मरने दो...किसान है, यह सबसे बड़े लोकतंत्र का किसान है
दिल्ली में एक किसान मर गया है। एक सभा में वह मरा, सबके सामने। सबके सामने देश के अन्य कोने में किसान नहीं मरे, यह बात अलग है। 2003 में एक बार ऐसी घटना जेनेवा में घटी थी जब 10 सितम्बर 2003 को दक्षिण कोरियाई निवासी ली क्यूंग-हये ने डब्ल्यूटीओ के सामने आत्महत्या कर ली थी। ली क्यूंग-हये एक चावल उत्पादक परिवार में 1947 में पैदा हुआ था और यह बात सच है कि वह एक समर्पित एवं प्रतिबढ किसान था। उसने अपने जीवन में एक बड़ा किसान संगठन भी तैयार कर लिया था जिसके लगभग सवा लाख लोग सदस्य थे। भारत कृषि प्रधान एवं किसानों का देश है। भारत का एक किसान गजेन्द्र सिंह ने आत्महत्या कर ली है। गजेन्द्र सिंह के परिवार को एक सम्पन्न परिवार के रूप में माना जाता है। गजेन्द्र सिंह के चाचा गोपाल सिंह सरपंच हैं और इससे पहले लगातार तीन बार गजेन्द्र सिंह की चाची सरपंच रही थीं। गजेन्द्र सिंह एक पार्टी का राजनीति कार्यकर्ता भी था।
भारत में प्रत्येक दिन आत्महत्या होती है। किसान आत्महत्या का औसत यदि देखा जाए तो प्रत्येक आधे घण्टे में दो आत्महत्या होती है। प्रत्येक दिन का औसत 50 किसान आत्महत्या है। ये वैध आत्महत्या का आंकड़ा है। अबैध किसान आत्महतया का आंकड़ा यदि जोड़ा जाए तो हो सकता है औसत में दो-तीन गुना इजाफा हो जाए। फिलहाल, गजेन्द्र सिंह पूरे देश की बहस के केन्द्र में है। भारत की प्रत्येक राजनीतिक पार्टियों को कुछ राजनीति करने का मौका मिल गया है। गजेन्द्र सिंह के मौत के बैधता को यदि सरकार स्वीकार कर लेती है तो उसे मुआवजा बतौर किसान मौत मिलेगी। उसका परिवार 50 बीघा खेत पर आश्रित है। तीन भाई होने के कारण उसके खुद के हिस्से में 17 बीघा जमीन आती है। गजेन्द्र सिंह ने खेत में आंवले का बाग, गेहूं और सरसों की फसल लगाई हुई थी। गजेन्द्र के चाचा सरपंच गोपाल सिंह ने मीडिया में बयान दिया कि फसलें खराब होने के बाद से ही गजेन्द्र काफी परेशान था और भविष्य की आशंकाओं से घिरा रहता था। वह बोलता था कि मेहनत खराब हो गई और नुकसान की भरपाई कैसे होगी? पिछले दस दिनों से गजेन्द्र विचलित था। फिर दिल्ली जाने की कहकर रवाना हुआ और इसके बाद ऐसी सूचना मिली, जिस पर पहले किसी को भी विश्वास नहीं हुआ।
मरने के पीछे सच क्या है, यह तो वह किसान जानता था। किसान के दुःख दर्द के मोल सरकारें तो कभी नहीं जान सकीं यह बात तो स्वीकार करनी पड़ेगी। जब एक समय 2005-06 में विदर्भ में मैं किसानों की आत्महत्या पर एक डाक्यूमेण्ट्री बनाने के लिए विदर्भ का चक्कर काट रहा था तो उन दिनों प्रत्येक दिन किसान आत्महत्या की दर 3 थी अब विदर्भ में भी किसान आत्महत्या की औसत दर बढ़ गई है। देश के किसान मरें, रहें, जियें या नष्ट हो जाएं किसी को क्या पड़ी है। अपनी जिंदगी अगर सही रास्ते पर है तो देश के जनप्रतिनिधि, सूबेदार, सरकार या ब्यूरोक्रेट्स इनको किसान नहीं दिखाई देता। भारत के प्रधान मंत्री ने जरूर मन की बात में देश के किसानों से बात की थी और किसान को उन्होंने सब कुछ अवसर उपलब्ध कराने का लगभग वादा भी किया था जिससे किसान जीवन में सुधार एवं उनके आय में ईजाफा हो। गजेन्द्र की मौत पर प्रधान मंत्री ने लोकसभा में अपने मन की बात रखी उस पर अगर गौर करें तो प्रधानमंत्री जरूर इस आत्महत्या से आहत दिखते हैं। उन्होंने लोक सभा में कहा कि कई वर्षों से, किसानों की आत्महत्या, समग्र देश के लिए चिंता का विषय रहा है। समय समय पर, हर सरकार ने, उनसे जो भी संभव हुआ, करती रही हैं। कल की घटना के कारण पूरे देश में जो पीड़ा है, उसकी अभिव्यक्ति सदन के भी सभी माननीय सदस्यों ने की है। मैं भी इस पीड़ा में सहभागी होता हूँ। यह हम सब का संकल्प रहे, हम सब मिल करके, इस समस्या का समाधान कैसे ढूंढें। प्रधान मंत्री ने यह भी स्वीकार किया कि समस्या बहुत पुरानी है, समस्या बड़ी व्यापक है, और उसे उस रूप में लेना पड़ेगा। जो भी अच्छे सुझाव होंगे उसे ले करके चलने के लिए सरकार तैयार है। किसान की जिंदगी से बड़ी कोई चीज नहीं होती। इंसान की जिंदगी से बड़ी कोई चीज नहीं होती।...इस सदन की पीड़ा के साथ अपने आप को जोड़ते हुए..., हम सब, दल कोई भी हो, देश बहुत बड़ा होता है, समस्या पुरानी है, गहरी है, हम सबको सोचना होगा कि हम कहाँ गलत रहे, वो कौन से गलत रास्ते पर चल पड़े, वो कौनसी कमियां रही, पहले क्या कमियां रही, पिछले दस महीनों में क्या कमियां रही, यह सबका दायित्व है। लेकिन किसानों की इस समस्या के समाधान का रास्ता हमको खोजना है। प्रधान मंत्री का यह सामूहिक आह्वान यदि सच हुआ तो इस तरह देश का कोई गजेन्द्र नहीं आत्महत्या करेगा। प्रधान मंत्री ने यह भी सदन को कहा जो काफी महत्त्वपूर्ण है कि मैं इस विषय पर खुले मन से, जो भी सुझाव आये, आप जरूर बताइये, हम कोई न कोई रास्ता निकालने का प्रयास करेंगे। किसान को असहाय नहीं छोड़ सकते। हमें उसके साथ, उसके दुःख में सहभागी होना है, उसके भविष्य के लिए भी सहभागी होना है। और उस संकल्प... आज की चर्चा में वो संकल्प उभर कर आये, सामूहिक संकल्प उभर कर आये, कि हम सब मिलकर, अब हमारे किसानों को हम न मरने दें, मैं इतनी ही प्रार्थना इस सदन को करता हूँ। प्रधान मंत्री का यह वक्तव्य समयानुकूल है। कोई भी उस पद पर होता उसे ऐसी स्वीकार्यता दिखानी पड़ती लेकिन क्या इससे पहले किसान के लिए एक दर्जन से अधिक संकल्प किसान आत्महत्या रोकने के लिए सदन में नहीं दुहराए गए? क्या आत्महत्या रुकी? क्या सच में किसान की स्थिति सुधरी? ऐसे कई सवाल हैं, जिसका उत्तर न तो सदन के पास हैं और न सरकार के पास। किसान तो वैसे भी बेचारों की श्रेणी में आते हैं। हेय की दृष्टि से देखा जाता है उन्हें, यह चिंताजनक है। चिंताजनक यह भी है कि कार्पोरेट जगत और दुनिया के एक तरफ ऐशगाह बन रहे हैं दूसरी तरफ भूख, गरीबी और लाचारी में देश का अन्नदाता दम तोड़ रहा है। इन मौतों के बारे में तो यह भी कह दिया जाता है कि मरने दो...किसान है, यह सबसे बड़े लोकतंत्र का किसान है। किसान आत्महत्या की यह शृंखला जाने कब खत्म होगी लेकिन यह जो जुबान से किसान को हेय दृष्टि से देखने की संस्कृति विकसित हो रही है इसे रोकने की भी जरूरत है।
डॉ. कन्हैया त्रिपाठी
डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, लेखक भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटील के संपादक एवं वर्तमान में यूजीसी- ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेण्ट सेण्टर, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर से सम्बद्ध हैं।