भूमि अध्यादेश किसान-मजदूर विरोधी है, सरकार झूठे प्रचार में उलझा रही है
भूमि अध्यादेश से खाद्य सुरक्षा पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा
नई दिल्ली, फरवरी 24: बहुत से अखबारों में यह खबर आने कि एनडीए सरकार बजट सत्र के पहले भूमि अध्यादेश ( भूमि अधिग्रहण बिल ) पर पुनर्विचार कर रही है, जनआअंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय ने दोहराया हैं कि “भूमि अध्यादेश 2014 रद्द होना ही चाहिए. इस मुद्दे पर किसी भी तरह के समझौते की गुंजाईश नहीं है।”
मेधा पाटकर ने कहा यह भूमि अध्यादेश किसानों और प्रभावित परिवारों की “सहमति” और “सामाजिक प्रभाव आंकलन” के अत्यंत महत्वपूर्ण जनतांत्रिक प्रावधानों पर हमला करता है, जो कि हमें नामंजूर है।
24 फरवरी का महाधरना जन आन्दोलानों का राष्ट्रीय समन्वय, अखिल भारतीय वन श्रमजीवी संघ, अखिल भारतीय किसान सभा, इंसाफ, नर्मदा बचाओ आन्दोलन, युवा क्रांति, केम्पेन फॉर सर्वाइवल एंड डिग्निटी, छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन, जन पहल, किसान संघर्ष समिति, जन संघर्ष समन्वय समिति, दिल्ली सोलिडेरिटी ग्रुप, घर बचाओं घर बनाओं आन्दोलन, नेशनल फिशवर्कर फ़ोरम, राष्ट्रीय किसान संगठन, और अन्य समूहों द्वारा आयोजित किया गया है. साथ ही, पटना, लखनऊ, लुधियाना, और अन्य जगहों पर देश भर में आन्दोलन और विरोध प्रदर्शन आयोजित किये गए हैं.
मेधा ने कहा- “सरकार यह झूठा प्रचार कर रही है कि नया भूमि अध्यादेश किसानों के लिए फायदेमंद है और गांवों में बुनियादी ढांचों के निर्माण जैसे पेयजल आपूर्ति, बिजली, सड़क और गरीबों के लिए घरों के निर्माण हेतु आवश्यक है. मगर साक्ष्यों से कुछ और ही स्पष्ट होता है:
1. बार – बार यह देखा जा रहा है कि यह भूमि अध्यादेश प्रधानमन्त्री के प्रमुख कार्यक्रम “मेक इन इण्डिया” को बढ़ावा देने के लिए लाया गया है. यह भी माना जा रहा है कि भूमि संबंधी समस्याओं की वजह से जो बिलियन डॉलर निवेश अटका हुआ है, इन सभी समस्याओं को खत्म को ख़त्म करने लिए इस अध्यादेश का सहारा लिया जा रहा है.
2. न तो किसी राज्य सरकार ने और न ही केन्द्रीय सरकार ने 2013 के भूमि अधिनियम के तहत भूमि अधिग्रहित करने के प्रयास किये, फिर भी भूमि अधिग्रहण में देरी और जटिल प्रक्रिया के झूठे भय के आधार पर भूमि अध्यादेश 2014 लाया गया.
3. 2013 का अधिनियम 30 सालो की अवधि में विकसित आम सहमति का परिणाम था तब बिना किसी से परामर्श किये जल्दबाजी में एक अध्यादेश क्यों लाया गया?
4. अन्य 13 अधिनियमों में मुआवजे के प्रावधान को विस्तारित करने का कदम अच्छा है पर बड़े स्तर पर भूमि विवाद में सिर्फ मुआवजा ही एकमात्र मुद्दा नहीं होता. सहमति और सामाजिक प्रभाव आंकलन नए कानून की आत्मा हैं, जिनके बिना 1894 के काले कानून और जबरन अधिग्रहण पर ही हम वापस पहुँच जायेंगे.
5. देश की खाद्य सुरक्षा पर यह भूमि अध्यादेश गंभीर प्रभाव डालेगा, क्योंकि यह तेजी से बहु फसलीय भूमि का अधिग्रहण करने की अनुमति देगा. “
एनएपीएम की तरफ से कहा गया है कि खाद्य सुरक्षा को खतरा है। भारत में अभी कुल उपजाऊ भूमि 179.9 मिलियन हेक्टेयर है, जो विश्व के 17% मानव आबादी का भरण पोषण करती है. 2011-12 में भारतीय किसानों ने 259.29 मिलियन टन अनाज की पैदावार की फिर भी देश में 925 मिलियन भूख और कुपोषण के शिकार हैं. विश्वभर के कुपोषित देशो में हम दूसरे स्थान पर हैं. सरकार का अनुमान है कि वर्तमान में इसका सकल घरेलु उत्पाद में 13% योगदान है जो 2030 तक घटकर सकल घरेलु उत्पाद का 6% रह जायेगा, क्या हम उनमें से कई लोगों को रोजगार देने जा रहे हैं? 2010-11 के कृषि आंकड़ों के अनुसार, 52% भारतीय श्रमिक किसी न किसी रूप में कृषि पर निर्भर हैं, प्रोत्साहन की बजाय 1995 से, 3 लाख किसानों ने आत्महत्या की और मुख्यरूप से खेती से जुड़े 2,358 किसान हर दिन खेती छोड़ रहे हैं <मुख्य खेतिहर किसान – साल में कम से कम 180 दिन खेती के काम से जुड़े>. 1991 तक मुख्य खेतिहर किसानों की संख्या में वृद्धि हुई थी. इसके बाद, 1999-2001 के बीच 7.2 मिलियन की गिरावट और 2001-2011 के बीच किसानों की संख्या में तकरीबन 7.7 मिलियन की गिरावट आई. इन 20 सालों में, 15 मिलियन मुख्य खेतिहर किसान खेती करना बंद कर चुके हैं. इसमें लाखों सीमांत किसानों को जोड़े. खेती की लागत बढ़ रही है, हर भारतीय किसान परिवार की औसतन मासिक आय 2115 रूपये है और हर भारतीय किसान परिवार का मासिक व्यय 2700 रूपये है, इस खेती के संकट के लिए सरकार क्या कर रही है?
सत्याग्रही मेधा पाटकर, लिंगराज आजाद आदि ने कहा कि भूमि अध्यादेश किसानों की भलाई के लिए नहीं है, बल्कि यह सिर्फ और सिर्फ कॉर्पोरेट के हितों के लिए लाया गया है. साफ़ हो गया है कि एनडीए सरकार सिर्फ कॉर्पोरेट्स और निजी व्यवसायों के लिए ही योजनाये लायी है न कि कृषि क्षेत्र और किसानों के लिए. उन्होंने जोर देकर कहा जब तक भूमि अध्यादेश रद्द नहीं होता, 24 फरवरी का आंदोलन जो कि किसान संगठनों, जन आन्दोलनों, ट्रेड यूनियनों द्वारा चलाया जाएगा, वह तेज ही होता जायेगा. एकता परिषद के 5000 लोगों का मार्च 24 फरवरी को जंतर मंतर को मिलेगा और अन्ना हजारे और अन्य लोग भी इसमें जुड़ेंगे.