मीडिया क्षेत्र की प्रतिष्ठित शोध पत्रिका जन मीडिया ने इस अंक में मुजफ्फरनगर साम्प्रदायिक हिंसा और अखबारों की भूमिका पर बेहतरीन शोध पत्र प्रकाशित किया है। हम हस्तक्षेप के पाठकों को यह शोध पत्र उपलब्ध करा रहे हैं। शोध पत्र काफी लम्बा होने के चलते इसे हम किस्तों में प्रकाशित कर रहे हैं। ...
सं. ह.
मुजफ्फरनगर साम्प्रदायिक हिंसा और अखबारों की भूमिका (भाग-1)
शोधार्थी – अवनीश कुमार
बतौर पत्रकार, शब्द हमारे सबसे ताकतवर औजार हैं, इसलिये हमें इस औजार का इस्तेमाल लोगों के बीच समझदारी बढ़ाने के लिये करना चाहिए न कि भय या झूठ फैलाने के लिये।– माहीन रश्दी*(इनका परिचय)
भूमिका - आज के समय में जनसंचार के माध्यमों का बहुत महत्व है। वे बहुत असरकारी हैं और पल भर में किसी भी घटना की जानकारी लाखों, करोड़ों लोगों तक पहुँचा सकते हैं। इसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि कैसे बेंगलूरू में उत्तर पूर्व के लोगों पर हमले की आशंका फेसबुक पर फैलाई गयी थी और इसका असर ये हुआ कि हजारों की तादाद में उत्तर पूर्व के लोग अपने घरों के लिये पलायन करने लगे। इस प्रकार जनसंचार के माध्यम किसी भी मामले पर लाखों करोड़ों लोगों के विचारों को बनाने में मदद करते हैं और इस तरह कहा जा सकता है कि जनसंचार के माध्यम लोगों के विचारों को बहुत हद तक नियन्त्रित भी करते हैं।
किसी एक घटना को अलग-अलग लोगों द्वारा भिन्न-भिन्न तरीके से देखा व समझा जा सकता है। कोई किसी घटना को किस नजरिए से समझेगा या देखेगा, यह बहुत कुछ उसकी पृष्ठभूमि से निश्चित हो जाता है। यहाँ पृष्ठभूमि का तात्पर्य सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक व ऐतिहासिक से है। इसमें भी सामाजिक एवम् धार्मिक पृष्ठभूमि का ज्यादा महत्व है क्योंकि इसमें बहुत सी अन्य बातें भी शामिल होती हैं। एक आम नागरिक के लिये निजी तौर पर बनी समझ व्यक्तिगत स्तर या अधिक से अधिक एक छोटे समूह के स्तर तक सीमित रहती है। लेकिन अगर किसी घटना की एक निश्चित किस्म की समझ जनसंचार के किसी माध्यम पर सवार हो जाए तो वह बहुत से लोगों को प्रभावित करती है। यह अच्छी भी हो सकती है और चिंताजनक भी।
एक पत्रकार का काम इसीलिये बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। किसी घटना को वह जिस तरीके से देखता और समझता है, वह टेलीविजन, अखबार या न्यूज पोर्टल के मार्फत लाखों करोड़ों लोगों तक पहुँचती है। चूँकि सभी लोग उस घटना के वास्तविक अर्थों में साक्षी नहीं हो सकते अतएव पत्रकार का नजरिया ही पाठक या दर्शक का नजरिया बन जाता है। किसी भी लोकतन्त्र में जनसंचार के स्वतन्त्र माध्यमों की बहुतायत इसीलिये अच्छी समझी जाती है क्योंकि तब नागरिकों को किसी एक घटना के बहुत से नजरिए, पढ़ने या देखने को मिल जाते हैं और इस प्रकार उस घटना पर किसी को एक मुकम्मल राय कायम करने में मददगार साबित होते हैं।
त्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में साम्प्रदायिक हिंसा की शुरूआत बड़े स्तर पर 7 सितम्बर 2013 से शुरू हुयी। हालाँकि वास्तविक अर्थों में इसकी भूमिका काफी पहले से तैयार हो रही थी। हमारा अध्ययन साम्प्रदायिक दंगों में मीडिया की भूमिका पर केन्द्रित है। मीडिया में भी हमारा अध्ययन मुख्य रूप से प्रिन्ट मीडिया तक सीमित है। सितम्बर के शुरूआती दिनों में अखबारों में छप रही खबरों और उसके बाद सितम्बर के अन्तिम और अक्टूबर के शुरूआत में पुलिस की कार्रवाइयों की खबरों की कटिंग हमारे पास उपलब्ध है। इन्हीं के आधार पर हम अखबारों की भूमिका की पड़ताल करेंगे।
शोध पद्धति – इस शोध हेतु अन्तर्वस्तु विश्लेषण पद्धति का चयन किया गया है। अखबारों में दंगों से सम्बंधित छप रही खबरें इस अध्ययन का विषय हैं। इस अध्ययन हेतु हिन्दी के समाचार पत्रों में छपी खबरों को लिया गया है। जिन अखबारों की कटिंग हमारे पास उपलब्ध है वे हैं - दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, अमर उजाला, अवाम-ए-हिंद एवम् दैनिक प्रभात। हिन्दी पट्टी में दैनिक जागरण, अमर उजाला और हिंदुस्तान ही प्रमुख रूप से पढ़े जाने वाले अखबार हैं। इसके अन्तर्गत हम इन अखबारों में छपी खबरों के कई पहलुओं का अन्तर्वस्तु विश्लेषण करेंगे। इस अन्तर्वस्तु विश्लेषण की प्रमुख सन्दर्भ सामग्री के तौर पर कसौटी के लिये भारतीय प्रेस परिषद द्वारा जारी की गयी “पत्रकारों के लिये आचरण एवम् मानदंड-2010 संस्करण” को आधार बनाया गया है जो सामुदायिक संघर्षों के माहौल में रिपोर्टिंग के लिये दिशा-निर्देश की व्याख्या करता है। इस प्रकार इस अध्ययन को दंगों के दौरान मुख्य धारा की मीडिया के चरित्र प्रमुख अध्ययन कहा जा सकता है।
सीमा (Limitations)- इस अध्ययन के लिये अखबारों में छपी खबरों का चयन उपलब्धता के आधार पर किया गया है। अध्ययन के लिये उपलब्ध खबरें प्रमुख रूप से हिंसा शुरू होने के समय, यानी सितम्बर के शुरूआती दिन तथा हिंसा समाप्त होने के समय और पुलिस कार्रवाई शुरू होने के समय, यानी सितबंर के आखिरी दिन और अक्टूबर की शुरूआत, की हैं। आमतौर पर सभी कतरनों में खबर छपने की तारीख का जिक्र है पर कुछ ऐसी कतरने भी हैं जिनमें छपने की तारीख का जिक्र नहीं है। हालाँकि अन्य खबरों से तुलना करने पर यह पता लगाना मुश्किल नहीं है कि वह कतरन किस तारीख की होगी।
यद्दपि कि अध्ययन के लिये उपलब्ध खबरों की कतरनों के चुनाव में कोई नियमितता नहीं है और यह भी पता नहीं है उन अखबारों में अध्ययन के विषय से सम्बंधित और खबरें भी छपी थीं या नहीं। लेकिन फिर भी खबरों के अन्तर्वस्तु विश्लेषण के लिये पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। साथ ही अखबारों में छपी खबरें हमें पत्रकारों के नजरिए और इस तरह अखबार की भूमिका को बताने के लिये एक दृष्टि तो प्रदान करती ही हैं।
पत्रकारों के लिये आचरण एवम् मानदंड-2010 (भारतीय प्रेस परिषद)
साम्प्रदायिक दंगों/ झड़पों की रिपोर्टिंग
1) साम्प्रदायिक दंगों व धार्मिक झड़पों से सम्बंधित खबरों, विचारों या टिप्पणियों को काफी सावधानी, सतर्कता और प्रमाणित तथ्यों की पड़ताल के बाद ही प्रकाशित किया जाना चाहिए। ताकि साम्प्रदायिक सौहार्द्ध और शान्ति व्यवस्था का वातावरण तैयार किया जा सके।
समाचार पत्रों और पत्रिकाओं को सनसनीखेज, उत्तेजक और खतरनाक सुर्खियाँ लगाने से बचना चाहिए। साम्प्रदायिक हिंसा या बर्बर कृत्यों से संयमित तरीके से निपटा जाना चाहिए जिससे आम लोगों का राज्य की कानून व्यव्स्था में व्याप्त विश्वास और भरोसे को ठेस न पहुँचे। ऐसा करने से राज्य की शासन प्रणाली को कमजोर होने से बचाया जा सकता है। दंगा प्रभावित समूहों में पीड़ितों की संख्या या इससे जुड़ी घटनाओं को इस तरह लिखा जाना चाहिए जिससे तनाव कम करने औऱ शान्ति व्यव्स्था कायम करने में मदद मिले। लेखन की शैली का रुख, दो समुदायों, धर्मों या चिन्तित समूहों के बीच के रिश्ते को फिर से जोड़ने के रास्ते पर आ सके।
2) पत्रकारों और स्तम्भकारों पर देश के विभिन्न सामुदायिक समूहों के बीच साम्प्रदायिक सौहार्द और मेलजोल का भाव बढ़ाने की विशेष जिम्मेदारी होती है। उनका लेखन अपनी भावनाओं का एक मात्र प्रतिबिम्ब नहीं होता है। लेकिन बड़े पैमाने पर वे अपनी भावनाओं के जरिये सामाजिक मानस को प्रभावित करने में काफी हद तक मदद करते हैं। मतलब उनके लेखकीय चरित्र में स्वयं की भावनाएं परिलक्षित नहीं होनी चाहिए। व्यक्ति भावना से दूर रहकर ही निष्पक्ष लेखन को अंजाम दिया जा सकता है। ऐसे मामलों में पत्रकार इन अत्यन्त एहतियातों के साथ अपनी कलम का उपयोग करें और इससे ही सामाजिक कलह को नियन्त्रित किया जा सकता है।
3) साम्प्रदायिक दंगों जैसे हालातों में (जैसे कि गुजरात नरसंहार/ संकट) मीडिया की भूमिका शान्ति कायम करने वाले की होनी चाहिए, न की दंगा को उकसावा देने वाले की। ऐसे हालात में मीडिया को लोगों के बीच शान्ति और सौहार्द कायम करने में बेहतरीन भूमिका निभाने देना चाहिए। व्यवस्था और भाईचारे को प्रत्यक्ष व अप्रयत्क्ष रूप से क्षति पहुँचाने की किसी भी कोशिश को राष्ट्र विरोधी करतूत करार दिया जाना चाहिए। आजादी मिलने के शुरुआती दिनों में मीडिया ने देश में राष्ट्रीय एकता की भावना तैयार करने में बड़ी नैतिक जिम्मेदारी निभाई थी। मीडिया ने उस दौरान अपने श्रेष्ठ दायित्व के साथ सामाजिक सौहार्द का निर्माण किया था।
4) मीडिया आने वाले कल के लिये इतिहास का निर्माण करता है और इस वजह से भविष्य के प्रति यह उसकी असंदिग्ध जिम्मेदारी है कि वह आज के तथ्यों को सही और स्पष्ट तरीके से प्रस्तुत करे। तथ्यों का विश्लेषण और उस पर लोगों की राय का मामला एक बिलकुल ही एक अलग तरह की विधा का मामला है। इस तरह इन दोनो ही तरह के मामलों का निर्धारण निश्चित तौर पर अलग ही होना चाहिए। संकट के समय संयम और तर्कपूर्ण तरीके से तथ्यों को रखने पर लोकतन्त्र में कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन लेखकों को यह सुनिश्चत करना होगा कि उसका विश्लेषण न केवल पूर्वाग्रहों, व्यक्तिगत भावनाओं तथा विचारों से मुक्त हो बल्कि वह प्रमाणित और सत्यापित तथ्यों पर आधारित हो। ताकि लेखक के विश्लेषण से समाज, समुदाय, जाति और धार्मिक समूहों में द्वेष न पैदा हो।
5) यद्दपि कि साम्प्रदायिक दुर्भावना को रोकने और राष्ट्रहित तथा लोगों में सद्भाव कायम करने में मीडिया की भूमिका को कम करके नहीं आँका जाना चाहिए लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को बाधित नहीं किया जाना चाहिए। भारतीय प्रेस को इन दोनों चीजों में सन्तुलन कायम करने की जरूरत है।
शीर्षक, सनसनीखेज और उत्तेजक नहीं होना चाहिए। शीर्षक का चयन करते समय खबर में दी गयी सामग्री का ध्यान रखा जाना चाहिए।
(अंग्रेजी से अनुवाद – वरूण शैलेश)
1.सामान्य और विशेष रूप से साम्प्रदायिक विवाद या संघर्ष के सन्दर्भ में
A) शीर्षक सनसनीखेज और उत्तेजक नहीं होना चाहिए।
B) खबर के शीर्षक में उसकी सामग्री की झलक दिखनी चाहिए।
C) अगर किसी के आरोप को शीर्षक के रूप में चुने तो उसके नाम, स्रोत या जिसने यह बात कहीं उसका उल्लेख किया जाना चाहिए।
अवाम-ए-हिंद, 4 सितम्बर, मुजफ्फरनगर
शीर्षक- दो समुदायों में संघर्ष, एक मरा, तनाव जारी
खबर का पहला पैरा – ...शामली में कूड़ा फेंकने को लेकर दो समुदायों के बीच हुये संघर्ष में एक व्यक्ति की कथित रूप से गोली लगने से मौत हो गयी, जबकि कई अन्य लोग घायल हुये हैं।...

...पुलिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार बीती शाम कूड़ा फेंकने को लेकर एक सफाईकर्मी और एक व्यक्ति के बीच बहस होने लगी। जल्दी ही वहाँ कई सफाईकर्मी और दूसरे समूह के लोग इकट्ठा हो गये जो घरों और दुकानों को क्षतिग्रस्त करने के अलावा वाहनों में भी आग लगाने लगे। उन्होंने बताया कि दोनो समूहों के बीच हुयी गोलीबारी में अहसान (26) की गोली लगने से मौत हो गयी....
...नगर में भारी दंगे के बाद अहसान की मौत से शामली के अल्पसंख्यक समुदाय में भारी शोक की लहर फैल गयी....
खबर के साथ ही आगजनी और पुलिस की तस्वीरें भी लगी हैं। इसी खबर में साथ ही एक कॉलम में रंगीन बाक्स में एक खबर है जिसकी शीर्षक है – दंगा भड़काने की भगवा साजिश।
यह खबर कवाल गाँव की घटना के बाद इंटरनेट पर भड़काऊ तस्वीरें डालने के आरोप में भाजपा विधायक संगीत सोम के खिलाफ जाँच शुरू होने के बारे में बता रही है।
विश्लेषणः खबर का शीर्षक उत्तेजक है। खबर पढ़कर कोई भी स्थानीय व्यक्ति सहज ही यह अंदाजा लगा सकता है कि दो समुदाय कौन से हैं। “एक की मौत” और “तनाव जारी” आग को और हवा देते नजर आ रहे हैं। खबर का शीर्षक इस मामले में झूठा है कि शुरूआती झगड़ा महज कूड़ा फेंकने को लेकर हुआ था। दरअसल यह बात खबर पढ़कर पता चलती है कि यह दो समुदायों का झगड़ा नहीं बल्कि दो व्यक्तियों का झगड़ा था। जैसा कि आम तौर पर होता है दो लोगों के बीच के झगड़े में पहले परिवार, फिर सगे सम्बंधी और फिर पहचान वाले भी शामिल हो जाते हैं। खबर में इस बात का जिक्र प्रमुखता से है कि दूसरे समुदाय के लोगों ने आगजनी की और गोली चलाकर एक आदमी की जान ले ली। निश्चित ही मरने वाले का नाम देना ठीक नहीं था क्योंकि ऐसा करने से मरने वाले के समुदाय का बोध होगा और यह उसके समुदाय वालों के लिये गुस्से का सबब बनेगा। खबर में इस बात का खुलकर जिक्र करना कि “नगर में भारी दंगे के बाद अहसान की मौत से शामली के अल्पसंख्यक समुदाय में भारी शोक की लहर फैल गयी...” बिलकुल ही आग में घी डालने जैसा है। इस खबर में तस्वीरें देने से ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो कि कोई बहुत गम्भीर बात हो गयी हो।
इसी खबर के साथ रंगीन बॉक्स में यह खबर देना कि यह “दंगा भड़काने की भगवा साजिश” का नतीजा है, निश्चित तौर पर दूसरे पक्ष को आरोपी साबित करने और पहले पक्ष को उकसाने की कार्रवाई है।
अमर उजाला, मेरठ, 6 सितम्बर, शामली से
शीर्षक- ‘बाज आए जिला प्रशासन’
लिसाढ़ में गठवाला खाप की सर्वाजातीय पंचायत ने दी नसीहत
खबर का पहला पैरा यहाँ से शुरू होता है – ...लिसाढ़ गाँव में गठवाला खाप की सर्वजातीय पंचायत में कवाल और शामली कांड में पुलिस-प्रशासन पर एकपक्षीय कार्रवाई का आरोप लगाते हुये सात सिंतबर को नंगला मंदौड़ महापंचायत में हजारों की संख्या में पहुँचने का आह्वान किया गया।...

...पंचायत में जाट आरक्षण समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष यशपाल मलिक ने कहा कि प्रदेश भर में पुलिस प्रशासन एकपक्षीय कार्रवाई कर रहा है, जिससे लोगों में असंतोष की भावना जागृत हो रही है, आने वाले चुनाव में इसका जवाब जनता केंद्र और प्रदेश दोनो सरकारों को देगी।....

...बाबा हरिकिशन मलिक ने बताया कि 31 को नंगला पंचायत में किसी भ्रांतियों के कारण गठवाला खाप के लोग नहीं जा सके थे लेकिन सात सितम्बर को नंगला मंदौड़ में होने वाली पंचायत में गठवाला खाप के लोग बड़ी संख्या में वहाँ पहुँचेगे। इसके लिये खतौली बाईपास पर सुबह सब एकत्रित होंगे।....

लिसाढ़ की इस पंचायत में सात प्रस्ताव पारित हुये।

...साम्प्रदायिक तनावग्रस्त इलाकों में शान्ति सद्भाव बनाकर रखें।..

...गठवाला खाप का प्रतिनिधिमंडल बाबा हरिकिशन मलिक के नेतृत्व में मलिक पुरा जाएगा।...

...सात सितम्बर को नंगला मंदौड़ की पंचायत में बड़ी संख्या में जाएंगे।...

...कार्रवाई के नाम पर प्रशासन पक्षपात न करे। निष्पक्ष कार्रवाई हो।...

...कवाल में शाहनवाज की हत्या में निर्दोषों के नाम निकाले जाएं। विशाल सचिन के हत्यारोपियों की गिरफ्तारी।...

...शोरम-कवाल-शामली में प्रशासन के रवैये की भर्त्सना।...

...शामली के एसपी अब्दुल हमीद का तत्काल तबादला हो।...
...उमेश मलिक-हरेंद्र मलिका पर दर्ज केस तत्काल वापस लिये जाएं।...
विश्लेषणः खबर का शीर्षक उत्तेजक और चेतावनी भरे लहजे में है। पुलिस प्रशासन पर एकपक्षीय कार्रवाई का आरोप यह आरोप भी लगा रहा है कि दूसरे पक्ष को बढ़ावा दिया जा रहा है। पहले पैरे में “सात सिंतबंर को नंगला मंदौड़ महापंचायत में हजारों की संख्या में पहुँचने का आह्वान किया गया।.” इस खबर का जिक्र महज तथ्य नहीं है बल्कि यह समुदाय के लोगों के लिये एक सूचना, प्रचार का भी काम कर रहा है। इसका नतीजा भी आप आगे देखेंगे कि कैसे नंगला मंदौड़ की पंचायत में भारी संख्या में लोग जुटे और उसी शाम से दंगा शुरू हो गया। इसी तरह दूसरे पैरे में यह खबर कि “खतौली बाईपास पर सुबह सब एकत्रित होंगे..” भी एक ऐसी जानकारी है जो अखबार की सवारी कर घातक बन जाती है। ऐसा लग रहा है मानो रिपोर्टर रिपोर्ट लिख