मजदूरों और किसानों की कदमताल
आजादी के बाद पहली बार एक नई प्रकार की राजनीति की शुरूआत हो रही है, जिसमें मजदूर और किसान संगठन एक साथ आ रहे हैं। 2 सितम्बर की होने वाली हड़ताल के प्रस्ताव में मजदूर संगठनों ने भूमि अधिग्रहण के मुद्दे को शामिल किया, तो किसान संगठनों ने भी इस हड़ताल को सफल बनाने के लिए ग्रामीण स्तर पर विरोध कार्रवाईयां करने की तैयारी कर ली है। किसान संगठन 15 अगस्त से देशभर में अभियान चला रहे हैं, जिसमें खेती से जुड़े मुद्दों के साथ श्रम कानूनों में हो रहे सुधार का मुद्दा भी शामिल किया गया है।
नई आर्थिक नीतियों के आने के बाद से किसान और मजदूरों दोनों पर लगातार हमले किए जा रहे हैं। मजदूरों के अधिकार खत्म किए जा रहे हैं, दूसरी तरफ किसानों को मिलने वाली राहत में भी कटौती हो रही है। जो मजदूर है, वह किसान भी है, क्योंकि भारतीय परिवेश में इन दोनों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। इसलिए यह माना जाता है, कि भारतीय मजदूर वह सर्वहारा नहीं है, जिसकी कल्पना कार्ल मार्क्स ने की थी। उसकी जड़ें ग्रामीण परिवेश से जुड़ी है, इसीलिए सामंती अवशेष उसमें बाकी हैं। यह सच है, कि कारखानों के विकास ने समाज में व्याप्त कुछ बुराईयों को दूर किया है, पर मजदूरों में वर्गीय चेतना का विस्तार उतना नहीं हो सका है, जितना उनमें सामंती परिवेश का अंश है। यही कारण है, मजदूरों में जातीवाद या धार्मिकता की भावना अभी भी पाई जाती है और वे अक्सर सांप्रदायिक हिंसा फैलाने के लिए टूल के तौर पर उपयोग किए जाते हैं। आम तौर पर मजदूरों की वर्गीय एकता अपनी सुविधाएं बढ़ाने के लिए नजर आती हैं, पर उसके बाद यह बिखर जाती है। भागलपुर के सांप्रदायिक दंगे हों या मुंबई जैसे मजदूर बहुल महानगर में शिवसेना जैसे कट्टर संगठन का उभार इसी बात का प्रमाण है।
फिर भी मजदूरों के बीच काम कर रहे संगठनों के बीच एक व्यापक एकता काफी समय पहले कायम हो गई थी। जिसमें वामदलों से जुड़े संगठन भी शामिल हैं तो समाजवादियों से जुड़े भी, कांगे्रस से जुड़े भी और संघ से जुड़े भी। इन 11 मजदूर संगठनों की संयुक्त कार्रवाई पहले भी कई बार हो चुकी है, जिसके कारण सरकारों को कदम पीछे हटाने पड़े हैं। दूसरी तरफ इस प्रकार की एकता किसान संगठनों में नहीं देखी गई, क्योंकि गांवों में सामंती ढांचा अभी भी बरकरार है। यहां व्याप्त जातिवाद और जमीन के असमान वितरण ने कभी भी किसानों को एकजुट नहीं होने दिया। दूसरी तरफ छोटे किसान या खेत मजदूर उन बड़े किसानों के अहसानों तले इतने दबे होते हैं, कि वे कभी बगावत करने की सोचते भी नहीं हैं, यहां तक कि ये छोटे किसान वोट किसे डालेंगे, इसका निर्धारण भी बड़े किसान करते हैं।
यहां एक बात और महत्वपूर्ण है कि आजादी की लड़ाई के दौरान कांग्रेस ने लंबे समय तक किसानों और मजदूरों को इससे दूर रखने की कोशिश की, पर ऐसा हो नहीं सका। इन दोनों वर्गों ने आजादी की लड़ाई में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। मजदूर अपनी बदहाली और अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे शोषण के कारण आजादी चाहते थे, पर इस दौर में किसान दोहरी लड़ाई लड़ रहा था, पहली अंग्रेजों से दूसरी हिंदुस्तानी सामंतों से। इस दौर में कई स्थानों पर हिंसक कार्रवाई भी हुई, तेलंगाना इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जहां किसानों ने गांव में हिंसक कार्रवाई कर जमीनों को बंटवारा कर दिया था और गांवों में अपनी सत्ता कायम कर ली थी। यहां के किसानों ने अंग्रेजों से सेना से, फिर निजाम की सेना से और अंत में भारत सरकार की सेना से लड़ाई लड़ी। आजादी के बाद भी नक्सलवाड़ी आंदोलन की बात करें या वर्तमान में चल रहे नक्सल आंदोलन की, सभी जमीन के वितरण की लड़ाई है। इन लड़ाईयों के बाद भी किसानों को उनका हक नहीं मिल सका, क्योंकि जिन हिंदूस्तानी सामंतों से वे लड़ रहे थे, वे अब भी सत्ता पर काबिज थे।
बहरहाल नई आर्थिक नीतियों ने किसानों के बीच बदहाली बढ़ाई है, जिसकी चपेट में बड़ा किसान भी आ गया है। गांव में रोजगार लगभग खत्म हो गया है, इसके कारण छोटा किसान तो मजदूरी करने शहर की तरफ पलायन कर गया, पर बड़ा किसान यह भी नहीं कर सका। दूसरा संकट विकास योजनाओं व कारखानों के नाम पर खेती की जमीनों का अधिग्रहण ने बढ़ा दिया है। इन दोनों संकटों ने किसानों में एकता को बढ़ाया है, वे एकजुट होकर संघर्ष कर रहे हैं। हालांकि अभी तक ये संघर्ष छोटे-छोटे पॉकेट्स में ही नजर आ रहे थे, पर मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश ने इन्हें एक व्यापकता दी। आज देश का लगभग हर छोटा बड़ा किसान संगठन एकजुट हो गया है और इस अध्यादेश का विरोध कर रहा है, यहां तक कि संघ से जुड़ा भारतीय किसान संघ भी, जो सड़क पर तो नहीं उतरा है, पर इसका विरोध कर रहा है।
केन्द्र सरकार के इस नए हमले ने किसान संगठनों को एक नई दिशा दी, जो काम वे अभी तक नहीं कर पाए थे, वे उस दिशा में आगे बढ़े। पहली बार इस देश में किसान संगठनों को एक साथ लाने की कोशिश शुरु हुई। हालांकि अभी भी सभी एक साथ नहीं आ पाए हैं, पर व्यापक एकता बनी है, इसमें वे जनसंगठन भी शामिल हैं, जो जल, जंगल और जमीन की लड़ाई को लेकर कुछ पॉकेट्स में लड़ रहे हैं। किसानों और मजदूरों की एकता बनाने की दिशा में की जा रही कोशिश इस दिशा में उठाया गया अगला कदम है।
इन संगठनों का मानना है, कि नई आर्थिक नीतियों के खिलाफ किसान और मजदूरों की व्यापक एकता बननी चाहिए, जिससे बड़ा संघर्ष किया जा सके। यह अलग बात है, कि हमारे देश में हर आंदोलन को वोट की राजनीति से जोड़कर देखा जाता है, यहां भी कुछ लोग यह कर सकते हैं। इसका वोट की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा? अभी कहना आसान नहीं है पर इतना सच है, कि अगर यह राजनीति इसी दिशा में आगे बढ़ी, तो सरकारों को अपनी आर्थिक नीतियों पर एक बार फिर से विचार करना होगा।
भारत शर्मा
भारत शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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