मुंबई से हस्तक्षेप के सहयोगी अनुज शुक्ला की रिपोर्ट
मुंबई। कभी-कभी उम्मीदों का पड़ाव जितना करीब और आसान दिखाई देता है नजदीक पहुँचते-पहुँचते उतना ही कठिन हो जाता है। मोदी को लेकर देश भर में जिस तरीके का माहौल बनाया/ बना है उनमें कुछ खास राज्यों को उनके पड़ाव का अहम केंद्र माना जा रहा है। इनमें हिन्दी पट्टी के राज्यों के अलावा विशेष रूप से महाराष्ट्र को “मोदीमय” राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की संभावित रणनीति के केंद्र में रखा गया है। यह सच है कि मोदी की उम्मीदवारी और कई अहम मुद्दों के कारण बैकफुट पर नजर आ रही कांग्रेस और उसका संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन, हिन्दी पट्टी में भाजपा के मुकाबले काफी कमजोर है लेकिन अगर गैर-हिन्दी भाषी राज्यों, खासकर पश्चिम में महाराष्ट्र का जिक्र करें तो कई मायनों में संप्रग, राजग के मुकाबले अभी भी ज्यादा बेहतर स्थिति में है। यहाँ अन्य बेहतर विकल्प नहीं होने की स्थिति के कारण बड़ी तादात में अल्पसंख्यक और दलित मतों का झुकाव संप्रग की ओर बना हुआ है। दूसरी ओर भाजपा-सेना के मूल मतों का रिसाव राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की ओर जारी है।

महाराष्ट्र में लोकसभा के लिए कुल 48 सीटें दांव पर हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में यहाँ राजग और संप्रग के बीच सीटों का बँटवारा लगभग बराबरी पर छूटा था। ये नतीजे 2009 के थे जबकि आगामी चुनाव के मद्देनजर जो नई स्थितियाँ बन रहीं हैं उसमें एनडीए, राजनीतिक रूप से संप्रग से काफी पीछे दिख रहा है। गत वर्ष बाला साहब ठाकरे के निधन के बाद पहली बार एनडीए को उनके बिना चुनाव मैदान में उतरना होगा। ठाकरे के दक्ष नेतृत्व की कमी का बड़ा प्रभाव एनडीए के प्रदर्शन पर पड़ना तय माना जा रहा है। बाल ठाकरे के बाद सेना समर्थक मतों में बिखराव की आशंका तेज हो गई थी इस कड़ी में पिछले साल भर में राज्य की राजनीतिक उतार-चढ़ाव के दौरान कई बार यह स्पष्ट दिखा भी। इस बीच बागी नजर आ रहे पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर जोशी की टिप्पणियों से नाराज सेना कार्यकर्ताओं का उनके साथ धक्का-मुक्की करने की घटना ने राज्य के सेना क्षत्रपों में आपसी असंतोष की बात को उजागर कर दिया। बहरहाल दिवाली के दिन उद्धव ठाकरे के घर जाकर मनोहर जोशी ने इन अटकलों पर कुछ क्षणों के लिए विराम तो जरूर लगा दिया बावजूद राज्य में शिवसेना की अंदरूनी स्थितियाँ अभी भी एनडीए के लिए प्रतिकूल ही बनी हुईं हैं।

उधर, मनसे की ताकत पिछले पाँच सालों में बहुत ज्यादा बढ़ी है। हाल ही में बाल ठाकरे के देहावसान के बाद मनसे की प्रदेशव्यापी यात्राओं के दौरान राज ठाकरे को जिस तरीके हाथों-हाथ लिया गया वह काबिलेगौर है। शायद इन्हीं चीजों को देखते हुए भाजपा मनसे को राजग में शामिल करने के प्रयास में जुटी हुई है। नरेंद्र भाई मोदी से राज ठाकरे की नजदीकियाँ तथा मनसे को राजग का घटक बनाने की मुहिम को लेकर पुराने सहयोगियों; शिवसेना और रिपाई ख़ासे नाराज दिख रहें हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि मनसे के कारण एनडीए को होने वाले संभावित नुकसान की भरपाई कैसे की जाएगी जबकि यह किसी भी सूरत में मनसे का साथ मिले बगैर संभव नहीं है।

उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र में भाजपा, शिवसेना और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आठवले गुट) एनडीए के घटक हैं। बाल ठाकरे की अनुपस्थिति में सेना का कमजोर होता जनाधार और सेना के भीतर फूट की खबरें, रामदास आठवले के विरोधाभासी बयान और मनसे को लेकर मराठी मानुष का व्यापक समर्थन, एनडीए के भविष्य के लिए ख़तरे की घण्टी साबित हो रहा है। राज्य की मौजूदा सियासी हालात पर लीक हुए कुछेक सर्वे में भी इस बात का खुलासा हुआ है। इसके मुताबिक भले ही आठवले, भाजपा-शिवसेना के साथ महायुति में साथ खड़े हो गए हैं लेकिन बिना राज ठाकरे के संप्रग विरोधी वोटों का ध्रुवीकरण कतई संभव नहीं है। शायद यही कारण रहा हो कि राज्य में भ्रष्टाचार की शिकायतों, सिलसिलेवार सांप्रदायिक हिंसा की वारदात और बहुसंख्यक आबादी की निगाह में आलोकप्रिय सरकार होने के बावजूद विरोधी मतों में फूट का फायदा उठाते हुए संप्रग, पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव की हारी बाजी जीतने में कामयाब रहा।

देश में यही एक ऐसा राज्य है जहाँ कांग्रेस अपने सहयोगी के साथ सबसे बेहतर स्थिति में है भाजपा और उसका गठबंधन मनसे की अपेक्षा राज्य की जनता को विशेष रूप से प्रभावित नहीं कर पाया है। यहां भाजपा ‘मोदी मिशन’ 14 के नजदीक आते-आते काफी विवश और कमजोर बनती जा रही है। दरअसल राज्य में लोकसभा की 48 सीटों के मद्देनजर भाजपा की कोशिश है कि यहाँ से राजग को अधिकाधिक सीटें प्राप्त हों। इसके लिए करीब साल भर पहले दलित वोटों को आकर्षित करने के लिए भाजपा-शिवसेना ने महायुति में तीसरे घटक रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (रामदास आठवले ) को शामिल किया। बावजूद यहां राजग की स्थिति बहुत बेहतर दिखाई नहीं दे रही है। जानकारों के मुताबिक महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कारण राज्य में कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी विरोधी मतों में बिखराव का सीधा फायदा संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को मिल रहा है। इस वजह से वह राज्य में लगातार ताकतवर बना हुआ है, भले ही उसके सिर पर भ्रष्टाचार और राज्य में सांप्रदायिक हिंसाओं को रोकने की नाकामयाबी चस्पा हो।

भाजपा के लिए परेशानी की बात यह है कि किसी भी स्थिति में एनडीए में राज ठाकरे के प्रवेश को लेकर उद्धव ठाकरे राजी होते नहीं दिखाई दे रहे हैं। भाजपा द्वारा ऐसी किसी प्रक्रिया की शुरुआत पर हमेशा उद्धव ने भाजपा पर जोरदार हमला बोला है। राज ठाकरे से मोदी की नजदीकियों के कारण ही शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना में मोदी की आलोचना का कोई अवसर नहीं गँवाया। उधर, मनसे को एनडीए का हिस्सा बनाने की स्थिति में रिपाई अध्यक्ष रामदास आठवले ने भी साफ संकेत दिया है कि ‘अगर भाजपा की ओर से गठबंधन में राज ठाकरे को लाने का प्रयास किया जाएगा तो इस स्थिति में रिपाई गठबंधन से बाहर होगी’। वैसे भाजपा-शिवसेना और रिपाइ (आठले) के बीच सीटों के बँटवारे को भी लेकर अब तक आमराय नहीं बन पाई है। भविष्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि महाराष्ट्र फतह करने के लिए एनडीए कौन सी रणनीति बनाती है। अहम सवाल यह भी कि मोदी अपने प्रिय राज ठाकरे को राजग का हिस्सा बनाने में कामयाब होंगे कि नहीं।