डॉ. इमरान इदरीस

विगत चार माह से मैं बदायूँ को समझने की कोशिश कर रहा हूँ। जो भी लोग बदायूँ को नजदीक से जानते हैं, वे समझते हैं कि बदायूँ किस तरह से सामाजिक, सांस्कृतिक और उत्साही राजनीतिक जमीन है। बदायूँ की राजनीति में तीन महत्वपूर्ण विधानसभाएँ हैं जिनका राजनीतिक महत्त्व कभी कम न रहा। पहली गुन्नौर। सदैव राजनीतिक रूप से समाजवादी विचारधारा से प्रेरित रही है। ये नेता जी (मुलायम सिंह यादव) का क्षेत्र भी रहा है। दूसरी सहसवान, जो हमेशा से अपने राजनीतिक फैसले की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है। तीसरी बदायूँ ख़ास, जिसने यह सिद्ध करा है कि नेता चुनने का अधिकार सदैव उसका ही है।

बदायूँ हमेशा से वर्ग विभाजित रहा है। कभी सांप्रदायिक राजनीति और कभी अपने नेताओं की हनक के कारण। इन परिस्तिथियों में भी समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नेता जी ने बदायूँ को सदैव मिला कर चलने की कोशिश की। इसी के चलते बदायूँ पिछले 25 सालों तक इलाहाबाद के उन सलीम शेरवानी को अपना सांसद् चुनता रहा जो पिछले पच्चीस सालों में बदायूँ में अपना घर बनाने के लिये ढाई गज़ जमीन न खरीद सके और पच्चीस सालों में जिन्होंने पच्चीस रातें भी बदायूँ में न गुजारीं।

अब तस्वीर बदलती है लोकसभा चुनाव 2009 से। नये परिसीमन के कारण बदायूँ के क्षेत्रीय और परम्परागत वोट बैंक के नये समीकरण बनते हैं। लम्बे समय से चला आ रहे समीकरण अब बदलते हुये स्वरूप में कुछ और इशारा कर रहे थे। नेता जी ने स्थितियों को भाँपते हुये साहसिक फैसला लिया। मैनपुरी की अपनी परम्परागत सीट छोड़कर समाजवादी विचारधारा के सांसद धर्मेन्द्र यादव को बदायूँ की जिम्मेदारी दी गयी। जैसा कि स्थानीय लोग बताते हैं कि धर्मेन्द्र जी जब बदायूँ पहुँचे तब तक वह केवल समाजवादी नेताओं को ही जानते थे। बदायूँ की जनता के बीच अचानक चुनाव में पहुँचना धर्मेन्द्र जी के लिये स्वयं एक चुनौती थी। जिन दो वर्गों को मिलाकर शेरवानी और सांप्रदायिक चरित्र के भाजपा के रामसेवक पटेल ने बदायूँ के लोगों को दो खाँचों बाँट दिया था वहाँ पर अचानक चुनाव में पहुँचना और जनता को अपने पक्ष में खड़ा करना एक बड़ी चुनौती तो थी ही। शेरवानी साहब को यह मुगालता हो गया था कि अल्पसंख्यक वोट बैंक उनकी जागीर है। वे बदायूँ से नहीं गये। क्षेत्रीय यादवों पर पकड़ रखने वाले और सहसवान के पूर्व बहुबाली विधायक श्री डी पी यादव भी मैंदान में और सांप्रदायिक रंग का झण्डा लिये भाजपा।

शेरवानी का अंदाज़ा सही था। चुनाव प्रचार में धर्मेन्द्र यादव को अल्पसंख्यको के बीच अपनी बात रखने को बहुत कम जगह मिली। एक वर्ग ने अपनी सहानभूति उनसे न जतायी। बाहुबली डी पी यादव ने भी सहसवान और गुन्नौर में यादव वोट बैंक को भी विभाजित कर दिया। कठिन परिस्तिथियों में भी धर्मेन्द्र यादव ने समाजवादी विचारों को साधा और नेता जी के कुछ पुराने साथियों को लेकर हर समाज के वर्ग के अन्तिम व्यक्ति को भी साधा। धर्मेन्द्र यादव, इलाहाबाद की छात्र राजनीति में सक्रिय रहे हैं और ओजस्वी वक्ता हैं (स्वयं मैं उनके लगभग 5 - 6 भाषण सुन चुका हूँ )। वे अपनी बात को बहुत साफगोई से रखते हैं और स्वयं जनता से प्रश्न पूछ लेते हैं। जनता निरुत्तर हो जाती है। मैं समझता हूँ, उत्तर प्रदेश की राजनीति में केवल वही एक ऐसे राजनेता हैं जो अपने किये गये कार्यों से जनता को निरुत्तर कर देते हैं। यही उनकी ताक़त और पहचान है।

गुन्नौर की जनता ने सर्वाधिक उन पर विश्वास किया। कुल मतदाताओं के 46% ने उन पर विश्वास व्यक्त किया। बिसौली की मात्र 30% जनता ने। यहाँ पर कुछ मतों से डी पी यादव आगे थे। सहसवान की सर्वाधिक 31% जनता ने उन पर विश्वास व्यक्त किया। यहाँ विपक्षी उनसे 4% मत से पीछे थे। बिल्सी से 27% मत पाकर वह दूसरे स्थान पर रहे और शेरवानी उनसे 2000 मतों से आगे थे। जबकि बदायूँ शहर सीट पर एक वर्ग विशेष की बहुलता के कारण उनको मात्र 21% मत ही मिला। जबकि यहाँ पर 33% मत शेरवानी और 25% वोट डी पी यादव को मिला।

छात्र राजनीति ने धर्मेन्द्र जी को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वह एक सांसद होते हुये भी एक युवा छात्र नेता की तरह ही समाज के हर वर्ग को लेकर आगे बढ़ने का जज़्बा रखते हैं। मैनपुरी, जहाँ से वह पहले सांसद थे वहाँ के कुछ लोग उनको अन्दर से जानते हैं। वो कहते हैं कि धर्मेन्द्र पारस पत्थर हैं जिस भी कार्य को चाहते हैं उसको बखूबी करते हैं। ...खैर! धर्मेन्द्र यादव के सांसद बनने के बाद ही बदायूँ की जनता ने सही अर्थों में जाना कि सांसद होता क्या है!! लोग बताते हैं कि सांसद बनने के बाद धर्मेन्द्र जी पिछले चार वर्ष में जितना बदायूँ आये उतना तो शेरवानी 25 साल में नहीं आये। दिल्ली में शेरवानी जी का निवास एक राजा की भाँति था जिसमें प्रजा का आना- जाना झुककर होता था। मुलाकात की पर्ची लगाकर मिलना हो पाता था वह भी बजरिये उनके चम्पुओं के। चाय के प्याले प्रजा के आर्थिक और सामाजिक स्तर पर निर्भर होते थे, जो प्रजा को कभी-कभी ही नसीब होते थे। अधिकतर लन्दन में रहने वाले शेरवानी लोकतंत्र के वो राजा थे जिनको प्रजा मात्र चुनाव में नज़र आती थी।

सांसद बनने के बाद भी धर्मेन्द्र जी को शेरवानी साहब से विरासत में वर्ग, जाति और सांप्रदायिक आधार पर बँटी राजनीति मिली थी। मैनपुरी और बदायूँ में मात्र यही समानता है कि दोनों जगह धरती पर हैं पर एक समानता बहुत बड़ी थी और वो थी धरती पुत्र मुलायम सिंह यादव। बदायूँ नेता जी की भी कर्म भूमि रही है। इसीलिये धर्मेन्द्र जी ने बहुत तेजी से इस कर्म भूमि को समझा। वहीं से धर्मेन्द्र यादव का जन नेता बनने का प्रयास प्रारम्भ होता है।

बदायूँ की सरज़मीन मुस्लिम पीर और बुजुर्गों की है। विश्व प्रसिद्ध बड़े और छोटे सरकार की दरगाह यही हैं। हज़रत निजामुद्दीन औलिया साहब की पैदाइश भी यहीं की है। गुलाम वंश का असली संस्थापक इल्तुतमिश सुल्तान बनने से पहले बदायूँ का गवर्नर था। धर्मेन्द्र जी ने अपनी सांसद निधि का पहला कार्य यहाँ की खराब होती ऐतिहासिक इमारत की मरम्मत का कराया। लगातार बदायूँ भ्रमण। खुले जनता दर्शन में सुबह के 6 बजे से रात के 3 बजे तक सबसे मिलना उनको दूसरे राजनेताओं से अलग करता है। इसी बीच में जनता से जुड़े अन्य हितकारी बातें। कभी गुन्नौर, बिल्सी, सहसवान की सभाएँ। उनके जनता दर्शन से विधायक से लेकर जनता का अन्तिम व्यक्ति कोई भूखा या प्यासा नहीं जाता। समाज का हर वर्ग व जाति धर्म के व्यक्ति के काम के लिये प्रार्थना पत्र लेकर कार्यवाही की जाती है। सभी को नाम से जानने वाले धर्मेन्द्र शिकायतों का तुरन्त निपटारा चाहते हैं यही कारण है कि उनके दो सहयोगी यहाँ 24 घंटे निवास करते हैं। बदायूँ का प्रतिदिन का घटनाक्रम उनको बताया जाता है चाहे वो भारत या विश्व के किसी भी कोने में हों। यह कार्य कम से कम उनके 6 से 8 सहयोगी करते हैं। धर्मेन्द्र जी के सलाहकार और उनके लिये काम करने वाले अधिकतर उनके इलाहाबाद के साथी गण हैं जिन्होंने छात्र राजनीति से उनको चुनाव लड़ाया, फिर मैनपुरी और बदायूँ में भी देखा और समझा है। वे सभी स्वाभाव और विचारों से समाजवादी हैं, फक्कड़ मिजाज़ हैं लेकिन सच तो ये है कि वो सभी धर्मेन्द्र जी की शक्ति हैं।

कहने को तो धर्मेन्द्र जी बदायूँ के सांसद हैं पर पूरे प्रदेश और देश से इनसे बात और मार्ग दर्शन के लिये लोग मिलते हैं। कामकाज देखने के लिये हर शहर में अलग व्यक्ति सुनिश्चित है और वे सभी एक दूसरे से सम्पर्क में रहते हैं। हर दिन का समय अनुसार कार्यक्रम पहले से निर्धारित होता है। कभी- कभी तो महीनों से ही। धर्मेन्द्र बड़े दिल के मालिक हैं। उत्तराखण्ड की आपदा में सांसद निधि देने के बावजूद भी उन्होंने 25 लाख की धनराशि उपलब्ध करायी। अपने लोगों की मदद कैसे की जाती है और मानवता का जो पुट उनके अन्दर है। लोग कहते हैं कि ये उनको नेता जी से विरासत में मिला है। पर सच्चाई ये है कि ये उनका स्वभाव है।

मानवतावादी समाजवादी राजनेता और अब जन नेता की ओर। वे अभी कुछ महीनों पहले भारत सरकार की तरफ से (संयुक्त राष्ट्र संघ) यू एन ओ में भाषण दे कर आये थे। क्योंकि उनके ओजस्वी भाषण के बल को भारत के राजनेता पहचानते हैं। विगत विधानसभा चुनाव में उन्होंने समाज के हर वर्ग को किसी भी तरह से मिलाकर समाजवादी पार्टी को पाँच में से चार विधानसभा जितवायीं। इसके पीछे उनकी बहुत मेहनत है। खासकर बदायूँ और सहसवान की विधानसभा क्षेत्र में...

अगर बदायूँ के विकास की बात करें तो विगत 4 वर्षो में दातागंज से बेला डांडी तक रोड निर्माण का प्रस्ताव बन चुका है, इसी प्रकार बदायूं-उझानी के बीच नौशेरा से कादरगंजपुल के समीप तक रोड के लिये प्रस्ताव बनाया जा रहा है, कादरचौक क्षेत्र में कादरगंज के समीप बन रहे पुल तक सड़क बन जाने से कासगंज जिला को एक नया मार्ग खुल जाएगा और मैनपुरी आदि के लिये सफर आसान हो जायेगा। फिलहाल, कादरगंज के समीप गंगा पर बन रहे पुल का निर्माण अंतिम चरण में है। इसके अलावा दातागंज से बेलाडांडी मार्ग बनने से जिला शाहजहांपुर के लिये पुल के रास्ते लोगों को एक नया मार्ग मिलेगा। सीधे लखनऊ जाने वालों को इस रोड का बड़ा फायदा मिलेगा। यहाँ पुल बनकर तैयार है। मेडिकल कालेज के

कानपुर के मूल निवासी डॉ. इमरान इदरीस, पेशे से चिकित्सक (एमबीबीएस) हैं लेकिन आजकल जमीनी राजनीति के विद्यार्थी हैं। एक तटस्थ प्रेक्षक की भाँति बदायूँ (उ.प्र.) में रहकर आजकल राजनीति का बारीकी से अध्ययन कर रहे हैं।

किसानों की जमीन का बैनामा कराने की प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुँच चुकी है। 254 किसानों में से 246 ने अपनी जमीन मेडिकल कालेज के नाम कर दी है, बिल्सी के बस अड्डे को 6 करोड़ मिल चुके हैं, अनूपशहर में बैराज बनाने का प्रस्ताव किया गया है। नदी से नहर निकालने में बदायूँ जिले की जमीन ऊँची पड़ रही है। इसलिये लिफ्ट कैनाल निकालने की प्रक्रिया शुरू की गयी है। नहरविहीन बदायूं जिले में यूँ तो गंगा और रामगंगा जैसी बड़ी नदियाँ हर साल तबाही मचाती हैं लेकिन कृषि आधारित इस जिले में सिंचाई के संसाधनों का अभाव है। गंगा नदी से नहर निकलवाने के लिये सांसद धर्मेद्र यादव काफी दिनों से प्रयास कर रहे थे। शेखुपुर की चीनी मिल सांसद धर्मेद्र यादव ने किसानों की समस्या को समझते हुये पिछले दिनों चीनी मिल के विस्तारीकरण के लिये प्रस्ताव प्रदेश सरकार को भेजा था। राज्य सरकार ने इस प्रस्ताव का परीक्षण कर दिल्ली में सहकारी चीनी मिल से संबंधित एडवाइजरी बोर्ड को भेज दिया। पिछली साल रामगंगा में आई भीषण बाढ़ से दातागंज तहसील क्षेत्र का नवादा मधुकर गांव की 400 बीघा खेती सैलाब में समा गयी। ग्रामीणों की आवाज तो लगातार उठती रही, लेकिन सांसद धर्मेद्र यादव की पहल पर मुख्यमंत्री कार्यालय भी सक्रिय हुआ और 11 करोड़ रुपये की लागत से बांध बनाने के लिये मुख्य अभियंता स्तर से भी हरी झंडी मिल चुकी है। बदायूँ के लोगो के सुख-दुःख, समस्याओ में शामिल धर्मेन्द्र जी की सबसे बड़ी काबिल-ए-तारीफ बात ये कि जिस अल्पसंख्यक समुदाय से उनको वोट नहीं मिला उस पर उन्होंने कभी अपना सार्वजानिक बयान नहीं दिया और लगातार अल्पसंख्यक कल्याण की न केवल बात करते रहे, काम करते रहे बल्कि धरातल पर भी काम करते रहे। एक प्रकरण तो बड़ा प्रचलित है। चुनाव जीतने के बाद ये जानते हुये कि अल्पसख्यक समुदाय का वोट उनको नहीं मिला वो चुनाव के तुरंत बाद हुई ईद नमाज़ में पहुँच गये। सबने देखा कि लोगों ने कैसे उनको हाथो-हाथ हाथ लिया। लोग धर्मेन्द्र जी से मिलने के लिये आतुर थे। जिन शेरवानी को उन्होंने वोट दिया वो तो कभी ईद में लोगो से मिलने बदायूँ न आये थे। इस प्रकरण ने धर्मेन्द्र जी की सर्व जन नेता की छवि को मजबूत किया। पिछले कुछ दिनों पहले धर्मेन्द्र जी ने रोज़ा अफ्तार का कार्यक्रम रखा। बदायूँ में एक साथ एक ही समुदाय के लोग और इतने उलेमा (धर्मगुरु) का नज़ारा पहले किसी ने न देखा था। ये इतिहास बना। बदायूँ की जनता अब उनको अपना नेता नहीं बल्कि घर का सदस्य मानती है। समाज के हर वर्ग, जाति और धर्म के नेता बदायूँ के जननेता " सांसद धर्मेन्द्र यादव" अब देश के जननेता बनने जा रहे हैं। कहते हैं कि इतिहास का साक्षी होना गर्व का अनुभव करता है। मुझे गर्व है कि मैं धर्मेन्द्र यादव जी के जन नेता बनने का साक्षी हूँ और सहयोगी भी.....