महाश्वेता की याद : ईंट के ऊपर ईंट के ज़रिए
महाश्वेता की याद : ईंट के ऊपर ईंट के ज़रिए
शोषण शोषण और बेइंतहा शोषण, यही दिखाती हैं ईंट पर ईंट की चार झकझोरने वाली कहानियाँ। एक आदिवासी समाज के पास के थाने से अधिकारियों से, पुलिस से क्या उम्मीदें होंगी? क्या वे आदिवासियों की मदद करेंगे? पहली कहानी बयान हमारी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाती है। जहां गुंडे हँसते हुए एक आदिवासी लड़की मुसम्मात को छोड़ देते हैं हवाले पुलिस के और पुलिस अधिकारी चतुर्वेदी कहता है कि उसे लड़की का बयान लेना है। कौन सा बयान था वो जिसे गुंडा कहता है कि हाथ बांधकर लेना, मेरे साथियों ने कई बार बयान लिया। फिर इंस्पेक्टर के बाद हेड कांस्टेबल, सब बारी बारी रात भर बयान लेते हैं मुसम्मात का जो बाद में बन जाती है विरोध का एक हिस्सा। असल में “बयान” लेना इन इलाकों में बलात्कार का नया नाम है।
महाश्वेता देवी। मशहूर लेखिका, सामजिक कर्मी व एक संवेदनशील इंसान जिन्हें पिछले वर्ष हमने 28 जुलाई को खो दिया था। एक ऐसे इंसान को याद करना ज़रूरी हो जाता है जिसने अपना पूरा जीवन आदिवासियों, पिछड़ों, मजदूरों, किसानों व क्रांतिकारियों के लिए लगा दिया हो और जिसकी लेखनी शोषण के प्रतिरोध और दमन के खिलाफ आवाज़ उठाने में सदा अग्रणी रही हो। हज़ार चौरासीवें की माँ, अग्निगर्भ, रुदाली, द्रौपदी जैसी रचनाओं में शोषित समाज का दर्द, रोष, आन्दोलन और शोषकों का दोहरा रूप और सभ्य समझे जाने वाले समाज का असली रूप हमें दिखाती हैं महाश्वेता। तो चलिए उन्हें याद करते हैं उनकी लिखी एक ऐसी ही झकझोरने वाली पुस्तक “ईंट के ऊपर ईंट” के ज़रिए। राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस किताब ईंट के ऊपर ईंट के ज़रिए उन्हें याद करने का यह लेख एक प्रयास है।
जोसिन निकलती है काम की तलाश में, सब जानते हुए कि उसके साथ क्या होगा मगर जलते हुए जंगलों से दूर, साल के उसके पसंद के पेड़ों से दूर वो भी उन्हीं ईंट भट्टों के कारोबारियों के शोषण का शिकार बनती है जहां जाने कितनी लड़कियां या तो मर कर कष्ट से मुक्त हो गईं या उसी बाज़ार का हिस्सा बन गईं। आदिवासी लड़कियां आत्महत्या कर भी लें तो किसी को क्या फर्क पड़ता है? पुलिस प्रशासन सब तो उन साहूकारों, मालिकों का है जो कामगारों के खून से अपने कारोबारों को सींचते हैं। जिनके लिए जोसिन के अरमान, उसका वापस साल के पेड़ों के उत्सव मे जाना और अपनी मिट्टी के गीतों की महक मे खो जाना माने नहीं रखता। माने रखती है तो सिर्फ उनकी देह जो चाहते हुए भी उस पाश से निकल नहीं पाती।
जोसमीना और उसके अपने भी बेबस होकर सिर्फ रो सकते हैं या लड़ सकते हैं, एक से, दो से, तीन से, कितनों से भागोगे? यही सवाल पूछते हैं। और इतने बाहरी आदमियों के स्पर्श के बाद बिरादरी से निकाले जाने का डर, पति की बदनामी इन सब से बचने का एक ही रास्ता हथियार उठाना या फिर मौत को गले लगाना। जोसमीना का कोयना के शांत पानी के प्रेम में सारे दर्द को भुला कर ओझल हो जाना इस सारे शोषण के समाज से जिसे शनीचरी उंगली दिखाकर अपनी हालत का जिम्मेदार ठहरा चुकी थी। मगर जोसिन वो तो तेज़ तर्रार थी पर फिर भी उन सफेदपोश मालिकों के और गुंडों के चंगुल से निकल नहीं पाई। शायद यही सोचा होगा उसने आखिर, कि उसका असली दुश्मन कौन था? गरीबी, उसकी देह या उसका आदिवासी होना या ये शोषण पर टिका समाज।
चार कहानियों बयान, शनीचरी, राजाबाशा की रूपकथा और ईंट के ऊपर ईंट के माध्यम से महाश्वेता अपने अंदाज़ में चोट करती हैं शोषण पर टिके इस समाज पर। उजागर करती हैं विकास की दूसरी सच्चाई, अत्याचार, पुलिसिया दमन, और हाशिये पर धकेल दिए गए आदिवासी समुदाय की सच्चाई। उनका लेखन कभी चोट करता है, कभी डराता है, तो कभी शर्म दिलाता है। मगर सोचने पर विवश करता है कि आज भी आदिवासी या उनके हक की बात करने वालों की क्या स्थिति है। चाहे सामाजिक संगठन हों या छत्तीसगढ़, ओड़ीशा और झारखंड के आदिवासी। इतने वर्षों बाद भी हमें महाश्वेता देवी सार्थक दिखेंगी यही उनकी लेखनी की सच्चाई है। कहानियों के पात्र शनीचरी, जोसिन, मुसम्मात, गुलारी, नंदी, जोसमीना सब सोचने पर मजबूर करते हैं कि उनकी स्थिति का जिम्मेदार कौन है? किसके कारण पात्रों मासीदास, माटा का सब कुछ दांव पर लगता है और चतुर्वेदी जैसे पुलिसवालों व गुंडों का दमन जारी रहता है। महाश्वेता देवी अपने नब्बे वर्षीय जीवन के दौरान शोषितों की आवाज़ बनी रहीं झांसी की रानी से लेकर रूदाली, हज़ार चौरासी की माँ के किरदारों से उनका लेखन सदा आवाज़ देता रहेगा तब तक जब तक शोषण और उसका प्रतिरोध चलता रहेगा। और आज के समय में शायद हमें उनके काम को पढ़ने समझने की और ज़रूरत है।


