म. प्र. में मातृत्व एवं बाल स्वास्थ्य की जमीनी स्थिति और आगे की संभावनाओं पर राज्यस्तरीय मंथन संपन्न
जावेद अनीस
भोपाल, 27 सितम्बर- मध्य प्रदेश लोक संघर्ष साझा मंच, जन स्वास्थ्य अभियान एवं म.प्र. भारत ज्ञान विज्ञान समिति और क्राई द्वारा मध्य प्रदेश में मातृत्व एवं बाल स्वास्थ्य की जमीनी स्थिति और आगे की संभावनाओं पर संवाद के लिए राज्य स्तरीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में मध्य प्रदेश के लगभग 20 जिलों में माताओं और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए काम कर रही संस्थाओं के प्रतिनिधियों और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारfयों द्वारा भागीदारी की गयी।

सम्मलेन में मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं के क्रियान्वयन की वर्तमान स्थिति पर चर्चा की गयी एवं मातृत्व और बाल स्वास्थ्य के लिए उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं के बेहतर क्रियान्वयन के तरीकों के बारे में विचार किया गया।

मध्य प्रदेश लोक संघर्ष साझा मंच द्वारा प्रदेश के चौदह जिलों में माताओं और बच्चों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को लेकर किये गये अध्ययन के प्रमुख निष्कर्षों को प्रस्तुत किया गया जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं।

} अध्ययन के दौरान पाया गया कि कुल 900 में से 133 गर्भवती महिलाओं (15 प्रतिशत) के गर्भवती का जच्चा बच्चा कार्ड नहीं बने हैं।

} 33 प्रतिशत महिलाओं का प्रसव घर पर ही हुआ है, जननी वाहन की बात करें तो 43 प्रतिशत महिलाओं को प्रसव के दौरान जननी वाहन नहीं मिल पाया और उन्हें अपने साधन से अस्पताल जाना पड़ा।

} चौदह जिलों में कुल 41 स्वास्थ्य केन्द्रों का अध्ययन किया गया जिनमें से 15 में पर्याप्त स्टाफ था जबकि 19 केन्द्रों में पर्याप्त स्टाफ की कमी पायी गयी।

} अध्ययनित जिलों में लोगों को ग्राम स्वास्थ्य समिति के बारे में जानकारी नहीं है। इस समिति के काम, उनके सदस्यों के बारे में लोगों को पता ही नहीं है। समिति की बैठकें नियमित रूप से नहीं होती हैं। समिति को प्राप्त राशि का व्यय आशा और समिति अध्यक्ष द्वारा ही कराया जाता है, इसमें समिति के अन्य सदस्यों की भागीदारी नहीं है।

} एक पहलू यह निकल कर आया कि सरकारी ढांचों के फैलाव के बाद और ग्राम स्तर पर आरोग्य केंद्र और उप स्वास्थ्य केंद्र जैसी माकूल व्यवस्थाएं होने के बाद भी लोगों का विश्वास निजी व्यवस्था पर ज्यादा है, अध्ययन के दौरान पाया गया कि 50% लोग निजी अस्पतालों का उपयोग कर रहे हैं जबकि ये वो जिले है जहां गरीबी ज्यादा है और यहाँ आदिवासी समुदाय के लोग प्रमुखता से हैं, लोगों ने सरकारी अस्पतालों में ना जाने के प्रमुख कारणों में सरकारी अस्पताल में पर्याप्त सुविधाएं न होना, इनका दूर होना, वहां दक्ष स्टाफ उपलब्ध ना होना आदि बताया है।

} आज भी झाड़ फूँक जैसे विकल्प मौजूद हैं। पाया गया है कि 6 प्रतिशत लोग आज भी झाड़ फूँक पर निर्भर हैं।

कार्यक्रम के अंत में संस्थाओं द्वारा मांगपत्र प्रस्तुत किया गया जिसकी प्रमुख मांगे निम्नलिखित हैं –

प्रत्येक 20 हजार से 30 हजार की आबादी के के बीच एक सर्वसुविधा युक्त सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र की स्थापित किया जाये।
प्रदेश में शिशु रोग और स्त्री एवं प्रसूति रोग चिकित्सकों एवं विशेषज्ञों के रिक्त पदों को तत्काल भरा जाये।
प्रदेश में माताओं और बच्चों के मृत्यु की आडिट निरंतर एवं अनिवार्य रूप से किया जाए, साथ ही साथ पंचायत ब्लाक व जिला स्तर पर माताओं एव बच्चों के जीवन प्रत्याशा एवं स्वास्थ्य से संबंधित डाटाबेस तैयार किया जाये।
स्वास्थ्य संस्थाओं की ढांचागत सुविधाओं के अभाव व दिक्कतों को दूर किया जाये। उपस्वास्थ्य केन्द्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में आवास सुविधाओं सहित पीने के पानी, स्वच्छता, बाउंड्री वाल, बिजली आदि की व्यवस्था सुनिश्चत किया जाये।
स्वास्थ्य सेवाओं की सामुदायिक निगरानी बहुत जरूरी है, इसके बेहतर संचालन के लिए स्वास्थ्य सेवा के निगरानी तंत्र को ज्यादा जवाबदेह और पारदर्शी बनाने की जरूरत है।
समुदाय के व्यवहार परिवर्तन संचार ( Behavior Change Communication ) पर ज्यादा काम करने की जरुरत है। इस हेतु सूचना, शिक्षा और संचार की गुणवत्ता को बेहतर करने के लिए रणनीतिक कदम उठाये जाये।
स्वास्थ्य क्षेत्र के सेवा प्रदाताओं को समुदाय के प्रति और लोक हितैषी बनाने की जरूरत है, इसके लिए जरूरी कदम उठाये जाये।
वर्तमान में स्वास्थ्य के क्षेत्र में “लक्ष्य आधारित माडल” को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो कि स्वास्थ्य सेवा जेसे संवदेनशील क्षेत्र के लिए उचित नहीं है, इसके स्थान पर “प्रेरणा पद्धति” को अपनाया जाये।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में जमीनी स्तर पर काम कर रही आशा, उषा व दाई के साथ साथ आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं व सहायिकाओं को स्थाई कर्मचारी बनाया जाये।
स्वास्थ्य मे निजीकरण (खास करके निजी सार्वजनिक साझेदार) पर पूरी तरह से रोक लगाई जाये।

सम्मेलन में डा. उदय जैन पूर्व कुलपति ए.पी.एस.विश्विद्यालय रीवा, विभांशु जोशी पूर्व सदस्य राज्य बाल अधिकार आयोग, डा.जी.एस.सचदेवा, नरेन्द्र गुप्ता प्रयास संस्था राजस्थान, दीपा, शमा संस्था दिल्ली, जन स्वास्थ्य अभियान से डॉ. अजय खरे, अमूल्य निधि, मध्य प्रदेश लोक संघर्ष साझा मंच से गोविन्द यादव, उपासना बेहार. राकेश चंदोरे, भारत ज्ञान विज्ञान समिति के डॉ. राहुल शर्मा, क्राई से सुभेन्दु भट्टाचार्जी और जया सिंह आदि ने वक्ता और पैनलिस्ट के रूप में अपनी बात रखी।