भूमि अधिग्रहण मुद्दा: अदालतों के फैसले से किसानों में बंधी आस
भूमि अधिग्रहण मुद्दा: अदालतों के फैसले से किसानों में बंधी आस
तनवीर जाफरी
हमारे देश भारतवर्ष में राजनैतिक हल्क़ों में 'मसीहा शब्द का प्रयोग अत्यधिक कसरत से होते हुए देखा जा सकता है। लगभग सभी राजनैतिक पार्टियों में तमाम नेता ऐसे मिल जाएंगे जो इस खुशफ़हमी में जीते आ रहे हैं कि वे अपने सामाजिक जीवन में किसी न किसी वर्ग विशेष के लिए मसीहा के समान है। यानी कोई स्वयं को किसानों का मसीहा कहने में आत्मसंतोष महसूस करता है तो कोई दलितों का स्वयंभू मसीहा बना बैठा है। कोई मज़दूरों का मसीहा तो कोई छात्रों का। गोया तमाम राजनेता व राजनैतिक दल किसी न किसी वर्ग, जाति या धर्म की मसीहाई का दम भरते रहते हैं। इन तथाकथित मसीहाओं में सबसे अधिक 'मसीहाई या तो दलितों की की जाती है या फिर देश के अन्नदाता समझे जाने वाले विशाल एवं वृहद् कृषक समाज की। सही मायने में तो देश का कृषक समाज स्वयं ही इसलिए मसीहा कहे जाने योग्य है क्योंकि वह तो स्वयं ही अन्नदाता है तथा सभी विपरीत परिस्थितियों तथा हर मौसम में अपना खून-पसीना बहाकर अपने खेतों में वह अन्न पैदा करता है जो पूरे देशवासियों के पेट भरने का साधन बनता है। गोया हमारे खाद्यान्न का जि़ मा हमारे देश के किसानों के सिर पर ही है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सही मायने में तो देश का कृषक समाज ही समस्त देशवासियों का वास्तविक मसीहा है।
परंतु जब तथाकथित एवं स्वयंभू मसीहा नेता या राजनैतिक दल के रूप में किसानों की मसीहाई का दम भरते दिखाई देते हैं तो हमें कभी सिंगूर नज़र आता है तो कभी नंदीग्राम। कभी जैतापुर तो कभी भट्टा-पारसौल आदि। गोया किसानों की हमदर्दी का दम भरने वाली राजनीति, सत्ता या नेता बिना किसानों से पूछे हुए व बिना किसी सलाह-मशविरे के देश के विकास के नाम पर जब और जहां चाहते हैं किसानों की भूमि अधिगृहित कर लेते हैं। और यदि किसान इसका विरोध करता है तो उसे मिलती हैं पुलिस की लाठियां और गोलियां। उस समय किसानों के यह राजनीतिज्ञ रूपी स्वयंभू मसीहा किसानों तथा उनकी भावी नस्लों के लिए किसानों को सबसे बड़े दुश्मन नज़र आने लगते हैं। और जब सरकार व नेताओं की नीतियों व इनकी चालबाजि़यों से दु:खी किसान अदालत का दरवाज़ा खटखटाता है तो आखिरकार उसे वहां से न्याय मिल ही जाता है। जैसा कि पिछले दिनों दिल्ली के समीप नोएडा क्षेत्र के तमाम किसानों के साथ हुआ। नोएडा-आगरा एक्सप्रेस मार्ग हेतु अधिग्रहण की गई किसानों की भूमि के संबंध में और भी सैकड़ों याचिकाएं किसानों द्वारा अदालत में डाली गई हैं। उ मीद है कि इन सभी मामलों में अदालतें किसानों को उनकी भूमि वापस किए जाने के ही आदेश देगी । उधर हरियाणा के मुख्य मंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी हरियाणा में अधिगृहित की गई ज़मीनों के सिलसिले में किसानों को बड़ी राहत देते हुए गत् 6 माह के दौरान अधिग्रहण की गई ज़मीनों के अधिग्रहण पर अगला कानून बनने तक रोक लगा दी है। परंतु सड़क, सीवरेज सिस्टम,नहर व गंदे पानी की निकासी के नाले व ड्रेनेज योजना आदि के लिए अधिगृहित की गई ज़मीन पर यह रोक प्रभावी नहीं होगी।
इस घटनाक्रम से जुड़े कई प्रश्र ऐसे हैं जो केंद्र सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति की धारा 4 को तो चुनौती देते ही हैं साथ ही साथ राज्य सरकारों की नीयत तथा उनकी भूमि का यहां तक कि भविष्य में उसकी विश्वसनीयता तक पर प्रश्रचिन्ह लगाते हैं। राज्य सरकारें बड़ी आसानी से किसानों की भूमि का अधिग्रहण इस बहाने से कर लेती हैं कि 'भूमि अधिग्रहण कानून की धारा 4 तो केंद्र सरकार की परिधि में आती है। राज्य सरकारें तो केवल उसका अनुसरण मात्र करती हैं। परंतु भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 4 की व्यवस्था देश की विकास संबंधी योजनाओं को मद्देनज़र रखते हुए है। राज्य सरकारें दुहाई तो केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए भूमि अधिग्रहण कानून की देती हैं परंतु उसकी आड़ में सरकारें अपने चेलों,चट्टेबट्टों,च मचों तथा शुभचिंतकों के बीच किसानों की अधिग्रहण की गई ज़मीन का बंदरबांट करने लग जाती हैं। यदि सड़क बनाने के बहाने किसानों की ज़मीन उनसे ली गई है तो वहां सड़क के साथ-साथ नई टाऊनशिप बनने लगती है। बिल्डर्स नई-नई कालोनियां व गगनचुंबी इमारतें बनाने लगते हैं। शॉपिंग माल, निजी स्कूल, मंहगे निजी अस्पताल आदि बनाए जाते हैं। गोया किसानों के मसीहा हमारे अन्नदाता कीे ज़मीनों को काऩून की आड़ में हड़प कर अपने चहेतों को लाभ पहुंचाने का खेल सरेआम खेलने लग जाते हैं परिणामस्वरूप एक उद्योगपति या बिल्डर या निवेशक धनवान से और अधिक धनवान बनने लग जाता है। जबकि अन्नदाता किसान को चंद पैसे देकर उसे उसी की ज़मीन के स्वामित्व से बेद$खल कर दिया जाता है। और कल का यह अन्नदाता स्वयं अन्न के एक-एक दाने के लिए तरसने लगता है तथा भूमिहीन हो कर दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो जाता है। और आखिरकार जब यही किसान आक्रामक रुख अख्तियार करता है तो उसे यकीन हो जाता है कि किसानों व गऱीबों की मसीहाई का दम भरने वाले नेता ही उनके व उनकी भावी नस्लों के सबसे बड़े दुश्मन हैं उस समय नंदीग्राम-सिंगूर तथा भट्टा पारसौल जैसी हिंसक घटनाओं को रोक पाना मुश्किल हो जाता है।
इस प्रकरण में जहां किसान, नेताओं व राजनैतिक दलों द्वारा स्वयं को ठगा हुआ महसूस करते हैं तथा सरकार के प्रति उनमें अविश्वास की भावना पैदा होती है वहीं माननीय अदालतों द्वारा किसानों के पक्ष में फैसले सुनाए जाने के बाद बिल्डर्स,निजी कंपनियां, निवेशक तथा औद्योगिक घरानों का भी विश्वास राज्य सरकारों से पूरी तरह से उठ जाता है। ज़ाहिर है कोई भी बिल्डर या औद्योगिक घराना अपनी किसी योजना को लेकर राज्य सरकार के निमंत्रण पर या उससे हुए समझौते के तहत ही किसी क्षेत्र विशेष में अपना निवेश करता है। उसके बाद मकान या लैट के ज़रूरतमंद लोग नए प्रोजेक्ट की ओर आकर्षित होते हैं तथा अपनी जमापूंजी दांव पर लगाकर अपने पैसों को सुरक्षित महसूस करते हुए किसी योजना अथवा आवासीय स्कीम में लगा देते हैं। यह सारे कदम राज्य सरकार के विश्वास पर उठाए जाते हैं। परंतु जब माननीय उच्च न्यायालय अथवा उच्चतम न्यायालय किसानों को उनकी ज़मीन वापस किए का आदेश दे दे जैसाकि पिछले दिनों नोएडा-आगरा यमुना एक्प्रेस हाईवे के किसानों के मामले में दिया गया है, ऐसे में राज्य सरकार की विश्वसनीयता स्वयं ही समाप्त हो जाती है। इस पूरे घटनाक्रम में आ$िखर दोषी है तो कौन? क्या किसान दोषी है जिसकी ज़मीन का अधिग्रहण बिना उसके सलाह-मशविरे तथा बिना उसकी शर्तों को सुने व स्वीकार किए कर लिया गया? और आ$िखर कोई उद्योगपति या बिल्डर भी इसके लिए क्यों दोषी है जोकि राज्य सरकार के निमंत्रण पर अथवा उसके साथ हुए $करार के तहत किसी क्षेत्र विशेष में अपनी योजना पर काम कर रहा है? इसी प्रकार वह मध्यमवर्गीय निवेशक भी क्योंकर दोषी हो सकता है जिसने अपने व अपने बच्चों के भविष्य के मद्देनज़र अपनी जमापूंजी अथवा कर्ज लेकर किसी आवासीय योजना में अथवा अन्यत्र पूंजीनिवेश किया हो? इस पूरे प्रकरण में यदि सबसे अधिक गैर जिम्मेदार व संदेहास्पद भूमिका नज़र आती है तो वह केवल राज्य सरकार की अथवा उनके तथाकथित सलाहकारों व शुभचिंतकों की है जोकि सत्ता का दुरुपयोग कर बड़े पैमाने पर धांधली करने की कोशिश करते है तथा कानून की आड़ लेकर किसानों को भूमिहीन करने तथा उद्योगपतियों,बिल्डर्स आदि की सांठगांठ से स्वयं मोटी रकम कमाने का प्रयास करते हैं। गत् दो माह से हरियाणा के अंबाला शहर में भी 6 गांवों के किसानों ने अपनी भूमि अधिग्रहण के विरोध में धरना दे रखा है। सोचने का विषय यह है कि जो किसान परिवार अपना घर-द्वार, सुख-चैन सब कुछ पीछे छोड़कर जि़ला कार्यालय के बाहर गर्मी, लू-धूप, बारिश तथा मच्छरों की परवाह किए बिना बैठे हों क्या यह किसान सरकार को अपनी ज़मीनों का अधिग्रहण सरकार की अपनी शर्तों पर आसानी से करने देंगे? चाहे महाराष्ट्र का जैतापूर हो चाहे बंगाल का सिंगूर या नंदीग्राम या अलीगढ़ व नोएडा के किसान या गुडग़ांव,भट्टा-पारसौल या अंबाला के किसान। सरकार को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि जब किसान अपनी ता$कत का एहसास कराने पर तुल जाता है तब टाटा जैसे देश के प्रमुख उद्योगपति को भी अपना उद्योग पश्चिम बंगाल से हटाना पड़ जाता है। ऐसे में राज्य सरकारों को किसानों से टकराने या उनकी भूमि का जबरन अधिग्रहण किए जाने जैसे विचार अपने ज़ेहन से निकाल देने चाहिए। इसके बजाए समस्त राज्य सरकारों को किसानों की उन्नत कृषि तकनीक के उपाय सुझाने चाहिए।
पिछले दिनों हरियाणा के मु यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा इज़राईल जैसे शुष्क देश के दौरे पर गए थे। वहां उन्होंने देखा व समझा कि कम से कम पानी की उपलब्धता में अधिक से अधिक पैदावार कैसे की जाती है। हुड्डा इज़राईल से ऐसे तमाम गुण लेकर आए हैं जो वे राज्य के किसानों से सांझा करने की योजना बना रहे हैं। ऐसी ही योजनाएं यदि उत्तर प्रदेश,बिहार,मध्यप्रदेश व राजस्थान जैसे किसानों को भी न केवल बताई जाएं बल्कि उन्हें अमल में लाने हेतु किसानों की आर्थिक सहायता करने व उन्हें प्रशिक्षण दिए जाने की व्यवस्था भी की जाए तो न केवल देश का छोटे से छोटा किसान और अधिक खुशहाल हो सकेगा बल्कि इन राज्यों से किसानों व श्रमिकों के अन्य राज्यों की ओर होने वाले पलायन के सिलसिले को भी नियंत्रित किया जा सकेगा।


