महाराष्ट्र का चुनाव होगा दिलचस्प
महाराष्ट्र का चुनाव होगा दिलचस्प
सिद्धार्थ शंकर गौतम स्व. बालकृष्ण, स्व. प्रमोद महाजन और स्व. गोपीनाथ मुंडे ने शायद ही कल्पना की होगी कि उनके होने से महाराज की राजनैतिक के भाई-भाई इस तरह बैर कर अपनी राहें जुड़ाकर लेंगे। जिस महागठबंधन की विपक्षी दल भी मिसाल दिया करते थे, जिसकी एकता को राजनैतिक में अक्शुण्ण माना जाता था, दांव-पेच में उलझकर खत्म हो गया है। 25 वर्षों का अपना अनुपात की हनक में छूट गया और सत्ता भी ऐसी जिसकी सिरफ सांभवना थी, मिली नहीं थी। शिवसेना और भाजपा ने सीटों की लज़ाई को इस मोड़ पर लेकर खड़ा कर दिया था जहां सुलह के तमाम रास्ते बंद हो रहे थे। भाजपा के नेता दिल्ली से महाराष्ट्र की राजनैतिक को हांक रहे थे और मातोश्री को दिल्ली दरबारी में झुकना गवा नहीं था। इस पूरी कवायद में फायदे में कौन रहा और नुकसानों किसे हुआ, इसका आंकलन चुनाओं परिणामों के बाद ही जाएगा किन्तु राज्य की जनतंत्र जो कांग्रेस-राकांपा की भ्र्ष्टतम सरकार को सबक सिखाने और शिवसेना-भाजपा महागठबंधन को सत्ता सौंपने को आतुर थी, उसके साथ राजनैतिक ने ही चलकर दिया।


