संदीप शिवम
मुज़फ्फरनगर। मुज़फ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा और अब शरणार्थी कैम्पों में ठण्ड के कारण मौत को गले लगा चुके लोगों और बच्चों की संख्या अब सैकड़े से कई हद पार कर चुकी है। यहाँ गन्ने की मिठास अब ज़हर के मानिन्द फैलती जा रही हैं। दंगे या अब जो हो रहा है वह सरकार की निष्क्रियता के कारण ही है। लेकिन सरकार तो सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी में ही व्यस्त रही है। और अब यहाँ मुख्यतः हिन्दू बनाम मुस्लिम की बेल्ट बनकर तैयार हो गयी है। और इसे बनाने में राजनीतिक दलों की भूमिका को कौन नहीं मानता ? महज़ कुछ वोटों के लिए उनके घर उजड़वाये गए। उनके अपनों को तराजू में मौत के बराबर तौला गया। और न ज़ाने कितने कुकर्म इस फेहरिस्त का मान बढ़ाते हैं। पीड़ित पक्ष सिर्फ अलपसंख्यक समुदाय नहीं रहा। बल्कि बहुसंखयक समुदाय में हाशिये पर पड़ा हुआ एक समाज भी इस पीड़ा का भोगी रहा। जिसे अतीत या वर्तमान में नीच जात या अछूत जैसी संज्ञा से जाना जाता हैं। लेकिन पूरे दंगे के दौरान और अब तत्काल बाद तक सिर्फ मज़लूमियत का कुभार ढोने वाले ही मौत का शिकार हुए। दंगे कराने वाले ही अपने अपने समुदाय विशेष का चोला ओढ़कर मदद का दिखावा कर रहे हैं। और इस पर गहन पड़ताल की गुंजाईश हैं कि अब तक जो हुआ वह सिर्फ सियासी ध्रुवीकरण के कारण हुआ। कुछ लोग कह रहे हैं कि दंगों के तत्काल बाद की जो स्थिति बनी जिसमें कई बच्चे मौत से लड़े और हार गए या कैम्पों में बलात्कार की घटना यह सब तो होना ही था। लेकिन यह बात अर्थहीन हो जाती है अगर सरकार सियासी नफे- नुकसान को एकतरफा रखकर साफगोई से पीड़ितो की मदद की चाह रखती तो ऐसा न होता। इस होनी को अनहोनी में बदला जा सकता था। सभी ने सिर्फ वोटों की नदी में सियासी रंग घोला। जिसका परिणाम यह दंगा हुआ।
राज्य के युवा मुख्यमंत्री और एक समुदाय के रहनुमा कहे जाने वाले भी उसी समुदाय की दुर्दशा के पीछे लगे हैं। सोचने वाली बात हैं कि अगर मीडिया की खबरों को संज्ञान में लेते हुए सर्वोच्च न्यायलय राज्य सरकार को निर्देश न देती। तो क्या होता ? ऐसे ही अगर मानवाधिकार संगठन या एनजीओ मदद के श्रेणी में आगे न खड़े होते। तो भी क्या होता ? मेरी माने तो आप एक भयावह दंगा होते देखते। बाबा टिकैत और चौधरी चरण सिंह की भूमि में अब दोनों समुदाय आपसी विश्वास खो चुके हैं। इन शिविरो में आने की हिम्मत राज्य के किसी भी सियासतदान या मंत्रियों ने नहीं की। सिर्फ लखनउ या दिल्ली से चले कुछ आदेश भी यहाँ आकर धराशाई हो जाते हैं। सरकार द्वारा घोषित मुआवजा कुछ अपात्रों की वजह से पीड़ितो को भी नहीं मिला। कई बार इन शिविरो में गया हूँ। उनके दुःख दर्द का हिस्सा बना हूँ। वे लोग अब अपने गाँव में नहीं जाना चाहते। वे चाहते हैं कि सरकार उन्हें शरणार्थी कैम्पों में ही जगह आवंटित करें। ताकि वे फिर से खुशहाल ज़िन्दगी का हिस्सा बनें और अपनी गुजर बसर का सिलसिला फिर से चलायें।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर यूपी सरकार ने शिविरो में स्वास्थ्य व्यवस्था का हाल जानने के लिए स्वास्थ्य महानिदेशक ( परिवार कल्याण ) को इन कैम्पों में भेजा। उल जुलूली तो सरकारी अफसर की सरकारी ज़िन्दगी का हिस्सा है, जिसका फलसफा वहाँ भी दिखा। बकौल स्वास्थ्य महा
निदेशक साहब जब तक कब्र में से मरे हुए बच्चों के कंकाल न निकले जाएँ, तब तक हम या सरकार कैसे मान ले कि कोई मृत्यु हुई है। बस इतना कहना था कि पीड़ितों का पारा सौ के पार हो गया। जिसे भाँपकर वे सभी प्रसाशनिक अधिकारी वहाँ से भाग निकले। क्या वास्तव में सरकार उन्हें तब ही मरा मानेगी जब तक उनके कंकालों की पुष्टि न हो जाये। क्या यह उनके जले पर नमक छिड़कने का काम नहीं ? यह एक गम्भीर मामला हैं जो वास्तविकता कि दरकार करता है। इन सभी बातो में एक यक्ष प्रश्न मुह बाँये खड़ा है कि तो फिर आगे क्या ?
इसका जवाब न तो प्रशासन, न सरकार और न किसी भी राजनीतिक दल के पास होगा। अगर सरकार या प्रशासन अपनी कर्तव्यनिष्ठा दिखाता तो इस सवाल का जवाब बेझिझक बता दिया जाता। यह सब लिखते हुए एक खबर ने मुझे और झकझोर कर रख दिया कि दंगों के बाद हुई साइलेंट वार का शिकार हुआ वह रिक्शावाला भी मौत से लड़ाई न जीत पाया। कितना दुखद हैं यह सब। क्या वास्तव में यह उस धरती पर हो रहा हैं जहाँ सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ाया जाता है।
संदीप शिवम, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।