भेड़ों के ख़िलाफ़ भेड़ियों की वकालत
भेड़ों के ख़िलाफ़ भेड़ियों की वकालत
भेड़ों के ख़िलाफ़ भेड़ियों की वकालत
- हान्स माग्नुस एन्त्सेन्सबैर्गर
गिद्ध क्या वनफूल खाकर जिएगा ?
क्या चाहते हो आख़िर सियार से,
वो भेड़िये की खाल ओढ़ ले ? क्या
अपने दांत उसे ख़ुद खींच निकालने हैं ?
नापसंद क्या है तुम लोगों को
नेतागिरी करने वालों और महंतों में,
बेवक़ूफ़ों की तरह टकटकी क्या लगाते हो
क्या देखते हो टेलीविज़न के पर्दे पर ?
कौन जनरल की पैंट पर
सीता है ख़ून की लकीर ? कौन
अलग करता है मुर्ग़े की टांग तोंदू के सामने ?
कौन टांगता है अकड़कर तमगा
अपनी तोंद के ऊपर ? कौन
लेता है बख़्शीश, चांदी के टुकड़े
चुप रहने की ख़ातिर ? माल
बहुत है चुराया हुआ, चोर नदारद; कौन
देता है उन्हें शाबासी, कौन
बांटता है तमगे, कौन
तड़पता है झूठ की ख़ातिर ?
आईने में देखो : कायर
सच्चाई की कशमकश से कतराते हुए,
सीखने को नाक़ाबिल, सोचने की ज़िम्मेदारी
भेड़ियों के सुपुर्द करते हुए,
नकेल तुम्हारा सबसे क़ीमती गहना,
हर धोखा मंज़ूर तुम्हारी बेवकूफ़ी को, किसी ढाढ़स पर
एतराज़ नहीं तुम्हें, हर धौंसबाज़ी
तुम्हारी बर्दाश्त के दायरे में.
भेड़ कहीं के, बिरादर हैं
तुम जैसों के, सिर्फ़ कौए :
एक की चमक से दूसरा बदहाल.
भाईचारा क़ायम है
भेड़ियों के बीच :
साथ-साथ चलते हैं उनके चप्पू.
डकैतों की जै-जै : तुम
दावत देते हो बलात्कार को,
गिर पड़ते हो हुक़्मपरस्ती के गंदे बिस्तर पर
पूंछें हिलाते हुए
झूठ बोले जाते हो तुम, बरबाद
होना चाहते हो तुम. तुम
दुनिया को नहीं बदलोगे.
अनुवाद - उज्ज्वल भट्टाचार्य
(Hans Magnus Enzensberger poetry translated by Ujjwal Bhattacharya)
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