अन्य महत्वपूर्ण बात कही है। उसे यदि मान लिया जाए तो साहित्येतिहास का समूचा ढाँचा ही बदल जाएगा। शर्माजी ने लिखा है,  “साहित्य का इतिहास हो, चाहे समाज का, वर्णव्यवस्था की