मन की व्यथा कहने पर, कुचलने वाले लोग
मन की व्यथा कहने पर, कुचलने वाले लोग
ये लोग....
सैद्धान्तिक राजनीति का दावा करते ये लोग,
साथ-साथ सिद्धान्तों की बलि चढ़ाते ये लोग।
अपने ही रंग में सबको रंगने चले ये लोग,
अपनी नीति को ही सही समझते ये लोग।
एक आदेश पर,.आंख मूंद कर उठते लोग,
खुद का विवेक खो कर,भीड़ में चलते लोग।
सत्य-असत्य की विवेचना न करते ये लोग,
अंधभक्ति में , सिर्फ जयकार करते ये लोग।
कुटिलता को देखकर भी, अनदेखा करते लोग,
अपने स्वार्थ के लिए, सच को भी नकारते लोग।
स्वर्णिम युग के सपने में, सोते हुए ये लोग,
स्वयं के पैर पर खुशी से कुल्हाड़ी मारते लोग।
मौन, देशभक्तों पर, अकारण शक करते लोग,
जाहिलों के हुंकार पर, हिनहिनाते ये लोग ।
मन की व्यथा कहने पर, कुचलने वाले लोग,
खुद को खुदा का दर्जा देते ये जाहिल लोग।
-अनिल सोडानी
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