पत्रकारिता के महानायक की भाषा चमत्कृत करती है
संदीप वर्मा

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने पत्रकारिता के तथाकथित महानायक सुरेन्द्र प्रताप सिंह को अपने फेसबुकिया शोध में खोज कर मंडल कमीशन का समर्थक बता दिया। अब मंडल जी बड़े पत्रकार हैं, उग्र-दलित विचारक की पहचान रखते हैं। गलत थोड़े ही कह रहे होंगे। वीपी सिंह को पिछड़ों का मसीहा भी मानते हैं। मगर जब एसपी को मंडल-समर्थक बता रहे होते हैं तो अनपढ़ और नए कारकूनो को उनकी बात माननी ही पड़ती है। सोचने की जरूरत ही क्या है? उन्होंने एसपी के कुछ लेखों का उदाहरण देते हुये साबित किया कि उनकी लेखनी से मंडल समर्थक विचार बरस रहे थे।

मंडल समर्थन-विरोध के उस दौर में जब मैं एक भी समाचार पत्र को मंडल समर्थक होने के लिये खोज रहा था, उस समय नव-भारत टाइम्स को आज की तारीख में मंडल समर्थक बताना मेरे लिए आश्चर्य की बात थी। जिन लेखो के लिंक उन्होंने दिये हैं, सोचा वह लेख तो प्रतिनिधि लेख होने चाहिये, चलो एक बार फिर से पढ़ लेते हैं। शायद नयी उम्र का होने की वजह से मैं उन्हें उस समय समझ नहीं पाया होऊँगा।
‘सामाजिक न्याय पर सर्व-सम्मति संभव है’ लेख का शीर्षक तो समर्थक जैसा ही लग रहा है, मगर लेख में लिखा क्या है, पढ़ने की गुस्ताखी कर बैठा हूँ। लेख का शीर्षक मंडल-समर्थक क्यों है, इस पर अंत में ..
एसपी को मंडल विरोधी वह मुख्य-धारा दिखती है जिसका सूत्रपात स्कूल कॉलेजों के छात्र,शहरी युवा और मूल रूप से पढ़े लिखे बेरोजगार नौजवानों ने जुलूस धरने और रैलियों के रूप में प्रारम्भ किया था। वह अब आत्मदाह और आत्महत्या के रूप में सामने आ रही है।
एसपी स्वयं सवर्ण थे, जैसा मुझे प्रतीत होता है। उन्हें छात्र, शहरी युवा और पढ़े लिखे नौजवान तो खूब दिख रहे हैं, उनके प्रवक्ता बने मालूम दे रहे हैं, मगर कहीं भी यह नहीं पता चल रहा है कि मंडल कमीशन में जिन लोगों को नौकरी या हिस्सेदारी का सपना जगाया जा रहा है वे कौन से लोग हैं। ऐसा लगता है कि वे ना तो छात्र होंगे, ना ही शहर में रहते होंगे और पढ़े लिखे बेरोजगार तो हो ही नहीं सकते! ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जैसे बुद्धू काका या हरिया मजदूर को अब डीएम के पद पर नियुक्ति-पत्र दे दिया जायेगा। यह मंडल वाले लोग अनपढ़ और गँवार हैं। यह लोग या तो भैंसे चराते हैं या फिर खेत जोतने का पाप-कर्म करते हैं। मंडल वाले लोगों ने स्कूल का तो कभी मुँह भी नहीं देखा होगा, ऐसा साफ मालूम देता है।
वे लिखते हैं ... देश के करोड़ों युवाओं के मन में स्वाभाविक रूप से घोर असंतोष है। ...एसपी की इन लाईनों में कहीं से आपको यदि ऐसा लगे कि मंडल जातियों में युवक नहीं बल्कि या तो बच्चे होते होंगे या वृद्ध। ...ताज्जुब है एसपी की एक लाईन तो क्या एक शब्द भी ‘पिछड़े वर्ग के युवकों’ जैसा कोई शब्द नहीं मिल रहा है। पत्रकारिता के महानायक की ऐसी भाषा चमत्कृत करती है।
एसपी लिखते हैं- ‘लोग अपने पुश्तैनी धंधों और अपनी जमीन से कटकर सरकारी नौकरी की मृगमरीचिका की तलाश में ऐसी अधकचरी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं जो ना केवल अपने पारम्परिक हुनर से नफरत सिखाती है बल्कि उन्हें इस योग्य भी नहीं रहने देती कि वे करोड़ों बेरोजगारों के हुजूम में शामिल होकर अपने लिये एक अदद नौकरी झपट सकें।’

......अगर आप सोच रहे हैं कि यह लाईनें तो पिछड़े युवकों के समर्थन में लिखी होंगी तो ऐसी गलतफहमी दूर करने के लिये थोड़ा आगे पढ़िये- कई दिनों की भूख के बाद मिली सूखी रोटी में भी कोई नाजायज ढँग से हिस्सा बँटाना चाहता है तो इस तरह की सोच के लिये उन्हें दोषी भी नहीं ठहराया जा सकता है।

ध्यान दीजिये वे सवर्ण युवकों के गुस्से को कारण दे रहे हैं। एक ऐसा कारण जो पिछड़े वर्ग के युवकों का आरक्षण के समर्थन में हो सकता था, उन्हें वह कारण सवर्ण युवकों के गुस्से की वजह लग रहा है। मेरी नजर में बेईमानी... आपकी नजर में पत्रकारिता का महानायक ... और फिर वे मंडल आन्दोलन के खिलाफ हो रहे आन्दोलन को खुल्लम-खुल्ला अनुचित भी नहीं ठहरा रहे हैं। उनके लिये मंडल विरोधी आन्दोलन उचित है। और पत्रकारिता का महानायक बताने वाले उनके शिष्य उन्हें मंडल समर्थक भी घोषित कर दे रहे हैं। ताज्जुब ...
वे आत्मदाह और आत्महत्या के लिये मंडल कमीशन की संस्तुति को जिम्मेदार तो नहीं ठहरा रहे मगर ठहरिये ... ख़ुशी की कोई बात नहीं। वे मंडल कमीशन की सिफारिशों को उन आत्मदाहों और आत्महत्याओं के लिये उत्प्रेरक बता रहे हैं बजाये इसके कि आत्महत्याओं और आत्मदाहों की वजहों का खुलासा करते। सवर्ण मीडिया की भाषा को दोहराने के अलावा कोई मौलिक बात नही दिख रही है।
वे शेष मीडिया को युवाओं को भड़काने के लिये जिम्मेदार तो ठहरा रहे हैं परन्तु साथ में मंडल कमीशन लागू करने में वीपी सिंह की सरकार को बहुमूल्य सुझाव देने में पीछे भी नहीं हट रहे हैं। पत्रकारिता के महानायक जिन्हें तथाकथित मंडल समर्थक की पगड़ी बाँध दी गयी है वे मंडल कमीशन की रिपोर्ट को आँशिक रूप से लागू करने का सुझाव दे रहे हैं। क्या एसपी के भक्त उन्हें आँशिक समर्थक कहना पसन्द करेंगे ?
एसपी की भाषा का चमत्कार देखिये वे वीपी सिंह के मंडल कमीशन लागू करने के निर्णय को राजनीतिक गोटी बिठाने की वासना की व्यञ्जना दे रहे हैं और भक्त उन्हें मंडल समर्थक पत्रकार जो सर पर कफन बाँध कर शहीद होने को तैयार था। बाकी पत्रकार जहाँ ऊँगली कटा कर शहीद भी नहीं बन रहे थे वहाँ एसपी को पगड़ी बाँधी जा रही है।
उनके शब्दों में सभी राजनीतिक दल पिछड़े वर्ग को आरक्षण तो देना चाहते थे, सर्वानुमति थी मगर वर्ग-निर्धारण का आधार और कितना आरक्षण दिया जाय इस पर मतभेद को मान्यता दे रहे हैं। साफ़ साफ़ किसी अँधे को भी दिखायी दे जाये कि वे मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने का विरोध कर रहे हैं।
अब अन्त में आखिर इस लेख का शीर्षक मंडल समर्थक कैसे प्रतीत होता है? लाला के पैसो से क्रांति नहीं की जाती। एसपी भी लाला की नौकरी ही कर रहे थे। लाला को पीएम की तरफ से मंडल समर्थन करने के लिये विज्ञापन दिये गये होंगे। एसपी ने लेख को इस तरह से प्रस्तुत किया जैसे लेख में मंडल कमीशन का समर्थन किया जा रहा हो, मगर जिनके दिमाग में क्रांति की जगह मंडल का विरोध भरा हुआ था, उन्होंने अपनी पूरी क्षमता से मंडल का विरोध ही किया। मुझे तो इस लेख में कहीं से भी मंडल का समर्थन नहीं दिख रहा है, आपको दिखे तो जरूर बताइयेगा। विचारों और निष्कर्षो के बारे में मैं बेहद दल-बदलू हूँ। तुरन्त ही पाला बदल लूँगा।

संदीप वर्मा, स्वयं को शूद्र कहने और मानने वाले अध्यापक और सामाजिक चिन्तक हैं।