मांडा के विश्वनाथ से जुड़ा है मोदी का तार, किसी मंदिर के विश्वनाथ से नहीं
मांडा के विश्वनाथ से जुड़ा है मोदी का तार, किसी मंदिर के विश्वनाथ से नहीं
विश्वनाथ प्रताप सिंह की पुण्यतिथि मुझे याद नहीं था। बावजूद उस दिन लगातार उन्हें स्मरण करता रहा। एक छोर पर गोविन्दाचार्य थे तो दूसरे छोर पर गैर सरकारी दलित लेखक एच एल दुसाध थे। सामाजिक न्याय के प्रति स्वानुभूतिपूर्वक विचार करने वाले और सहानुभूतिपूर्वक विचार करने वाले साथियों और संगठनों से अनायास ही संपर्क और संवाद होता रहा।
मेरे तमाम सहयोगी यथास्थितिवादी हैं। इन पर प्रगतिशीलता का मुखौटा भी होता है। पर समय-समय पर उनका असली चेहरा सामने आता रहता है।
पहले मैं बड़ा ही संकोच में होता या फिर मजबूर होता। दलित-वंचित और सामाजिक-न्याय की चर्चा स्वधर्मी और स्वमना समूहों में ही करता था। सार्वजनिक मंचों पर शोषक और शोषण पर मेरा भाषण निर्गुण और निराकार ही होता था। पर एक दशक से लगातार मैं बोल रहा हूँ। ब्राह्मणवाद जैसी बीमारी को बीमारी कह रहा हूँ। सवर्णवोध को सड़ाँध कह रहा हूँ। मनुष्य विरोधी किसी भी चिंतन प्रक्रिया का हिस्सा अब नहीं हूँ। यह सब विश्वनाथ का असर है ?
भारत-राष्ट्र की तबाही और बर्वादी में कालबाह्य और जनविरोधी नीयत और नीतियों की बड़ी भूमिका रही है। और आज भी उस समाजविरोधी रवैया को ढोने और इसे सैद्धांतिक और धार्मिक आधार प्रदान करने वाली जमात किसी न किसी रूप में जिन्दा है। ऊँच-नीच के वायरस मर नहीं रहे हैं ? वह किसी न किसी फॉर्मेट में सामने आ जाता है। इस वायरस के खिलाफ जंग लड़ना और जिहाद करना एक स्वस्थ और सबल समाज का निर्माण करना है। यही काम विश्वनाथ ने किया।
सरकारी तामझाम रहता है तो थोड़ा पता भी चलता है। सन्नाटे में ही वीपी सिंह की पुण्यतिथि गुजर गयी। अगर वीपी सिंह की पुण्य तिथि यूँ ही विस्मृत होती रहेगी तो देश में जातिवाद का जिन्दा रहने का संकेत मिलता रहेगा।
वीपी की उपेक्षा का आखिर कारण क्या है ? क्यों उन्हें गालियाँ मिलती हैं ? कौन उन्हें खलनायक कह रहा है ? 'राजा नहीं फ़कीर है और भारत की तकदीर है' यह नारा मुट्ठी भर लोगों को क्यों नहीं पच रहा है ?
वी पी का इतना ही अपराध था न कि सदियों से दबे, कुचले और पिछड़े लोगों को मुख्यधारा में लाया। मेरा तो मानना है कि वीपी ने सवर्ण समाज के लिए सेफ्टी वाल्व का काम किया। थोडा आरक्षण देकर दलितों और पिछड़ों को निबटा दिया और सवर्ण समाज को बचा लिया। अन्यथा समाज आज गृह-युद्ध में फँस गया होता।
सदियों के शोषण के खिलाफ आक्रोश और संघर्ष को वीपी ने हिंसक नहीं होने दिया।
आज मोदी और अमित अगर शीर्ष पर है तो उस मांडा के विश्वनाथ के कारण। किसी बाबा विश्वनाथ के कारण नहीं। याद किसे करना चाहिए और कर किसे रहे हैं मोदी। बाबा विश्वनाथ के कारण कोई चाय वाला देश का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। अगर ऐसा होता तो देश की यह दशा नहीं होती ?
इस मोदी का तार मांडा से जुड़ा है न कि किसी मंदिर से। वीपी के कारण ही कोई कुर्मी-कहार, गुआर-चमार, साह-तेली आज मांझी और मोदी बन रहा है।
सच यही है की मोदी लाख नाथों की यात्रा कर लें पर सियासी ताकत वनारस के विश्वनाथ नहीं वल्कि मांडा के विश्वनाथ ही देंगे।
समाज को मजबूती प्रदान करने वाले हर सपना संघर्ष और शख्सियत को मेरा सलाम। जब तक समाज में गैरबराबरी रहेगा वीपी को भुलाना आसान नहीं होगा। प्रति-प्रतिक्रियावाद अगर नहीं रुका तो समय की कोख से किसी वीपी प्लस की नीति और नेतृत्व का जन्म भी हो सकता है। आओ वीपी को सलाम करें ! और समाज को शक्तिशाली बनायें। वीपी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि !
O- बाबा विजयेंद्र


