अनुज शुक्ला

आतंकवाद को लेकर के भारतीय मीडिया का नजरिया अभी भी 1947 के धार्मिक विभाजन पर अटका हुआ है। भले ही बीते

छः दशकों में उसने खुद को लोकतंत्र के सबसे बड़े पहरूए के रूप में स्थापित किया हो। सांप्रदायिक वैमनस्यता के खिलाफ संघर्ष का नारा बुलंद करने वाला भारतीय मीडिया की सच्चाई; सांप्रदायिक दंगों या दहशतगर्दी फैलाने के लिए किए गए वारदातों पर उसकी रिपोर्टिंग से तय हो जाती है। दरअसल दो दशकों में मीडिया ने आतंक को लेकर ऐसा आभासी संसार गढ़ दिया है जिसमें टीवी के लिए आतंक से जुड़ी हुई खबरें छुपे एजेंडे को स्थापित करने वाली साबित हो रही हैं। अगर साल भर की खबरों का एक औसत निकाला जाय तो शायद आतंक से जुड़ी खबरों पर मीडिया ने अपना सबसे ज्यादा वक्त जाया किया है। जाहिर है मीडिया की इस ‘आत्मचिन्ता’ के परिणामस्वरूप आतंक की एक भ्रामक तस्वीर बनाई गई, बे-सिर-पैर की रिपोर्टिंग और विश्लेषण का खामियाजा बेगुनाह और निर्दोष लोगों को भुगतना पड़ा है। दरअसल आतंक को लेकर मीडिया का नजरिया जमीनी सच्चाईयों से रूबरू ही नहीं, ठीक वैसे ही जैसे हमारे देश की आंतरिक सुरक्षा (?) निर्वाचन आयोग की लिस्ट से दहशरगर्दी में शामिल या भगोड़े आतंकियों के नाम के खुलासे कर देती हैं लेकिन बाद में पता चलता है कि अमुख किसी आतंकी वारदात में शामिल ही नहीं रहा है या अमुख किसी भारतीय जेल में बंद पड़ा हुआ है। इसका कारण आतंकवाद पर हमारा नजरिया है जो अनिल शर्मा की गदरनुमा फिल्म के दायरे से बाहर निकल कर विश्लेषण करने में असमर्थ है।

अभी मुंबई में हुए बम धमाकों ने मीडियाई बाजार में इस्लामिक आतंकवाद से जुड़ी खबरों की ऊंची बोली लगाई है। राष्ट्र के प्रति उमड़ा मीडिया का यह अप्रतीम प्रेम, कइयों की जिंदगी में बुरे दौर का सबब साबित हो रही है। बम धमाकों पर चिंता जायज है लेकिन किसी ब्रेकिंग खबर को दिखाने की होड और इस प्रक्रिया में उस खबर का एंगल काबिलेगौर है। दिल्ली में हुए बम हादसों को बीते ज्यादा वक्त नहीं हुआ है, जिसके तार गाजियाबाद के पिलखुआ से जोड़े गए थे। जब पिलखुआ का तार इस घटना से जोड़ा गया तो पूरा का पूरा देशी मीडिया, पिलखुआ को कवर करने के लिए उमड़ पड़ा। जी न्यूज के रिपोर्टर की रपट काबिलेगौर थी। उसकी रिपोर्ट से जो बात ध्वनित हो रही थी उसका मजमून यह था कि ‘पिलखुआ में इस्लामिक आतंकी संगठन आतंक की नई फसलों को तैयार करने के लिए लंबे अरशे से ट्रेनिंग कैंपों का संचालन कर रहे थे’ । सनद रहे कि पिलखुआ के ‘टुंडा’ को सरकारी जांच एजेंशियाँ फरार आतंकी के रूप में चिन्हित कर चुकी हैं। बहरहाल टुंडा के भाई से जीन्यूज़ के उक्त रिपोर्टर का सवाल-जवाब भी कम दिलचस्प नहीं था। रिपोर्टर अपने विभिन्न सवालों के माध्यम से बार-बार टुंडा के भाई से यह साबित करवा रहा था कि टुंडा एक भगोड़ा आतंकी है, वह गाँव में ट्रेनिंग कैंप चला रहा था, और कस्बाई मुसलमानों में आतंक के प्रति रूझान बढ़ रहा है । हो सकता है कि अमुख चैनल का नजरिया बहुत न्यायपूर्ण हो लेकिन कोई भी मीडिया-साक्षर व्यक्ति उस खबर से पड़ने वाले असर को महसूस कर सकता है।

मुंबई में जब बम हादसे हुए तो उससे ठीक दो दिन पहले महाराष्ट्र के गृहमंत्री पाटिल का एक बयान मीडिया हलक़ों में उभरा था कि ‘शहरों, कस्बों और महानगरों के अभिभावक अपने बच्चे पर नजर रखे, हो सकता है कि उनका अपना बच्चा माओवादी हो’। उनके इस बयान के बाद मुंबई में बम हादसे हुए और अगले दिन गुरूवार को जी न्यूज की दोपहर की ब्रेकिंग बुलेटिन में इसके मुंबई संवाददाता ने इस घटना को माओवादियों से जोड़ कर अपना विश्लेषण प्रस्तुत किया। मीडिया की आतंक पर खबरें बहुत सवाल पैदा करती हैं, लेकिन जो मौजूं सवाल है कि ‘जब देश के भीतर सरकार के विरोध की बयार गरम और तेज होती है आखिर तभी क्यों आतंकी वारदातें उभरकर सामने आती हैं? दिलचस्प है कि मीडिया की तीसरी आँख जो अपनी पहुँच किचनरूम और बेडरूम तक होने का दावा करती है वह उस पूरे रहस्यमयी ‘एंगल’ को क्यों छोड़ देती है? दिल्ली में जब धमाके हुए थे तो दिल्ली सरकार विरोधी प्रतिरोधों का अड्डा बनती जा रही थी; मुंबई में जब हादसे हुए तो सरकार एक बड़े राजनीतिक संकट में फंसी हुई नजर आ रही थी, क्या सूचना माध्यमों को किसी अभीष्ट की सिद्धि का जरिया नहीं कहा जाएगा! अगर नजर दौड़ाए तो पाएंगे कि आतंक की इन वारदातों के बाद देशभर का नजरिया एक उन्मादी राष्ट्रवादिता में तब्दील हो जाता है। साथ ही राजनीति के छल-प्रपंच भी इन्ही मुद्दों के इर्द-गिर्द सिमट जाते हैं।

अपनी साख के लिए संघर्षरत भारतीय मीडिया से यह अपेक्षा करना कि ’यह अपनी वस्तुनिष्ठता एवं तथ्यात्मकता को बरकरार रखेगी ; महज एक कोरी कल्पना है। क्योंकि मीडिया की सोच या वैचारिकी की निर्मिति का बहुतायत स्त्रोत इस्राइल केन्द्रित, पश्चिमी दृष्टिकोण बना हुआ है। इसे रात्को म्लैडीच और ओसामा पर दिखाए गए खबरों के एंगल के आधार पर तय किया जा सकता है। म्लाडीच ने 1995 में बोस्निया युद्ध के दौरान, ‘स्रेबरेनिका’ के शरणार्थी शिविर में पनाह लिए 7500 बेगुनाह मुसलमानों का कत्लेआम किया, ताकि इस समुदाय से 15 वी शताब्दियों में हुए अत्याचारों का प्रतिशोध ले सके। म्लाडीच के कुकर्मों की व्याख्या की जगह भारतीय मीडिया ने उसके पक्ष में, बेलग्रेड और अन्य हिस्सों में आंदोलनकारियों की उन फुटेज का प्रसारण किया जो जनमत निर्माण के माध्यम से उसके गुनाहों पर नस्ली पर्दा ढापने का काम कर रही थी, जबकि ओसामा के मार दिये जाने के बावजूद उसकी आगामी पचास सालों की कार्य-योजना के विश्लेषण से भारतीय मीडिया के प्राइम टाईम सराबोर पाये गए। सरोकार, प्रतिबद्धता एवं भारतीयता की दुहाई देने वाला भारतीय मीडिया को किस आधार पर संवेदनशील खबरों की रिपोर्टिंग को लेकर फिक्रमंद कहा जाय?

अनुज शुक्ला
स्वतंत्र पत्रकार
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