लखनऊ। आज रिहाई मंच ने मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों व राहत शिविरों की दशा उत्तर प्रदेश सरकार के दावों को खारिज करती एक रिपोर्ट जारी की। पूरी रिपोर्ट निम्न प्रकार है-
मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत व आस पास के जिलों के
सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों की मुआवजे की दावेदारी
समाप्त करने का उत्तर प्रदेश सरकार का कुत्सित प्रयास-
मुजफ्फरनगर नगर जनपद के 6 और शामली जनपद के 3 ग्रामों के सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों को 5-5 लाख रुपया आर्थिक सहायता के रुप में दिए जाने की घोषणा सांप्रदायिकता नियंत्रक प्रकोष्ठ गृह विभाग राज्य सरकार उत्तर प्रदेश द्वारा दिनांक 26 अक्टूबर 2013 को जारी शासनादेश संख्या 1181 के/छः-सानिप्र-13-15(24)201, में की गई है। इसके प्रस्तर 4 के उप खण्ड 3 में यह शर्त नहीं लगाई गई है कि आर्थिक सहायता पाने वाला व्यक्ति ऐसा शपथ पत्र देगा कि वह भविष्य में अपनी कोई अन्य दावेदारी मुआवजे के संबन्ध में नहीं करेगा, परन्तु मुजफ्फरनगर और शामली के जिला प्रशासन द्वारा शपथ पत्र का जो प्रारुप तैयार किया गया है उसमें शर्त नंबर 8 जोड़ी गई है, जिसमें यह लिखा है कि एक मुश्त आर्थिक सहायता धनराशि प्राप्त करने की दशा में अपने गांव में अथवा अन्यत्र किसी अचल संपत्ति की क्षति के संबन्ध में क्षतिपूर्ति की मांग नहीं की जाएगी। शासनादेश में ऐसी कोई शर्त को शपथ पत्र में जोड़ने का कोई उल्लेख नहीं है। इस प्रकार जो शपथ पत्र इन दोनों जिलों के प्रशासन द्वारा सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों को आर्थिक सहायता के लिए लिया जा रहा है वह शासनादेश के प्रावधानों के विरुद्ध है और मनमाना है। यह सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों की मुआवजे की दावेदारी समाप्त करने का उत्तर प्रदेश सरकार का कुत्सित प्रयास है।

जिला प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा जबरन राहत शिविर खाली कराए जा रहे हैं और शिविर संचालकों को धमकाया जा रहा है। प्रश्न यह है कि उक्त शासनादेश और शपथ पत्र में यह उल्लेख नहीं है कि पांच-पांच लाख रुपया पाने वाले व्यक्ति राहत शिविर खाली कर देंगे।

प्रश्न यह है कि जिन व्यक्तियों के नाम सूची में नहीं आए हैं उनका क्या होगा और इन 9 गांवों के अतिरिक्त जिन गांवों से पलायन करके लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं उनका क्या होगा ?

तीसरा सवाल यह भी है कि शासनादेश और शपथ पत्र की धारा 5 में जो यह शर्त लिखी गई है कि 5-5 लाख रुपया आर्थिक सहायता पाने वाला व्यक्ति कभी भी किसी भी रूप में अपने गांव वापस नहीं जाएगा, यह भी मनमानी और नाजायज शर्त है जिसे सुप्रीम कोर्ट में निरस्त कराने के लिए रखा जा रहा है। यहां यह विचार करना भी आवश्यक है कि जिन गांवों में मुसलमानों की सम्पत्तियां मस्जिद, मदरसे, बड़े-बड़े कब्रिस्तान पड़े हैं उनका क्या होगा। कल उन पर कब्जा जाट समुदाय के और दूसरे दबंग लोगों द्वारा किया जाएगा।

सरकार आर्थिक सहायता देते समय, विशेषकर उन परिस्थितयों जबकि पीड़ित राज्य सरकार से अपनी क्षति के समान वास्तविक दर से मुआवजा पाने का अधिकारी है, तब क्या सरकार किसी पीड़ित नागरिक के मूलअधिकारों जो उसके जीवन, जीविका और व्यक्तिगत सम्पत्ति और उसकी धार्मिक सार्वजनिक संपत्तियों से संबन्धित हैं, पर कोई ऐसी शर्त लगा सकती है जो उसके मूलअधिकारों से उसे वंचित कर दे। पीड़ित के मूल अधिकार राज्य सरकार के मनमाने शर्तों से प्रतिबंधित नहीं किये जा सकते। इस मामले में आर्थिक सहायता 5-5 लाख रुपया देकर और पीड़ित व्यक्तियों को गांव न लौटने की शर्त लगाकर, पीड़ितों को उनके मूलअधिकार से वंचित किया जा रहा है, इस शर्त को निरस्त कराने के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय से प्रार्थना की जा रही है। राज्य सरकार को यह स्वतः स्पष्ट करना चाहिए था कि यदि कोई व्यक्ति गांव वापिस नहीं लौटना चाहता है तो यह उसकी व्यक्तिगत परिस्थितियां हैं और गांव में उसकी संपत्ति पर उसका मालिकाना अधिकार बाकी रहेगा और कभी भी वह अपने गांव वापिस आना चाहता है, तो आ सकता है। यदि सरकार यह स्पष्ट नहीं करती है तो वह व्यक्ति जिसकी संपत्ति की कीमत पांच लाख रुपए से अधिक है कैसे 5-5 लाख रुपए की राशि स्वीकार कर सकता है। यह उस व्यक्ति के साथ धोखा है और सरकार उसे अपने गांव की संपत्ति छोड़ने और कभी वहां वापस न लौटने की शर्त रख कर उस व्यक्ति को उसके मूल अधिकार से वंचित कर रही है।
उत्तर प्रदेश सरकार के दस मंत्रियों की सद्भावना समिति की रिपोर्ट की असलियत
शिवपाल यादव, मंत्री उत्तर प्रदेश सरकार और नौ अन्य मंत्रियो की सद्भावना समिति ने अपनी जांच आख्या और संस्तुतियां राज्य सरकार को प्रस्तुत की हैं, जिसमें उन्होंने दिनांक 4 अक्टूबर 2013 को आधार तिथि मानकर राहत शिविरों में रह रहे पीड़ितों की उपस्थिति का विवरण प्रस्तुत किया है, जो कि इस प्रकार है-

प्रतिक्रिया नोट- उपरोक्त तालिकाओं में जो आकड़ें दिए गए हैं वो गलत हैं। जनपद शामली में तहसील कैराना के अन्तर्गत कैराना शहर, मलकपुर और कांधला सहित कई अन्य स्थानों पर मदरसों में पीड़ित रह रहे हैं। सरकारी सहायता के अभाव में जब निजी संसाधनों की भी कमी हो गई और बरसात और ठंड का मौसम प्रारंभ हो गया तब किराए पर कमरे की व्यवस्था सामाजिक व्यक्तियों ने निजी चंदे से कराई हैं और बहुत से लोगों ने अपने खाली पड़े मकानों में पीड़ितों को आसरा अभी भी दे रखा है परन्तु इन लोगों को राशन राहत शिविर का प्रबंध करने वाली संस्थाओं द्वारा ही दिया जा रहा है। बहुत से पीड़ित परिवारों के पुरूष अपने परिवार को वहीं छोड़ कर रोजी रोटी की तलाश में दिल्ली पंजाब जैसे पड़ोसी राज्यों और उत्तर प्रदेश के अपने पड़ोसी जनपदों में चले गए हैं परन्तु अपने गांव वापस नहीं लौटे हैं।

कैराना तहसील के संपूर्ण विवरण मंत्रीगणों की रिपोर्ट में नहीं हैं। इस रिपोर्ट में पेज तीन पर लिखा है कि कुल 382 व्यक्तियों की चल सम्पत्तियों का आकलन उनकी उपस्थिति में किया गया। इस रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि कुल 104 व्यक्तियों की अचल संपत्ति का आंकलन उनकी उपस्थिति में किया गया है। इससे साबित है कि कुल 382 और 104 व्यक्ति ही ऐसे पीड़ित पाए गए जिन्होंने अपनी उपस्थिति में अपने नुकसान का आंकलन कराया। प्रश्न यह है कि अगर 23427 व्यक्ति जनपद मुजफ्फरनगर में और 1073 व्यक्ति शामली में और 1656 व्यक्ति बड़ौत में वापस अपने घर चले गए हैं तो उनकी क्षति का आंकलन उनकी उपस्थिति में क्यों नहीं हुआ। जो व्यक्ति स्वयं उपस्थित होकर अपनी क्षति का आंकलन नहीं करा रहा है तो यह कैसे कहा जा सकता है कि वह वापस लौट गया है। इस रिपोर्ट में यह स्वीकार किया गया है कि भय के कारण लोग अपने गांव वापस नहीं लौट रहे हैं तथा यह भी उल्लेख है कि विस्थापितों को इस बात का भय है कि यदि वे अपने गांव वापस जाएंगे तो जो मुकदमें उन्होंने लिखा रखे हैं, लोग दबाव डालकर उनसे सुलह करा लेंगे। यदि सरकार का यह दावा है कि राहत शिविरों से पीड़ित व्यक्ति अपने घर वापस लौट गए हैं तो गांवों में माननीय सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में गठित एक कमीशन भेजकर सत्यता का पता लगवाने के लिए कार्यवाही की जाए।

वर्तमान में दिनांक 15 नवंबर 2013 को तहसील कैराना जनपद शामली के राहत शिविरों की स्थिति-

तहसील शामली जनपद शामली

मदरसा शामली- 500

तहसील बुढ़ाना जनपद मुजफ्फरनगर

1- जोगिया खेड़ा ग्राम राहत शिविर लगभग 1600

2- जौला राहत शिविर लगभग 3300

3- लोई राहत शिविर लगभग 4000

4- शाहपुर 3 राहत शिविर लगभग 5000

नोट- जिला प्रशासन द्वारा राहत शिविरों से पीड़ितों को हटाने का दबाव डाला जा रहा है और मजबूरन पीड़ितों को निजी आवासों में पनाह दिलाई गई है।

5- बसी राहत शिविर लगभग 3000

नोट- अधिकतर व्यक्ति जिला प्रशासन के दबाव में राहत शिविर से हटकर गांव में निजी आवासों में पनाह ले रखे हैं।

6- ग्राम शिकारपुर राहत शिविर लगभग 1000