मजबूरी उसे कहते हैं जब प्रतिबंध लगाने वाले पटेल का गुणगान करना पड़ता है
मजबूरी उसे कहते हैं जब प्रतिबंध लगाने वाले पटेल का गुणगान करना पड़ता है
उज्ज्वल भट्टाचार्या
नेहरू का मैं भी आलोचक रहा हूँ- उनके अभिजातवाद का। लेकिन उनकी विचारधारा में कुछ तो है कि आज गिरोह उन्हें पानी पी-पीकर कोस रहा है।
सारी सीमाओं के बावजूद उनकी समावेशी राष्ट्रीयता की अवधारणा ने इतिहास को आगे बढ़ाया है, वह भारत में धर्मनिरपेक्षता के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांतकार रहे हैं। जिस भँवर के बीच से स्वतंत्र भारत को उन्होंने आगे बढ़ाया, लोकतंत्र के आधार को मज़बूत किया, उसके बिना भारत का इतिहास भी पाकिस्तान के रास्ते पर जाता।
मैं जब प्राइमरी में था, तो भिलाई और राउरकेला के कारखाने बन रहे थे। स्कूल में पढ़ा था कि भारत का सबसे बड़ा इस्पात कारखाना जमशेदपुर में है। बताया जाता था कि भाखड़ा-नांगल बनने के बाद अब हर कहीं बिजली मिलेगी। हमारे सपने छोटे थे, उपलब्धियां शुरुआती थीं।
उन दिनों की सोचता हूँ तो समझने लगता हूँ कि नेहरू ने हमें क्या दिया है।
फिर से एक नेहरू दे दो
शिद्दत के साथ उंगली उठाते हुए
आदर से अपना सिर झुका सकूँ।
मजबूरी उसे कहते हैं जब प्रतिबंध लगाने वाले पटेल का गुणगान करना पड़ता है।
जिनके राजनीतिक पुरखे अंग्रेज़ों की दलाली करते थे, माफ़ी माँगकर जेल से बाहर आते थे, सहयोग का वचन देते थे, वे आज राष्ट्र बनाने वाले को उनके जन्मदिन पर गाली देने में जुटे हुए हैं।
आज के गिरोह और उनके राजनीतिक बाप लोगों की तुलना की जाय, तो 47-48 की तुलना में आज के दंगेबाज़ बच्चे हैं। उस मुश्किल सांप्रदायिक दौर में गांधी और उनकी हत्या के बाद नेहरू ने देश को बचा लिया।
गिरोह इस बात के लिये उन्हें कभी माफ़ नहीं कर सकता।
कभी हम नेहरू की आलोचना करते थे। आज किनकी-किनकी आलोचना करनी पड़ रही है। कितना स्तर गिर चुका है मेरा !


