महिलाएं और शांति
महिलाएं और शांति
डॉ. असगर अली इंजीनियर
क्या पुरूषों की तुलना में महिलाएं शांति स्थापना में बेहतर भूमिका अदा कर सकती हैं? कई स्त्रीवादियों का मानना है कि शांति स्थापना के कार्य लिए पुरूषों की अपेक्षा महिलाएं कहीं अधिक उपयुक्त हैं। अगर ऐसा है तो इसके पीछे कौन से कारक हैं? क्या महिलाओं में वे कमजोरियाँ नहीं होतीं जो पुरूषों में होती हैं? क्या महिलाएं, पुरूषों से बेहतर शासक साबित हुईं हंै? इतिहास हमें क्या बताता है? इस लेख में हम इन व ऐसे ही कुछ अन्य प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास करेंगे।
वे कौनसे कारक हैं जो महिलाओं को पुरूषों से बेहतर शांति कार्यकर्ता बनाते हैं? हमारा समाज पितृसत्तामक है और अधिकांश महिलाएं दमित व शोषित हैं। अधिकतर मामलों में महिलाएं इस स्थिति को चुपचाप स्वीकार कर लेती हंै, उसे अपनी किस्मत मान लेती हंै। वे घर गृहस्थी तक सिमट जाती हैं और अपने पति व बच्चों की सेवा-सुश्रुषा को ही अपनी नियति मान लेती हैंं। कुछ महिलाओं को घर गृहस्थी सम्हालने के अलावा नौकरी भी करनी पड़ती है। उन पर दोहरा बोझ रहता है। औपचारिक लैंगिक बराबरी के बावजूद, पश्चिम के उन्नत प्रजातांत्रिक देशों में भी महिलाओं को पितृसत्तामक सांस्कृतिक मूल्यों का बोझा ढ़ोना पड़ता है। इस तरह, पूरी दुनिया में महिलाएं दमित हैं और दमित वर्ग हमेशा दमनकारियों की तुलना में शांति की कीमत बेहतर समझता है। यह महिलाओं के शांति का बेहतर वाहक होने का पहला कारण है।
महिलाएं, जननी होती हैं। माँ के रूप में वे जीवन की सृृष्टि करती हैं और उसका पोषण करती हैंं। उनके गर्भ में मानव जीवन अस्तित्व में आता है। महिलाएं शिशु को नौ महीनों तक अपने गर्भ में पालती हैं और उसके बाद, अपने जीवन को दांव पर लगाकर, उसे इस दुनिया में लाती हैं। शिशु के पैदा होने के बाद भी महिलाओं को महीनों ही नहीं सालों तक उसकी देखभाल करनी पड़ती है।
माँ से ज्यादा जीवन का मूल्य भला कौन समझ सकता है? इसके विपरीत, शक्ति के अहंकार में चूर पुरूष, सत्ता पाने की खातिर अन्य मनुष्यों की जान लेने में तनिक भी नहीं सकुचाता। महीनों तक कष्ट भोग कर अस्तित्व में लाए गए जीवन को आधुनिक हथियारों के जरिए एक सेंकेड में समाप्त कर दिया जाता है। एक बटन दबाकर एक नहीं बल्कि लाखों मनुष्यों की हत्या कर दी जाती है।
एक महिला, जो जीवन को जन्म देती है और उसे पालती-पोसती है, वह कभी ऐसे युद्धोन्माद को प्रोत्साहित नहीं करेगी जिसमें एक बटन दबाकर लाखों मनुष्यों को एक झटके में खत्म की कर दिया जाए। पितृसत्तामक समाज में महिलाओं की सत्ता में हिस्सेदारी नहीं रहती और इसलिए उनका जीवन व सोच, सत्ता के इर्दगिर्द नहीं घूमता। चूंकि पुरूषों को गर्भधारण व शिशु जन्म की कष्टप्रद प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता इसलिए वे मानव जीवन के प्रति उतने संवेदनशील नहीं होते जितनी कि महिलाएं। महिलाओं में जीवन के प्रति संवेदनशीलता, पुरूषों की तुलना में कहीं अधिक होती है।
जीवन के फलने-फूलने के लिए ढे़र सारे प्यार और संवेदनाओं की जरूरत होती है। घृणा से जीवन नष्ट होता है और प्रेम से पल्लवित। घृणा का जन्म, अक्सर, सत्ता संंघर्ष से होता है। सत्ता का लोभ मनुष्य को अंधा बना देता है और वह सत्ता पाने की खातिर मानव जीवन का बलिदान करने से भी नहीं चूकता। ऐसा नहीं है कि महिलाएं किसी की जान नहीं ले सकतीं या नहीं लेतीं। परंतु जहां पुरूष क्रूरतापूर्वक हत्याएं करते हैं वहीं महिलाएं किसी की जान लेने से पहले दस बार सोचती हैं। महिलाओं और पुरूषों का जीवन के प्रति दृष्टिकोण अलग-अलग होता है।
अगर महिलाएं सत्ता संघर्ष मेंं शामिल होती भी हैं तब भी वे उतनी निर्ममता से दूसरों की जान नहीं लेतीं जितनी निर्ममता से पुरूष ऐसा करते हैं। स्वभाव से ही महिलाएं पुरूषों की तुलना में अधिक दयालु होती हैं। हां, हद से ज्यादा प्रताड़ित किए जाने पर, अपवादस्वरूप, उनमें प्रतिशोध की भावना उत्पन्न हो सकती है। पुरूषों की तुलना में महिलाएं अधिक धैर्यवान भी होती हैं। धैर्य और कष्ट सहने की क्षमता दो ऐसे गुण हैं जो महिलाओं में पुरूषों की अपेक्षा कहीं अधिक होते हैं और इन गुणों के कारण ही महिलाएं मां बन पाती हैं।
कुछ विशेष प्रकार के मामलों को छोड़कर महिलाएं, पुरूषों की तुलना में कहीं कम अपराध करती हैं। सैन्य बलों में महिलाओं की उपस्थिति न के बराबर है। पिछले कुछ सालों से महिलाएं, सेनाओं के गैर-लड़ाकू ही नहीं बल्कि लड़ाकू दस्तों में भी भर्ती हो रही हैं परंतु इसके पीछे युद्ध करने में रूचि कम, यह साबित करने की इच्छा ज्यादा है कि महिलाएं किसी से कम नहीं हैं। युद्ध में भाग लेना महिलाओं की मूल मनोवृत्ति के विरूद्ध है। हमंें यह समझना होगा कि लैंगिक समानता की भी एक सीमा है। जैसा कि हम सब जानते हैं, लैंगिकता एक सामाजिक अवधारणा है जबकि महिलाओं और पुरूषों के मूल स्वभाव प्रकृति की देन हैं।
मैं यह नहीं कहता कि महिलाओं को युद्ध में भाग नहीं लेना चाहिए। परंतु मेरी यह मान्यता है कि उन्हें सिर्फ रक्षात्मक लड़ाई लड़नी चाहिए। वे आक्रामक युद्ध के लिए बनीं ही नहीं हैं। इस मामले में पुरूषों को महिलाओं से कुछ सीखने की जरूरत है। महिलाओं को आक्रामकता और क्रूरता के पुरूषों के पथ पर चलने की सलाह, कम से कम मैं तो नहीं दूंगा। यह एक नाजुक मसला है। स्त्रीवादी कह सकते हैं कि आखिर महिलाओं को पुरूषों के कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध में भाग क्यों नहीं लेना चाहिए। अगर महिलाएं हर मामले में पुरूषों के समकक्ष हैं तो युद्ध लड़ने के मामले में क्यों नहीं। उन्हें भी लड़ाई के मैदान में पुरूषों जैसी क्रूरता व आक्रामकता का प्रदर्शन करना चाहिए।
यह बात तार्किक लगती है परंतु तर्क हमेशा हमें सही राह नहीं दिखाते। महिलाओं को मातृत्व का वरदान प्राप्त है और मातृत्व के लिए जरूरी है जीवन को संरक्षण देने, उसे खतरों से महफूज रखने के गुण। ये गुण उन गुणों के ठीक विपरीत हैं जो एक सफल योद्धा में होने चाहिए। स्पष्टतः पितृसत्तामक मूल्यों के पैरोकार इस तर्क का इस्तेमाल महिलाओं को बराबरी के दर्जे से महरूम करने के लिए कर सकते हैं परंतु हमें कभी न कभी, कहीं न कहीं, किसी न किसी दुविधा का सामना करना ही पड़ता है और इस दुविधा से हमें न तो केवल तार्किकता बाहर निकाल सकती है और न ही केवल परंपरावादिता।
इस धरती को बेहतर बनाने के लिए हमें क्या चाहिए? केवल और केवल सकारात्मक मूल्य। पितृसत्तामक व्यवस्था से न केवल हमारे जीवन में सकारात्मक मूल्यों का घोर अभाव उत्पन्न हो गया है वरन् उसके कारण मानवता को अनेकानेक हादसों से गुजरना पड़ा। इतिहास में अब तक हुई हजारों लड़ाईयों में करोड़ों जानें जा चुकी हैं। और ये सब लड़ाईयां क्यांे हुर्इं? केवल इसलिए क्योंकि एक पितृसत्तामक समूह, दूसरे पितृसत्तामक समूह पर अपनी प्रभुता कायम करना चाहता था। अगर हमारी दुनिया मातृसत्तामक होती तो शायद इसका चेहरा और इतिहास एकदम भिन्न होता।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि मातृसत्तामक मूल्य जीवन के प्रति हमारे मूल नजरिये को ही बदल देते हैं। मातृसत्तामक व्यवस्था का मूलमंत्र है जिंदगी को संरक्षित करने वाले कारकों को प्रोत्साहन देना। और शांति इनमें से एक बहुत महत्वपूर्ण कारक है। किसी भी युद्ध या हिंसक संघर्ष मंंे मनुष्यों की जानें तो जाती ही हैं, जिंदगी को बेहतर बनाने वाले तत्वों का विनाश भी होता है। हर युद्ध अपने साथ जीवनस्तर में गिरावट लाता है।
इसके विपरीत, जीवन की बेहतरी, महिलाओं की चिंता का मुख्य विषय रहता है। जीवन समृद्ध और पूर्ण तभी हो सकता है जब दुनिया में शांति हो और इसके लिए यह जरूरी है कि दुनिया में पितृसत्तामक की बजाए मातृसत्तामक सोच का प्राधान्य रहे।
पुरूषों द्वारा तैयार की गईं शांति संधियों का चरित्र अस्थाई होता है। दोनों पक्ष इन संधियों के जरिए केवल फिर से युद्ध करने की तैयारी करने का समय चाहते हैं। इसके विपरीत, महिलाओं की प्राथमिकता अगला युद्ध लड़ना और जीतना नहीं वरन् स्थायी शांति स्थापित करना होगा क्योंकि केवल स्थाई शांति ही जीवन को समृद्ध करती है। संयुक्त राष्ट्रसंघ व अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों द्वारा लागू की जाने वाली संधियों को तैयार करने में मुख्यतः पुरूषों की भूमिका होती है। ये संधियां इतनी जटिल होती हैं कि कोई न कोई देश संधि की किसी न किसी न किसी शर्त का उल्लंघन कर ही देता है और यह एक नया युद्ध शुरू करने का बहाना बन जाता है।
इन संधियों में जोर उस “देशभक्ति“ पर रहता है जो शांति स्थापना को नहीं बल्कि अधिक से अधिक भूमि पर कब्जा करने को अपनी सफलता मानती है। किसी भी देश में शंाति का संबंध, उस देश के कब्जे की भूमि से नहीं होता। शंाति का संबंध नागरिकों और उनके जीवन की गुणात्मकता से होता है। अगर महिलाएं शांति संधियों का मसौदा तैयार करें तो शायद उनमंे ऐसी शर्तें डालें जिनसे हिंसा के पुनः फूट पड़ने की संभावना कम से कम रहे।
स्थाई शांति के लिए यह आवश्यक है कि सभी धार्मिक विचारधाराओं में विश्वास रखने वालों और विभिन्न धर्मावलंबियों को बराबरी का दर्जा मिले। सभी नस्लीय समूहों व विशेषकर अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्गों को यह अहसास हो कि देश उनका भी है। शांति तभी स्थाई हो सकती है जब समाज को बांटने वाली बातों को दरकिनार कर दिया जाए।
दुनिया का इतिहास हमें बताता है कि जमीन के ऐसे टुकड़ों की खातिर, जहां घास का एक तिनका भी नहीं उगता हजारों लोगों की जानें ले ली गईं। सच्ची शांति तभी स्थापित होगी जब हम जमीन से कम और मनुष्यों से अधिक प्रेम करें। देशभक्ति को भूमि पर स्वामित्व से जोड़ना एक खतरनाक अवधारणा है। इसी अवधारणा के चलते ही माताओं को ऐसे पुत्रों को जन्म देने के लिए सम्मानित किया जाता है जो देश की भूमि की रक्षा के लिए अपनी जान दे देते हैं।
यह महिलाओं की शांति की अवधारणा नहीं है। यह एक सामंती और पितृसत्तामक अवधारणा है। जमीन के चन्द टुकड़ों के लिए जानें गंवाने से शांति नहीं आएगी। शाांति के लिए हमें चाहिए धैर्य, सहिष्णुता, प्रजातंत्र और सबको साथ लेकर चलने की इच्छा। इस तरह की शांति केवल महिलाएं ही ला सकती हैं।


