महान संघर्ष समिति ने 54 गांवों में वनाधिकार कानून लागू करने की मांग की।
सिंगरौली में कार्यकर्ताओं के दमन पर मानव अधिकार संगठनों को लिखी चिट्ठी,
प्रशांत भूषण और मधु सरीन जैसे सामाजिक कार्यकर्ता आए महान संघर्ष समिति के पक्ष में
नई दिल्ली, 1 अगस्त 2014। देश के कई सिविल सोसाइटी समूह महान संघर्ष समिति के समर्थन में खुलकर सामने आ गए हैं। उन्होंने जोर देकर कहा है कि सरकार महान वन क्षेत्र (मध्यप्रदेश) के ग्रामीणों के अधिकार को उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए खत्म नहीं कर सकती। उन्होंने राज्य और केन्द्र सरकार को तुरंत वनाधिकार कानून लागू करने की मांग की जिससे स्थानीय ग्रामीणों को लाभ प्राप्त हो सके। यह मांग उस समय आयी है जब महान वन क्षेत्र में प्रस्तावित कोयला खदान का विरोध कर रहे कार्यकर्ताओं को स्थानीय पुलिस द्वारा डराया-धमकाया जा रहा है और दो ग्रीनपीस कार्यकर्ताओं को मंगलवार को गिरफ्तार भी कर लिया गया था।

संवाददाता सम्मेलन में “पावर फॉर द पीपुल” नाम से एक रिपोर्ट भी प्रकाशित की गयी, जिसमें महान वन क्षेत्र के ग्रामीणों का महान जंगल में निर्भर सामाजिक और आर्थिक हालात का अध्ययन किया गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दो गांवों (अमिलिया और बुधेर) के 60 प्रतिशत लोगों के पास एक एकड़ से भी कम जमीन है। ग्रामीणों का आर्थिक स्रोत का आधार वनोपज ही हैं क्योंकि सिर्फ खेती से वे अपनी आर्थिक जरुरत पूरी नहीं कर पाते हैं।

अमिलिया के ग्रामीण और महान संघर्ष समिति के सदस्य हरदयाल सिंह गोंड ने कहा कि, “महान जंगल पर हम पीढ़ियों से अपनी रोजी-रोटी के लिए निर्भर हैं लेकिन प्रशासन ने कभी जंगल पर हमारे अधिकार पर कुछ नहीं बोला और आज उसे कंपनी को सौंप दिया गया है। यह जंगल हमारी जिन्दगी है। हम लोग प्रशासन और कंपनी के दबाव से डरे हुए नहीं हैं। हम अपनी लड़ाई को जारी रखेंगे और अपने जंगल की रक्षा करेंगे।“

वनाधिकार कानून के ड्राफ्टिंग कमेटी की सदस्य रही मधु सरीन ने कहा कि दशकों से जंगलवासियों के साथ हो रहे अन्याय को दूर करने के लिए वनाधिकार कानून लाया गया था, जिसे कभी मान्य नहीं माना गया जब उनकी जमीन राज्य का जंगल घोषित था। इसलिए वनाधिकार कानून को लागू करवाने के लिए सबसे पहले ग्राम सभा को व्यक्तिगत और सामुदायिक वनाधिकार प्राप्त करने के लिए प्रक्रिया शुरु करना होता है।

प्रस्तावित कोयला खदान से करीब 54 गांवों के 50 हजार से अधिक ग्रामीणों की जीविका खतरे में आ गयी है। गोंड ने कहा कि सभी 54 गांवों के लोगों को निर्णय करने का अधिकार मिलना चाहिए कि उन्हें जंगल चाहिए या नहीं लेकिन अभी तक किसी भी गांव में एक भी सामुदायिक वनाधिकार कानून को लागू नहीं किया जा सका है।

पहले सामुदायिक वनाधिकार की पूर्ति हो और फिर ग्राम सभा

करीब एक हफ्ते पहले ही जिला कलेक्टर एम सेलवेन्द्रन ने महान संघर्ष समिति और अन्य ग्रामीणों के साथ बैठक करके फर्जी ग्राम सभा पर बात की थी और नया ग्राम सभा आयोजित करवाने की घोषणा भी की। ग्रीनपीस की सीनियर कैंपेनर और महान संघर्ष समिति की सदस्य प्रिया पिल्लई ने कहा, “हमारे संघर्ष का ही परिणाम हुआ कि स्थानीय प्रशासन ने माना कि जिस ग्राम सभा के आधार पर कोयला खदान को हरी झंडी दी गयी थी उसमें कई गड़बड़ियां हैं और उसमें पारित प्रस्ताव में कम से कम 9 मरे हुए लोगों के हस्ताक्षर हैं। कलेक्टर द्वारा फिर से और निष्पक्ष ग्राम सभा करवाने का आश्वासन दिया गया है जो पिछले ग्राम सभा प्रस्ताव को अमान्य करार दे देगा। प्रशासन का यह पहला स्वागतयोग्य कदम है लेकिन ग्राम सभा को निश्चित तौर पर नियमानुसार होना चाहिए और वनाधिकार कानून को सभी गांवों में पूरी तरह लागू किया जाना चाहिए”।

सरीन ने कहा कि 31 जुलाई 2009 को जनजातीय मंत्रालय द्वारा पारित आदेश में ग्राम सभा को पहले वनाधिकार कानून की प्रक्रिया को शुरू करने तथा पूरा करना साबित करना होता है। इसके बाद ही समुदाय से वन हस्तांतरण के लिए सहमति लेना होता है।

कलेक्टर ने उस बैठक में मुआवजे की बात भी की थी। पिल्लई ने कहा कि कलेक्टर ने सामुदायिक अधिकार, मुआवजा और ग्राम सभा तीनों पर एक साथ बात की लेकिन हकीकत यह है कि बिना ग्राम सभा और सामुदायिक वनाधिकार दावों की पूर्ति किए बिना मुआवजा के बारे में बात नहीं हो सकती।

दूसरी तरफ वन विभाग ने एस्सार के अधिकारियों के साथ मिलकर पहले ही महुआ पेड़ों पर मार्किंग करके मुआवजे के लिए सर्वे कर लिया है। गोंड ने कहा कि हम लोग ऐसे प्रयासों का बहिष्कार करते हैं। सरकार को पहले हमारे सामुदायिक वनाधिकार कानून की पूर्ति करना होगा जिसके बाद ही ग्राम सभा आयोजित किया जाय और ग्राम सभा में खदान के पक्ष में प्रस्ताव पारित होने पर ही मुआवजे की बात की जाय।

शांतिपूर्वक विरोध को दबाने की कोशिश

ग्राम सभा की घोषणा के साथ ही ग्रीनपीस और महान संघर्ष समिति ने जिला प्रशासन के रवैये में आए बदलाव का स्वागत किया था। लेकिन इसके बावजूद 29 जुलाई को अमिलिया में ग्रीनपीस के मोबाइल फोन सिग्नल बूस्टर और सोलर पैनल को सिंगरौली पुलिस ने छापा मारकर जब्त कर लिया। और देर रात सोते हुए दो ग्रीनपीस कार्यकर्ताओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। ग्रीनपीस ने कहा कि महान और देश के दूसरे हिस्सों के बीच संवाद को खत्म करके निष्पक्ष ग्राम सभा करने की मंशा पर शक होता है। महान संघर्ष समिति ने चेताया है कि किसी भी हालत में ग्राम सभा को परदे के पीछे आयोजित नहीं किया जाना चाहिए।

सिविल सोसाईटी के सदस्यों ने पुलिस द्वारा शांतिपूर्वक तरीके से विरोध कर रहे कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करने की निंदा की है। वरिष्ठ वकील और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने संवाददाता सम्मेलन में कहा कि सिविल सोसाइटी समूहों पर लगातार बढ़ रहे हमले दर्शाते हैं कि किस तरह सरकार अपने हितों के खिलाफ उठने वाली आवाज को दबाने का प्रयास कर रही है।

ग्रीनपीस ने महान में कार्यकर्ताओं की अवैध गिरफ्तारी के खिलाफ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, एशियन मानवाधिकार आयोग तथा संयुक्त राष्ट्र विशेष प्रतिवेदक को भी लिखा है। महान संघर्ष समिति और ग्रीनपीस कार्यकर्ताओं ने आज जनजातीय मामलों के केन्द्रीय मंत्री जोएल ओराम को ज्ञापन सौंपा और मांग की कि सरकार महान में निष्पक्ष ग्राम सभा करवाए तथा लोगों के अधिकारों की रक्षा करे।

सिर्फ ग्राम सभा तय नहीं करेगा महान का भविष्य

प्रस्तावित परियोजना में न सिर्फ वनाधिकार कानून का उल्लघंन किया गया है बल्कि वन संरक्षण अधिनियम कानून 1980 का भी उल्लंधन हुआ है। प्रिया पिल्लई ने कहा कि इस परियोजना में वन सलाहाकार समिति के सलाहों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है। साथ ही वन व पर्यावरण मंत्रालय को संचयी आकलन रिपोर्ट के बारे में भी समझना चाहिए क्योंकि इस क्षेत्र में कई और परियोजनाएँ भी आने वाली हैं। दूसरी तरफ वन्यजीव अध्ययन अशुद्धियों से भरा पड़ा है, लेकिन परियोजना के अंतिम चरण को वन मंजूरी दे दी गई है।