भोपाल गैस त्रासदी - वो काली रात, जिसकी सुबह कभी नहीं हुई
DB LIVE | 02 DEC 2016 | BHOPAL : 32 Years of The World's Worst Industrial Disaster

भारतीय इतिहास की सबसे दर्दनाक त्रासदी भोपाल गैस कांड को आज 32 वर्ष पूरे हो गए।
1984 में 2 और 3 दिसंबर की दरमियानी रात हुए इस हादसे से 5 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित हुए और करीब 15 हजार से ज्यादा जानें गई थी।
भोपाल गैस त्रासदी। नाम लेते ही जहन में उस काली रात की याद उभर आती है, जिसकी सुबह कभी नहीं हुई।
1984 में 2 दिसंबर का दिन एक आम दिन की ही तरह शुरू हुआ। लेकिन जैसे ही घड़ी में रात के 12 बजे। यानी दिन का पहर 3 दिसंबर में दस्तक दिया साथ ही शहर में मौत ने भी दस्तक दे दी।
किसी ने शायद ही सोचा होगा कि 2 दिसंबर का आम दिन, रात की मौत बनकर खत्म हो जाएगा।

पूरा शहर खांस रहा था। शहर दर्द के मारे चीखना चाहता था। पर खांसी गला दबाए बैठी थी हलक से आवाज नहीं निकल रही थी। मुंह से झाग निकल रहा था।
जिसमें जितनी हिम्मत थी, वह अस्पताल की ओर भागा।
जो अस्पताल से पहले गिरे उन्होंने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। और जो अस्पताल तक पहुंच पाए, उन्हें भी बचाया ना जा सका, क्योंकि तब कर डाक्टर्स को पता ही नहीं था कि उन्हें हुआ क्या है। और उन्हें क्या दवा दी जाए।
सबसे ज्यादा भीड़ थी हमीदिया और जयप्रकाश अस्पताल में। जहां इंसानी रूप में मौत इधर-उधर भाग रही थी।
देखते ही देखते पूरे शहर का दम घुटने लगा।
आखों में जलन, उल्टी और खांसी ने कई जिंदगियों को अपनी चपेट में ले लिया।
कई जिंदगियां तो रात के अंधेरे में हमेशा के लिए सो गईं।
सुबह तक अस्पताल भी लाशों से पट गया।

मंजर ऐसा हुआ कि अस्पतालों में लाशें रखने की जगह ही ना बची। लिहाज़ा खुले आसमान के नीचे कई जिंदगियों ने दम तोड़ दिया।
सुबह-होते होते पूरे शहर में मौतों का मातम मन रहा था। हर जगह चीख-पुकार थी। और सुबह की रोशनी धुंध भरी थी।
हवा में जहर घुली हुई थी। लेकिन वजह क्या है इसका पता लगने तक पांच लाख जिंदगियां जहरीली हवा का शिकार हो चुकी थीं और हज़ारों मौतें हो चुकी थी।
3 दिसंबर की सुबह भोपाल के लिए रोशनी की जगह अंधेरा लेकर आई। खुशी की जगह कभी ना भरने वाले जख्म लेकर आई।
वजह का पता चलने तक कईयों ने अपनों को खो दिया था। शहर में जगह-जगह लाशें बिखरी हुई थीं।
इस घटना में झुग्गी बस्ती वाले सबसे ज्यादा प्रभावित हुए, क्योंकि वह लोग मौत के उस कारखाने के किनारे रहते थे, जिसने दुनिया के इतिहास में सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी को जन्म दिया।
भोपाल स्थित 'यूनियन कार्बाइड' नामक कंपनी के कारखाने से 'मिथाइल आइसो साइनाइट' यानी मिक नामक एक ज़हरीली गैस का रिसाव हुआ, जिससे कीटनाशक बनाया जाता है।
इस गैस के रिसाव से ही हवा में मौत तैर रही थी।

गैस के रिसाव को लापरवाही का नाम दिया गया क्योंकि 2 दिसंबर की रात यूनियन कार्बाइड के उत्पादन नियंत्रण कक्ष में बैठे स्थाई कर्मचारियों को कुछ रासायनिक रिसाव की शंका हुई।
कर्मचारी ने तत्काल ही भूमिगत रसायन भंडारण टैंक का निरीक्षण किया तो उन्हें वहां रसायन 'मिथायल आइसो सायनाइड' का मामूली-सा रिसाव मिला, जिसे उन्होंने दैनिक सुरक्षित रसायन रिसाव के छिटपुट रूप में लिया और उसके निदान पर ध्यान नहीं दिया।
अंजाम यह हुआ कि हज़ारों लोग मौत के मुंह समा गए और लाखों जिंदगियां कई वर्षों तक इसका दर्द झेलती रही। या कहें कि आज भी झेल रही है।
दुर्घटना के कई वर्षों बाद भी भोपाल के इलाके में मानसिक और शारीरिक तौर पर विकलांग पैदा होने वाले बच्चों की संख्या में भारी वृद्धि देखने को मिली।
यूनियन कार्बाइड ऑफ़ इंडिया लिमिटेड को सुप्रीम कोर्ट ने फ़रवरी 1989 में आदेश दिया कि वह गैस पीड़ितों को 47 करोड़ डॉलर का मुआवज़ा दे।
कंपनी ने आदेश मानते हुए राशि जमा करा दी।

पीड़ितों को मुआवजा तो दिया गया, लेकिन वह मुआवजा बेहद कम था।
भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों को इंसाफ चाहिए था। उनके मुताबिक कारखाने के मुख्य अधिकारी वारेन एंडरसन को सजा मिलनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया, क्योंकि 2014 में खबर आई कि वारेन एंडरसन की मौत हो चुकी है।
लिहाज़ा आज भी इंसाफ की गुहार जारी है।