अमलेन्दु उपाध्याय
महाराष्ट्र और हरियाणा विधान सभा चुनाव के परिणाम आ चुके हैं। हरियाणा में जहां भाजपा अपने दम पर सरकार बनाने जा रही है वहीं महाराष्ट्र में वह बहुमत से कुछ दूर रह गई है, हालांकि वहां भी उसकी सरकार बनने की राह में कोई खास रोड़ा नज़र नहीं आ रहा और केंद्र में भाजपा की सरकार होने का फायदा भी उसे महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए जरूरी नंबरों की जुगाड़ करने में सहायता दिलाएगा। इस सबसे हटकर बड़ा सवाल यह है कि दोनों ही राज्यों में भाजपा पिछले विधानसभा चुनाव में ऐसी ताकत नहीं थी कि वह इस चुनाव में सरकार बनाने की स्थिति में आ पाती। जाहिर है कि लोकसभा चुनाव में जिस तरीके से उसने बढ़त बनाई थी उस रफ्तार में कमी भले आई हो लेकिन पार्टी ने स्वयं को एक बार फिर साबित तो किया ही है। हरियाणा में जहां उसने पिछली विधानसभा चुनाव के मुकाबले लगभग बारह गुना अधिक सफलता प्राप्त की वहीं महाराष्ट्र में उसने अकेले दम पर 100 से अधिक सीटें पाने का करिश्मा कर दिखाया है।
तो इस जीत का श्रेय किसको दिया जाए ? पूरी पार्टी को या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ? जाहिर सी बात है कि जब पूरी पार्टी मिलकर इस जीत के लिए श्रेय मोदी को दे रही है तो हमें भी इसका श्रेय मोदी को देने में कोई ऐतराज नहीं है। हालांकि जब पिछले दिनों संपन्न राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश विधानसभाओं के उपचुनाव के नतीजे आए थे जिनमें भाजपा को कड़ी शिकस्त खानी पड़ी थी तब भाजपा नेता एक सुर में कह रहे थे कि राज्यों के चुनाव या उपचुनाव स्थानीय मुद्दों पर होते हैं और इन उपचुनावों में भाजपा की करारी हार को मोदी के करिश्मे के अंत के रूप में नहीं देखना चाहिए। आश्चर्यजनक रूप से वही भाजपा नेता अब महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा की सफलता को स्थानीय मुद्दों पर हुआ चुनाव न कहकर इसे मोदी की सफलता ही बता रहे हैं। जबकि असलियत यही है कि उपचुनाव में भाजपा की हार भी मोदी के खिलाफ जनादेश था और महाराष्ट्र व हरियाणा में मिल रही उसकी सफलता भी मोदी के खाते में ही है।
हरियाणा से ज्यादा महाराष्ट्र के नतीजे भाजपा के लिए जहां संजीवनी का काम कर रहे हैं वहीं, ये नतीजे भविष्य के कुछ खतरनाक संदेश भी दे रहे हैं।
भाजपा ने जिस जिद के साथ शिवसेना से अपना 25 साल पुराना गठबंधन तोड़ा और चुनाव में अकेले जाने का फैसला लिया, भले ही यह फैसला लोगों को उस समय बुरा लगा हो लेकिन ऐसा होना लाजिमी था। यहां ध्यान देने की बात यह है कि शिवसेना और भाजपा दोनों का एजेंडा उग्र हिंदुत्व ही है। जहां शिवसेना कई दशक से अपने उग्र हिंदुत्व के एजेंडे पर चल रही थी वहीं भाजपा लुके छिपे उग्र हिंदुत्व के एजेंडे पर चलती थी और अपने चेहरे पर उदारवाद का मुखौटा लगाए रहती थी। लेकिन भाजपा में मोदी युग का आगाज़ होते ही भाजपा ने विकास की चाशनी में लिपटा हुआ उग्र हिंदुत्व का रास्ता अपनाया। जाहिर है इस उग्र हिंदुत्व की लोकसभा चुनाव में जबर्दस्त सफलता से उसका आत्मविश्वास बढ़ा और महाराष्ट्र की जमीन पर इस उग्र हिंदुत्व की फसल काटने के लिए उसका शिवसेना से संघर्ष होना ही था। ऐसा इसलिए भी क्योंकि शिवसेना यदि उसके साथ रहकर चुनाव मैदान में उतरती तो इसका मुख्य लाभ शिवसेना को होता और भाजपा को आगे चलकर इसका नुकसान होता। लिहाजा भाजपा ने मोदी-अमित शाह की अगुवाई में अकेले चुनाव में उतरने का जो फैसला लिया वह अपना अस्तित्व बचाने के लिए उसकी मजबूरी में शामिल हो गया था।
दरअसल कोई भी सांप्रदायिक राजनीति हो, उसमें हाथ वही मारता है जो स्वयं को अधिक उग्र साबित कर ले जाए। मोदी युग से पहले शिवसेना स्वयं को भाजपा को मुकाबले उग्र साबित करती रही थी तो मोदी के आने और बाला साहेब ठाकरे के न रहने बाद भाजपा अमित शाह और मोदी के नेतृत्व में स्वयं को अधिक उग्र साबित करने में कामयाब रही है। वैसे भी पुराना इतिहास है कि भाजपा का पूर्ववर्ती चेहरा जनसंघ अतीत में हिन्दू महासभा को निपटा चुका है। अब शिवसेना को निपटाने का बीड़ा मोदी की भाजपा ने उठाया और उसमें काफी हद तक सफलता भी पाई। आने वाला समय शिवसेना के लिए काफी पथरीला साबित होने वाला है। जिस तरह से एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल का भाजपा को बाहर से समर्थन देने का जो बयान आया है, वह शिवसेना के लिए और चिंताजनक ही है।
इसके अलावा महाराष्ट्र के चुनाव नतीजे और भी खतरनाक संकेत दे रहे हैं, जो उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव, बिहार में लालू प्रसाद यादव व नीतीश कुमार और बंगाल में ममता बनर्जी के लिए खतरे की घंटी हैं। ये नतीजे साफ संकेत हैं कि यदि इन नेताओं व इनके दलों ने अपनी रणनीति नहीं बदलीं और अपने राजनीतिक चरित्र में ईमानदारी प्रदर्शित नहीं की (खासकर समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने) तो इन राज्यों में आने वाले दिनों में नतीजे कुछ और हो सकते हैं। जिस तरह से महाराष्ट्र में असदउद्दीन ओवैसी की एमआईएम को समर्थन मिला है, वह उन संभावनाओं पर एक ग्रहण है जो बिहार में लालू और नीतीश के साथ आने और उप्र में समाजवादी पार्टी को उपचुनाव में मिली सफलता से भाजपा के विरुद्ध एक साझा मोर्चा बनने से हुआ था।
कुल मिलाकर देखें तो महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी का गठबंधन टूटने और नरेंद्र मोदी के तूफानी प्रचार के बावजूद कांग्रेस और एनसीपी दोनों का प्रदर्शन इतना खराब भी नहीं कहा जा सकता, लेकिन ओवैसी की भूमिका का सही आकलन करने की आवश्यकता है। याद कीजिए लोकसभा चुनाव से ऐन पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को मीडिया हाइप के जरिए खड़ा करने का प्रयोग किया गया और जब उसके सकारात्मक नतीजे आए तो यही मीडिया प्रबंधन नरेंद्र मोदी के लाँच करने के लिए किया गया। जाहिर है नतीजा सामने है। ओवैसी की पार्टी को महाराष्ट्र में जो समर्थन मिला है उससे कहीं न कहीं संघ-भाजपा का एजेंडा ही सफल हुआ है। अब देखना यह है कि किस तरह से ओवैसी प्रयोग आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में दोहराया जाएगा।
देखने वाली बात यह है कि जब उपचुनावों में भाजपा उप्र, राजस्थान, गुजरात और बिहार में शिकस्त खा रही थी ठीक उसी वक्त उसका बंगाल में खाता खुल रहा था। यानी अगर ओवैसी फॉर्मूला (जरूरी नहीं इसके लिए ओवैसी की पार्टी का ही इस्तेमाल हो) बिहार, उप्र और बंगाल में आजमाया गया और उसे ऐसे ही समर्थन मिला जैसा महाराष्ट्र में मिला तो इन राज्यों के नतीजे भी, लगता नहीं कि महाराष्ट्र से अलग होंगे।
लोकसभा में सांप्रदायिकता पर बहस के दौरान जिस तरह से ओवैसी और योगी आदित्यनाथ ने मोर्चा संभाला था, वह इस तरह की राजनीति के प्रारंभ होने का साफ संकेत था।
बहरहाल उपचुनावों के बाद भाजपा में जो मायूसी का संचार हुआ था, वह मायूसी उत्लाह में बदल गई है, मोदी भाजपा के अंदर और ताकतवर होकर उभरे हैं और कांग्रेस अपनी पराजय से कोई सबक लेने को फिलहाल तैयार नज़र नहीं आ रही है और बहुसंख्यक सांप्रदायिकता से साथ-साथ अब अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।