अजय स्वामी

इस अगस्त के महीने मेें एक बार फिर अण्णा हजारे से लेकर भाजपा, भाकपा ;मालेद्ध जन्तर मन्तर पर भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की नूरा-कुश्ती में कूद रहे हैं। जैसा कि आप जानते ही हैं कि 2010-11 के साल में बढ़ती महँगाई, देश के संसाधनों की खुली लूट और जनान्दोलनों के दमन के नये कीर्तिमान क़ायम होने के साथ ही घपलों-घोटलों के भण्डाफोड़ की भी झड़ी लगी रही। भ्रष्टाचार की गटरगंगा की बदबू चारों ओर फैल गयी और यह भी उजागर हो गया कि इसमें से न कोई राजनीतिक दल बचा है, न पूँजीपति, न नौकरशाही, न प़फौजी अप़फसर और न ही मीडिया। न्यायपालिका के उच्चतम स्तरों पर भी भ्रष्टाचार की गन्द फैल चुकी है। पूँजीवादी लोकतंत्र के चारों खम्भे भ्रष्टाचार के कीचड़ में सरोबार हैं और अर्थव्यवस्था के स्तम्भ बताये जाने वाले देश के सबसे बड़े पूँजीपति भ्रष्टाचार की बहती गंगा में हाथ धोते रँगे हाथ पकड़े गये हैं।
भ्रष्टाचार आज़ादी के बाद से ही लगातार मौजूद रहा है। लेकिन निजीकरण-उदारीकरण के दो दशकों के दौरान यह पूरी तरह बेकाबू हो गया है। ‘ग्लोबल प़फाइनेंशियल इण्टीग्रिटी रिपोर्ट’ के मुताबिक़ सिर्फ 2000-2008 के बीच 125 अरब डाॅलर की रकम काले धन के रूप में देश से बाहर चली गयी। स्विस बैंकिंग एसोसिएशन की 2006 की रपट के अनुसार स्विस बैंकों में भारतीयों का जमा काला धन 1,456 अरब डाॅलर है। स्विट्ज़रलैण्ड के अतिरिक्त पूरी दुनिया में कम से कम 40 और ऐसे सुरक्षित ठिकाने हैं जहाँ भारतीय धनिकों ने काला धन छिपा रखा है। देश के भीतर जो काला धन और ‘अनएकाउण्टेड मनी’ मौजूद है, वह बाहर गयी धनराशि से कम नहीं है, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण सत्य साईं बाबा और केरल के मन्दिर केे मिले खजाने से साफ हो जाता है। वहीं दूसरी तरफ नेताओं-अप़फसरांे की खरबों की काली कमाई का सालाना निवेश ज़मीन-जायदाद, खनन के पट्टों, शेयर बाज़ार, मीडिया और मनोरंजन जगत, अपंजीकृत और अवैध उद्योगों-व्यापारों, भवन निर्माण, गैरक़ानूनी साहूकारी, स्कूलों-काॅलेजों के धन्धों और सोने-जवाहरात की ख़रीद में होता है। देश की सारी चमक-दमक और बाजारों की सारी रौनक खुशहाल मध्यवर्ग की जिस 20 करोड़ आबादी के लिए है, उसकी ऊपरी परत में डाॅक्टरों-इंजीनियरों-वरिष्ठ मीडियाकर्मियों के अतिरिक्त सबसे बड़ी तादाद में नेता और अफसर शामिल हैं। आश्चर्य नहीं कि जिस देश की 77 प्रतिशत आबादी 20 रुपये रोज से कम पर गुजारा करती हो वहाँ के 60फीसदी संसद सदस्य करोड़पति हैं। इसी हिसाब से पूंजीवादी संसदीय जनवाद का खेल भी मँहगा हुआ है। पिछले लोकसभा चुनाव में चुनाव आयोग का कुल खर्च 1300 करोड़ रुपये था। इसके अलावा 700 करोड़ रुपये केन्द्र और राज्य सरकारों ने खर्च किये थे। कई संस्थाओं के मोटे अनुमान के अनुसार, विभिन्न पार्टियों और उम्मीदवारों ने चुनाव प्रचार आदि पर अपनी ओर से कम से कम 8000 से 10,000 करोड़ रुपये खर्च किये । जाहिर है, इतनी बड़ी रकम पूँजीपतियों, ठेकेदारों, व्यापारियों के चन्दे के बिना नहीं जुटायी जा सकती थी।
आज जब पूंजीवादी ‘जनतंत्र’ के सारे छल-छद्म उजागर हो रहे हैं तब पूंजीवादी व्यवस्था के जागरूक पहरूए ;वाच डॅागद्ध खड़े हो रहे हैं ताकि सरे राह भ्रष्टाचार के गन्द की हाँडी फूटते रहने से व्यवस्था से जनता का विश्वास न उठ जाए इसलिए वे भ्रष्टाचार पर नियन्त्रण के लिए कुछ कदम उठाने की वकालत कर रहे हैं। इस कड़ी में अण्णा हजारे जी लोकपाल विधेयक बिल लाने के लिए जन्तर मन्तर पर उतर पड़ते हैं। कुछ एनजीओ और सुधारवादी संस्थाएं भ्रष्टाचार के विरू( कोई नयी मुहिम छेड़ने की घोषणा करती हैं। यहां तक की गरमा-गरम नारों का राग अलापने वाले ‘वामपंथी’ रंगे सियार भाकपा-माले भी भ्रष्टाचार विरोधी छात्र-युवा मंच बनाकर अण्णा के बाजे में संगत देने के लिए पंगत में कूद पड़ते हैं। अखबार के पन्नों और टीवी चैनलों पर भ्रष्टाचार के खिलाफ अरण्यरोदन और विधवा-विलाप भी शुरू हो जाता है और फिर कुछ दिनों बाद सब कुछ बदस्तूर चलने लगता है। वजह साफ है, असल में पूंजीवाद अपने आप में भ्रष्टाचार है जो बहुसंख्यक मेहनतकश जनता की लूट के बूते चलता है। इसलिए हमें अब यह समझ लेना होगा कि जब तक भ्रष्टाचार को जन्म देने वाली कानूनी लूट पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था कायम है, तब तक भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो सकता! फिर चाहे अण्णा एण्ड मंडली का लोकपाल बिल या कोई अन्य कानून ही क्यों न बन जाए! ऐसे कितने कानून पिछले 63 सालों में बनाए जा चुके हैं और उनका हश्र हम सब अच्छी तरह जानते हैं। वास्तव में जन लोकपाल जैसे तमाम सुधार कानून जनता के गुस्से पर पानी के छींटे मारने और जनता के असंतोष को इस लूटेरी व्यवस्था की चैहद्दी में बाँधने का काम करते हैं।
वैसे अगर एक बार को मान भी लिया जाये कि कोई घोटाला-रहित पूंजीवाद सम्भव है तो भी पूँजीवाद व्यवस्था जिस रूप में मेहनतकश जनता को लूटकर अमीरजादों की तिजोरियाँ भरती है, वह एक भ्रष्टाचार है। यह एक ऐसा भ्रष्टाचार है जो पूँजीवादी संविधान और कानून-व्यवस्था द्वारा मान्यता-प्राप्त हैं। मुनाफा कमाने और पूँजी संचय करना या दूसरे शब्दों में कहें तो निजी सम्पत्ति खड़ी करने का अधिकार पूँजीवादी व्यवस्था के तहत एक मूलभूत अधिकार होता है। निजी मुनाफा कमाने की यह पूरी प्रक्रिया मजदूरों के शोषण पर आधारित होती है। देश का 80 फीसदी अवाम खेतों-खलिहानों से लेकर कल-कारखानों में दिनों-रात खटकर सुई से लेकर हवाईजहाज तक का उत्पादन करता है लेकिन उस पर उसका कोई नियन्त्रण या अधिकार नहीं होता है और उसका अधिग्रहण करता हैं कुल आबादी के 20फीसदी हिस्सा जो पूँजीपति वर्ग होता हैं यह पूँजीपति वर्ग इस उत्पादन में कहीं कोई भूमिका अदा नहीं करता। असल में यह एक कूपन काटकर मुनाफा कमाने वाला परजीवी, अनुत्पादक और शोषक वर्ग है। लेकिन इसके बावजूद देश के उत्पादन से लेकर राज-काज और समाज के पूरे ढाँचे पर उसका एकाधिकार होता है। अगर वह कोई हेरफेर या धाँधली न करे तो भी उसकी समूची सम्पत्ति एक भ्रष्टाचार और अन्याय पर टिकी है।

लेखक नौजवान भारत सभा और बि‍गुल मजदूर दस्‍ता से जुडे हुऐ हैं