25 अप्रैल को दोपहर लगभग 12 बजे आये भूकंप ने नेपाल को बुरी तरह तबाह कर दिया है। राजधानी काठमांडो के अलावा घाटी के दो अन्य प्रमुख शहर भक्तपुर और ललितपुर सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। घाटी से बाहर लामजुंग, गोरखा, सिंधुपालचोक आदि जिलों में तबाही का आलम यह है कि वहां 70 प्रतिशत से अधिक मकान ध्वस्त हो चुके हैं। रिक्टर पैमाने पर 7.9 तीव्रता वाले इस भूकंप का केंद्र लामजुंग ही था। एक अनुमान के अनुसार देश के कुल 75 जिलों में से 39 जिले ऐसी हालत में पहुंच गये हैं कि उन्हें सामान्य स्थिति में लौटने में महीनों-सालों लग सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र के आकलन के अनुसार तकरीबन 80 लाख लोग बुरी तरह प्रभावित लोगों की श्रेणी में आते हैं। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक मृतकों की संख्या 6 हजार के करीब पहुंच चुकी है और अनुमान है कि यह संख्या 10 हजार से ऊपर जायेगी। नेपाली जनता की दुःख की इस घड़ी में हमारी पूरी संवेदना उनके साथ है।
पड़ोसी मित्र देश होने के नाते भारत ने बड़ी तत्परता से नेपाल को मदद पहुंचाई। यह इतनी बड़ी आपदा थी जिसका सामना नेपाल जैसा छोटा और साधनविहीन देश अकेले नहीं कर सकता था। इस संकट की घड़ी में भारत ने जिस तेजी से राहत सामग्री पहुंचाने के साथ साथ थल सेना, वायु सेना और नौसेना तक को सक्रिय किया वह अभूतपूर्व है। शुरुआती दो दिनों तक भारत की इस सहायता के पीछे किसी ने किसी तरह का संदेह नहीं किया लेकिन उसने अपने आचरण से ऐसा वातावरण तैयार कर दिया है जो उसके सब किये धरे पर पानी फेर सकता है। यहां से विमानों और हेलीकॉप्टरों का जो दस्ता गया उसका इस्तेमाल घायलों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने के लिए होना था लेकिन जो खबरें बाहर आ रही हैं उनसे पता चलता है कि इसे भारत से गये पत्रकारों की टीम को लेकर दूर दराज के इलाकों में पहुंचाने के लिए और फिर इन पत्रकारों के जरिए भारत सरकार और खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा के गीत चैनलों पर गाने के लिए किया जा रहा है। इस संदर्भ में एक उदाहरण काफी होगा- एबीपी न्यूज की एक बुलेटिन शुरू होते ही स्क्रीन पर नरेंद्र मोदी की तस्वीर के साथ बड़े अक्षरों में लिखा दिखेगा- ‘रक्षक’। फिर ऐंकर की आवाज- नेपाल में आये भूकंप में मदद का पहला हाथ बढ़ाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही थे। क्या चैनल के संचालकों को यह बताने की जरूरत है कि यह तो एक पड़ोसी होने के नाते भारत का कर्तव्य ही था। फिर कुछ मिनट बाद स्क्रीन पर आता है- ‘नहीं हुई मन की बात- नेपाल का दिया साथ’। शायद उस दिन नरेंद्र मोदी अपने बहुप्रचारित रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में नेपाल के भूकंप पर अपने उद्गार प्रकट किये हों। दृश्य बदलता है और फिर स्क्रीन पर आता है- ‘नेपाल का रक्षक’। फिर शुरू होता है उन भारतीयों का बाइट जो हवाई जहाज से नई दिल्ली पहुंचाए जा रहे हैं और मोदी की प्रशंसा कर रहे हैं। इसके बाद मनीषा कोइराला के ट्वीटर की पंक्तियां पढ़ी जाती हैं जिनमें उन्होंने नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की है। इसके बाद ऐंकर की आवाज आती है कि मोदी सरकार की भेजी मदद के लिए नेपाल में भी मोदी मोदी के नारे लग रहे हैं। स्क्रीन पर एक समूह मैडिसन स्टाइल में ‘मोओदी- मोओदी’ नारे लगा रहा है। इस दृश्य को देखकर फेसबुक पर किन्हीं निमिष श्रीवास्तव ने टिप्पणी की- ‘एबीपी न्यूज झूठ फैला रहा है। उनके संवाददाता नेपाल में लोगों को मोदी मोदी नारे लगाने के लिए कह रहे हैं जबकि हवाई अड्डे पर उन्हीं लोगों से बात की जा रही है जिन्हें भारत की ओर से सुविधाएं मिल रही हैं। जो परेशानहाल हैं उनको ये संवाददाता पूछते भी नहीं।’ नेपाल के अत्यंत विश्वसनीय मीडिया ग्रुप ‘कांतिपुर रेडियो’ ने एक रिपोर्ट जारी की जिसका शीर्षक है ‘उद्धारभंदा प्रचार बढ़ी’ मतलब राहत के बहाने अपना प्रचार। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत सरकार अपने प्रचार के लिए हेलीकॉप्टरों में 6-7 मीडियाकर्मियों को लेकर विभिन्न इलाकों में पहुंचा रही है।
इतना ही नहीं नेपालियों और भारतीयों के बीच जिस तरह का भेदभाव बरता जा रहा है उससे भी वहां काफी असंतोष है। एक नेपाली वेब साइट ने ‘त्रिभुवन विमान स्थल भारत को ‘कब्जा’ मा’ शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें बताया गया है कि भूकंप के पहले दिन जब चीन ने अपने 12 हेलीकॉप्टर राहत के लिए रवाना करने की पेशकश की तो भारतीय अधिकारियों की सलाह पर नेपाल सरकार ने यह कहकर मना कर दिया कि हवाई अड्डे पर कोई जगह नहीं है। इस रिपोर्ट को मनगढंत नहीं कहा जा सकता क्योंकि 29 अप्रैल को बीबीसी ने इसी आशय की एक रिपोर्ट जारी की जिसका शीर्षक है ‘नेपालः राहत के लिए भारत और चीन में होड़’। दरअसल नेपाल पर अपना प्रभुत्व बनाये रखने की भारत और चीन के बीच लंबे समय से होड़ चल रही है लेकिन इस महाविपदा के समय भी यह होड़ जारी रहेगी सोच पाना मुश्किल है। लामजुंग से थोड़ा और उत्तर की ओर जायेंगे तो चीन की सीमा शुरू हो जाती है और इन सीमावर्ती गांवों में भूकंप की वजह से भारी तबाही हुई है। ये इतने दुर्गम इलाके हैं कि यहां पहुंचना भी बहुत मुश्किल है। भूकंप ने भारत को एक अनूठा अवसर प्रदान कर दिया है और वह इसकी आड़ में चीन की सीमा तक चक्कर लगा ले रहा है जो सामान्य स्थिति में संभव ही नहीं था। ‘सेतो परेवा’ नामक नेपाली वेब साइट ने 28 अप्रैल को एक समाचार दिया जिसका शीर्षक है- ‘उद्धारका नामम जासूसी धंदा बंद गर- चीन’। इस समाचार में चीन ने नेपाल सरकार से आग्रह किया है कि वह भारत को कहे कि अपने जासूसी विमानों को वह चीन की सीमा से दूर ही रखे। नेपाल का सोशल मीडिया इस तरह की खबरों से भरा हुआ है और यह भारत के लिए किसी भी हाल में अच्छी बात नहीं है।
29 अप्रैल को नई दिल्ली से प्रकाशित ‘जनसत्ता’ में पुष्परंजन ने ‘ऐसी सहायता पर मुग्ध मत होइये’ शीर्षक लेख में लिखा कि ‘प्रधानमंत्री मोदी इस समय ‘मुग्ध्मभाव’ से गुजर रहे हैं। पूरी संसद अगर ‘वाह मोदी जी’ के संवेद स्वर के साथ खड़ी है, देश के गृह मंत्री प्रशंसा के पुष्प वर्षा रहे हों ऐसे में भूमि अधिग्रहण विधेयक पर चारों ओर से समर्थन दिखने लगता है।’ नेपाल में राहत के नाम पर आरएसएस के जोड़ीदार हिंदू स्वयं सेवक संघ के लोगों को बड़ी संख्या में लगाने पर इस लेख में टिप्पणी की गयी है- ‘अशोक सिंघल के समय से ही विहिप हिंदू राष्ट्र नेपाल घोषित किये जाने के पुराने एजेंडा पर काम कर रहा है। पर यह दुःखद है कि विहिप नेता अंतर्राष्ट्रीय त्रासदी को धर्म के चश्मे से देख रहे हैं।’ ध्यान देने की बात है कि आरएसएस के सहकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले कई सारे कार्यकर्ताओं के साथ नेपाल पहुंच चुके हैं। भूकंप आने के अगले दिन 26 अप्रैल को ही पीटीआई ने एक समाचार दिया था जो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संचार विभाग के प्रमुख मनमोहन वैद्य के हवाले से था। इसमें कहा गया था कि जल्दी ही भारी संख्या में आरएसएस के स्वयं सेवक नेपाल जायेंगे और हिंदू स्वयं सेवक संघ के साथ मिलकर भूकंप पीड़ितों के लिए काम करेंगे।
बकौल पुष्परंजन जिस तरह से चैनलों और सोशल मीडिया पर भाजपा के कुछ नेता इसे ‘विजय अभियान’ के रूप में भुनाने लगे हैं उससे सारे किये पर पानी फिरने का खतरा बना हुआ है।
जनसत्ता के इसी लेख में इस बात पर खेद प्रकट किया गया है कि भाजपा के आनुषांगिक संगठनों के नेता आपदा में भी राजनीति करने पर आमादा दिखते हैं। इसमें लिखा गया है- ‘बिहार के गोपालगंज में सोमवार को विराट हिंदू समागम था जहां विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया पधारे हुए थे। तोगड़िया ने बयान दिया कि नेपाल में सबसे अधिक हिंदुओं का घर उजड़ा है इसलिए धन संग्रह करें और नेपाल भेजें। तोगड़िया ने एलान किया कि भूकंप में मृत हिंदुओं के बच्चों को विश्व हिंदू परिषद अपनी शरण में लेगा और उनकी मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था करेगा। ऐसा ही बयान किसी मुसलमान देश का कठोरपंथी नेता दे तब क्या होगा या वैटिकन की ओर से सिर्फ नेपाल के ईसाइयों के लिए सहायता की घोषणा हो तो कैसा लगेगा?’ उन्होंने बाबा रामदेव के इस एलान का भी जिक्र किया कि वह 500 बच्चों को गोद लेंगे और कहा कि ‘उनकी मंशा को सर्वधर्मसमभाव वाले शक की नजर से देख रहे थे।’
अतीत में कई ऐसे मौके आये हैं जब प्राकृतिक विपदा के समय भारत ने पड़ोसी देशों की बढ़ चढ़ कर मदद की है लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि इसका श्रेय लेने के लिए उसने हजार तरह का जुगत तैयार किया हो। इस बार जो कुछ हो रहा है वह अभूतपूर्व तो है ही अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण भी है।
भारत हो या चीन, इस महाविपत्ति के समय भी अगर राहत पहुंचाने के पीछे कूटनीतिक लाभ उठाने का गणित काम कर रहा हो तो यह सचमुच चिंता की बात है।
आनंद स्वरूप वर्मा
समकालीन तीसरी दुनिया, मई 2015 का संपादकीय
आनंद स्वरूप वर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व संमकालीन तीसरी दुनिया के संपादक हैं।