रीता तिवारी
इम्फाल। पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में महिलाओं की सामाजिक हैसियत और अधिकार देश के दूसरे राज्यों की मुकाबले बेहतर हैं। देश में अपनी तरह का पहला और अनूठा महिला बाजार एम्मा मार्केट राजधानी इम्फाल में ही है। यहां तमाम दुकानें महिलाएं चलाती हैं। लेकिन इसके बावजूद जब राजनीति में महिलाओं को समान अधिकार देने की बात आती है तो राष्ट्रीय से लेकर क्षेत्रीय तक तमाम दल कन्नी काट लेते हैं। अबकी राज्य के दो लोकसभा सीटों के लिए मैदान में उतरी दो महिलाएं पुरुषों का गढ़ रही राजनीति में सेंध लगाने का प्रयास कर रही हैं।
इंदिरा ओनियम भीतरी मणिपुर संसदीय सीट पर निर्दलीय के तौर पर मैदान में हैं तो तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार किम गांग्टे बाहरी मणिपुर सीट पर पुरुषों को चुनौती दे रही हैं। इन दोनों सीटों के लिए मतदान क्रमशः 17 और नौ अप्रैल को होगा। यह दोनों जानती हैं कि उनकी लड़ाई आसान नहीं है। लेकिन इसके बावजूद वे जोरदार तरीके से राजनीतिक परिदृश्य पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं। दोनों सीटों पर उनका मुकाबला 16 पुरुष उम्मीदवारों से है। बेहतर सामाजिक हैसियत के बावजूद राज्य में राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं का बर्चस्व कभी नहीं रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में मैदान में उतरी 15 में से 12 महिला उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी।
ओनियम कहती हैं, मणिपुर में सामाजिक और आर्थिक मामलों में महिलाओं की भूमिका बेहद अहम रही है। लेकिन वे भी शोषण की शिकार है। दोनों का कहना है कि उनके चुनाव मैदान में उतरने का मकसद महिलाओं को आर्थिक और राजनीतिक तौर पर मजबूत करना है। ओनियम पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर मुख्यमंत्री ओ ईबोबी सिंह के खिलाफ मैदान में उतरी थी। इस बार जब पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो वे निर्दर्लीय के तौर पर मैदान में कूद पड़ीं।
गांग्टे कहती हैं कि राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराध लगातार बढ़ रहे हैं। लेकिन किसी भी राजनीतिक दल ने इसे गंभीरता से नहीं लिया है। वर्ष 1998 में सीपीआई के टिकट पर संसद के लिए चुनी जानी वाली गांग्टे मणिपुर की पहली महिला सांसद रही हैं। वे कहती हैं कि जब आंदोलन की बात आती है तो महिलाओं को आगे कर दिया जाता है। लेकिन उसके बाद दूसरे मामलों में उनको कोई तवज्जो नहीं दी जाती। यह दोनों राज्य की महिलाओं का समर्थन पाने की उम्मीद कर रही हैं।
दोनों महिलाओं ने राज्य के पिछड़ेपन, विकास, रोजगार और महिलाओं की स्थिति में सुधार को अपना मुख्य मुद्दा बनाया है। इसके अलावा दोनों अपने अभियान के दौरान सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम को रद्द करने की भी मांग उठा रही हैं। उनका कहना है कि इस अधिनियम के सहारे सेना के जवान युवकों पर अत्याचार कर रहे हैं। नतीजतन युवक उग्रवादी संगठनों में शामिल हो रहे हैं। उग्रवाद पर अंकुश लगाने के लिए इस कानून को रद्द करना जरूरी है।
राज्य के चुनावी इतिहास को ध्यान में रखते हुए इन दोनों महिलाओं की जीत की उम्मीद तो कम ही है। लेकिन दोनों ने अपने हौसले से पुरुषों के बर्चस्व वाले इस राज्य में एक पहचान तो बना ही ली है।
जनादेश न्यूज़ नेटवर्क