मनीष अग्रवाल
अखिलेश लाख अच्छा चाहें तो क्या होता है, वही होता है जो मंजूरे भस्मासुर होता है।
उत्तर प्रदेश में 231 विधानसभा सदस्यों के प्रचण्ड बहुमत और भारतीय राजनीति में सबसे अनुभवी और जमीनी-राजनीतिक व्यक्ति समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव के पुत्र व भारत के सबसे युवा मुख्यमंत्री होने के बावजूद कर्मयोगी अखिलेश आज उत्तर प्रदेश की राजनीति में थके और हारे से नजर आते हैं ।
थके और हारे होने के कारणों में खुद अखिलेश और मुलायम का "क्या करें क्या न करें ये कैसी मुश्किल हाय" वाली बात नजर आती है, न तो सरकार और अखिलेश के पास योजनाओं की कमी है और न ही मुलायम का अनुभव अपने पुत्र की राजनीति को सिंचित करने में और अपने राजनीतिक अनुभव साझा करने में कम है।
पार्टी के विधायकों मंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं का कार्यकर्ताओं से संवादहीनता और अपने निजी स्वार्थों का पार्टी विचारधारा और पार्टी नेता के दिशा निर्देशों से अलहदा होना एक प्रमुख कारण है, और सूबे की व्यवस्था सँभालने के जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारीयों का पार्टी नेताओं के मतभेदों में मजा लेते हुए अपने स्वार्थों की पूर्ती में लगे रहना और विपक्षी दलों के नेताओं की तुष्टि पूर्ति में आगामी सरकार की संभावनाओं के मद्देनजर लगे रहना एवं मुख्यमंत्री को उनकी विकासशील योजनाओं के बारे में गलत जानकारियाँ देना दूसरा प्रमुख कारण नजर आता है।
कर्मयोगी अखिलेश से तात्पर्य ये है कि अखिलेश यादव, जो कि ऑस्ट्रेलिया से पढ़कर लौटे और साढ़े 13 वर्ष अपने अति अनुभवी पिता के सानिध्य में सांसद रहकर राजनीति के गुण सीखे और पर्यावरण प्रेमी हैं, ने विपरीत परिस्थितियों में प्रदेश को अपनी कड़ी मेहनत से मथकर 2012 में 224 सीट हासिल कीं और प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने अपनी विकासशील महत्वाकाँक्षी योजनाओं को परवान चढ़ाने की कोशिशें भी कीं लेकिन उनकी पार्टी के वरिष्ठ-कनिष्ठ नेताओं ने उन्हें शर्मसार करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। खाली खजाने और बदहाल प्रशासनिक व्यवस्था और पिछली भ्रष्टाचारी सरकार के भ्रष्टाचार में हिस्सेदारी के आदी नौकरशाहों को अखिलेश का प्यार और सम्मान भरा आचरण और ईमानदारी रास नहीं आई और वे अपने स्वार्थपूर्ति के लिए सरकार के मुखिया को भ्रमित करने में जुट गए। इसके लिए उन्होंने समाजवादी पार्टी और सरकार में मंत्रियों के आपसी मतभेदों का सहारा लिया।
इस सब बंटाधार में धर्मयोगी मुलायम सिंह भी कम दोषी नहीं हैं। वे अपने पुराने सम्बंधों को याद कर कर के पार्टी के वरिष्ठ जनों की गलतियों को नजरंदाज करते गए और अखिलेश को सरकार के मुखिया, टीम लीडर के रूप में कम बल्कि कम अनुभवी और आज्ञाकारी बना कर वरिष्ठजनों के सामने पेश किया। उसी ढिलाई का परिणाम हुआ कि पार्टी नेताओं और नौकरशाहों ने अखिलेश को मुख्यमंत्री कम अपना जूनियर मानकर अपने स्वार्थों के आगे उनकी महत्वकाँक्षी योजनाओं को परवान चढ़ने ही न दिया।
ध्यान देना होगा कि सिकंदर की उम्र कम थी मगर उसने दुनिया जीती थी क्योंकि उसने अपने वरिष्ठजनों पर भी लगाम कसी थी। ये कथित वरिष्ठजन काम कम करते हैं काम बिगाड़ा ज्यादा करते हैं। भ्रम ज्यादा करते हैं, भला कम करते हैं, इसलिए इन भ्रम योगियों के चक्रव्यूह से बचकर ही अपनी मंजिल मिलेगी।
कर्मयोगी अखिलेश को अपने धर्मयोगी पिता के अनुभव का सहारा लेकर लगाम अपने हाथ में लेनी होगी और इन भ्रमयोगियों का भ्रम भी जल्द ही दूर करना होगा। वरना 2017 का चुनाव भी भ्रम में होगा जैसे 2014 का चुनाव भ्रम में हुआ और 16 मई को भ्रम टूटा। मगर उपचुनावों की जीत ने इन भ्रमयोगियों को ताकत दी कि साहब सब अच्छा है और वे अपना भ्रम का मुलम्मा फिर से चढाने में कामयाब हो गए और अगर ये भ्रम बाकी रहा तो परिणाम लोकसभा के चुनावों से कुछ भी अलहदा न होंगे।
मनीष अग्रवाल, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।