मिले सुर मेरा तुम्हारा
मिले सुर मेरा तुम्हारा
जुगनू शारदेय
अचानक पता चलता है कि निर्वहन कुमार के राजपाट में भी राजपाद की कमी नहीं है । यह बताता है पटना हाई कोर्ट । सचमुच में अदालत धृतराष्ट्र होता है ।देखते हुए भी नहीं देख पाता या नहीं देखते हुए देख पाता है । देख भी लेता है तो कानून की घुमावदार गली में घुमते हुए बंद गली के आखिरी मकान के दरवाजे पर देवदास हो जाता है । यह होता है राजपाद । इसमें राजपाट का दोष होते हुए भी दोष नहीं होता । यह नियम – उपनियम – परिनियम – अधिनियम का राजपाद होता है । सपनों वाले इस देश के भले लोगों ने सोचा था – हालांकि अब यह एक बड़ा सवाल है कि सपनों वाले भले लोग सोच भी पाते थे क्या । यहां सोच का मतलब नजरिया से है – दूरदृष्टि से है । यह भी हो सकता है कि सपनों वाले भले लोगों ने सोच रखा था कि उनके लोकतंत्र में हमेशा एक ही पार्टी का राजपाट होगा । इस राजपाट में थोड़ा बहुत काम राज्यपाल के पास भी होना चाहिए । सो औपचारिक भाषणों के साथ उच्च शिक्षा की जिम्मेदारी भी दे दी । मान कर चले होगे सपनों वाले भले लोग कि राज्यपाल और मुख्य मंत्री एक सुर में गाएंगे मिले सुर मेरा तुम्हारा । हुआ उलटा । एक सुर क्या बेसुरा सुर भी न बना राज्यपाल और मुख्य मंत्री के बीच । नहीँ मिले सुर मेरा तुम्हारा ।
पटना हाई कोर्ट ने निर्वहन कुमार की बिहार सरकार को छे हफ्ते का वक्त दे दिया कि विश्वविद्यालय में व्याख्याता की बहाली की संख्या बता दें – इसे हाई कोर्ट ने गरीबी रेखा वाला संख्या नहीं माना जो तय ही नहीं हो पाता । असली वाली संख्या बताओ ।
अब कैसे बताएं असली वाली संख्या । विश्वविद्यालय पर राज्यपाल का कब्जा होता है । निर्वहन कुमार का मामला होता तो बहाली की कार्यवाही शुरु हो जाती । जैसे स्कूलों के शिक्षकों की बहाली पिछले पांच साल से चल रही है , वैसे ही चलती रहती । राज्यपाल विश्वविद्यालय के मामले में कुलाधिपति हो जाते हैं । यह बिना कुल के होते हैं । किसी को पता नहीं होता कि कुल कहां है । पर वह होता है कुलाधिपति यानी उच्च शिक्षा का पालक । इसमें सड़ता रहता है पढ़ने वाला बालक । बालक की सेहत पर भी कोई फर्क नहीं पड़ता । जब पढ़ा ही नहीं तो परीक्षा की अबूझ पहेलियों का उत्तर अनबूझे हुए उत्तरों की नकल कर देता है । यहां एक दम मिला होता है मिले सुर मेरा तुम्हारा ।
खैर , इतना काम तो कर ही डाला कुलाधिपति ने कि अपने तर्क सम्मत रपट में बता दिया कि बिहार 3019 व्याख्याता की आवश्यकता है । यह रपट 10 नवंबर को पेश की गई । इस काल में सरकार लोकतंत्र हो जाती है । उसके ऊपर एक आचार संहिता होता है । इसमें सिर्फ वोट मांगा जाता है । वोट मांगने से भी ज्यादा वोट मांगने का खर्च का हिसाब मांगा जाता है । इस काल में किसी का सुर किसी से नहीं मिलता । पर कहा यही जाता है कि मिले सुर मेरा तुम्हारा।
अब कुलाधिपति का सुर मिले तो वह आलाप ले कर राज विलंबित गाएं या राग द्रुत सुनाएं । बस अदालत यही मानती है कि वह जल्दी से जल्दी कोई निर्णय तो लें । पिछले दिनों उन्होने कुछ कुलपति बनाए हैं । सारे कुलपति मिले सुर मेरा तुम्हारा ही हैं । पता नहीं देश कब अपने देश के राजपाट की शैली के राजपाद से मुक्त होगा । तब तक दिल तो बच्चा है जी , सुर के मामले में कच्चा
हैजी।


