मुज़फ़्फ़रनगर बाक़ी है...
मुज़फ़्फ़रनगर बाक़ी है...
डॉक्युमेंट्री फिल्म ' मुज़फ़्फ़रनगर बाक़ी है... ' का प्रदर्शन और बातचीत
लखनऊ, 15 मई। युवा फिल्मकार नकुल सिंह साहनी की चर्चित डॉक्युमेंट्री फिल्म ' मुज़फ़्फ़रनगर बाकी़ है... ' का प्रदर्शन आज प्रेस क्लब में किया गया। 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर में हुए दंगों तथा साम्प्रदायिक राजनीति की पड़ताल करती यह फिल्म देश के विभिन्न भागों में दिखाई और सराही गई है। नौजवान भारत सभा और जागरूक नागरिक मंच द्वारा आयोजित कार्यक्रम में फिल्म शो के बाद नकुल सिंह साहनी के साथ फिल्म और इसमें उठाये गये मुद्दों को लेकर सवाल-जवाब का एक लम्बा दौर भी चला।
जागरूक नागरिक मंच के सत्यम ने फिल्मकार का परिचय कराते हुए कहा कि उनकी पहली फिल्म 'इज़्ज़तनगरी की असभ्य बेटियां' खाप पंचायतों के स्त्री-विरोधी फरमानों तथा उसके प्रतिरोध पर केन्द्रित थी जिसे काफ़ी सराहा गया। उन्होंने कहा कि आज नरेन्द्र मोदी की जीत का एक वर्ष पूरा होने पर इस फिल्म का प्रदर्शन और भी प्रासंगिक है। भाजपा को मिले भारी बहुमत के पीछे जिस साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की बड़ी भूमिका थी मुज़फ़्फ़रनगर उसकी एक अहम प्रयोगशाला थी।
फिल्मकार नकुल ने फिल्म का संक्षिप्त परिचय देते हुए कहा कि मुज़फ़्फ़रनगर में जो हुआ उसे दंगा नहीं बल्कि मुसलमानों का क़त्लेआम कहना ज़्यादा सही होगा। गुजरात की तरह इस इलाक़े को भी हिन्दुत्ववादी राजनीति की प्रयोगशाला बनाया गया। दंगों के दौरान और उसके बाद भी राज्य की सपा सरकार की भूमिका गम्भीर सवालों के घेरे में है। पिछले दो वर्ष की घटनाओं के कारण वहां हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच के पारम्परिक सम्बन्ध टूट चुके हैं और संदेह तथा नफरत का बोलबाला है। इलाक़े में एक ताक़त रही भारतीय किसान यूनियन ध्वस्त हो चुकी है और किसानों की एकता टूटने का सबसे बड़ा फायदा मिल-मालिकों को हुआ है। चिन्ता की बात यह है कि आने वाले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर वहां फिर से साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशें तेज़ हो गई हैं।
सितम्बर 2013 में, मुज़फ़्फ़रनगर और शामली ज़िलों में हुए दंगों में 100 से ज़्यादा लोग मारे गये थे और क़रीब 80,000 लोग अपने घरों-गाँवों से उजड़ गये थे। फिल्म उस दौर की अनेक भयानक छवियों से गुज़रती हुई सवाल उठाती है कि इन दो ज़िलों में मुसलमान और हिन्दू सौहार्द और मेलजोल के माहौल में रहते आये थे, फिर इस बार ऐसा क्या हुआ कि पड़ोसी ही जानी दुश्मन बन गये? 'मुज़फ़्फ़रनगर बाक़ी है...' हिंसा में शामिल और उससे प्रभावित रहे इलाक़े के अनेक सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक पहलुओं को समेटती है।
फिल्म साम्प्रदायिक हिंसा से जुड़े अनेक पहलुओं से गुज़रती है - स्त्रियों की 'इज़्ज़त' का सवाल जिसे लोगों को उकसाने का सबसे बड़ा मुद्दा बनाया गया, विभिन्न हिन्दुत्ववादी संगठनों द्वारा साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति, जातीय पहचान की राजनीति को हिन्दुत्व के दायरे में समेटना और इस इलाक़े में ताक़तवर रही भारतीय किसान यूनियन का ध्वस्त होना, जिसका अस्तित्व हिन्दू और मुसलमान किसानों की एकता पर ही टिका था। फ़िल्म इन ज़िलों में दलित राजनीति के विभिन्न पहलुओं और दंगों के समय उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी की सन्दिग्ध भूमिका की भी पड़ताल करती है। 2014 के संसदीय चुनाव के दौरान इन सभी पहलुओं के असर की भी फिल्म पड़ताल करती है। इसके साथ ही फ़िल्म कॉरपोरेट-साम्प्रदायिक गठजोड़ के ख़िलाफ़ मुज़फ़्फ़रनगर और शामली ज़िलों में लगातार जारी प्रतिरोध की कहानी भी बयान करती है।
करीब सवा दो घण्टे की फिल्म के प्रदर्शन के बाद फिल्म पर बातचीत का लम्बा दौर चला। लेखक रवीन्द्र वर्मा, के.के. वत्स, नाटककार राजेश कुमार, एडवा की ताहिरा हसन, रिहाई मंच के राजीव और अनिल यादव, पत्रकार गुलाम जीलानी और रवि उपाध्याय आदि के सवालों और सुझावों का विस्तार से जवाब देते हुए नकुल ने कहा कि भारतीय किसान यूनियन पहले से ही बड़े किसानों के हितों की राजनीति करती थी और स्त्रियों, दलितों आदि के सवालों पर उसमें जैसी प्रतिक्रियावादी सोच व संस्कृति हावी थी उसके चलते साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के इस हमले के आगे उसका टिक पाना मुश्किल था। फिल्म बनाने के दौरान हिन्दुत्ववादी संगठनों की साज़िशों और प्रशासन तथा कई मामलों में राज्य सरकार के साथ उनकी साँठगाँठ के बहुत से तथ्य और सुराग हमें मिले लेकिन हम महज़ दंगों की साज़िश का पर्दाफ़ाश नहीं करना चाहते थे बल्कि दंगों के कारण वहाँ समाज में आये बदलावों के विभिन्न पहलुओं को दिखाना चाहते थे इसलिए बहुत सी बातें हमें छोड़नी पड़ीं। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि मुज़फ़्फ़रनगर और शामली में संसदीय वाम पहले ही अप्रासंगिक हो चुका है और इस पूरे दौर में प्रतिरोध की उसकी कोई भूमिका नहीं रही। नकुल ने कहा कि यह फिल्म बनाने के दौरान हमारी यह समझ और साफ़ हुई है कि जातीय उत्पीड़न, पितृसत्ता और पूँजीवादी लूट के ख़िलाफ़ व्यापक आन्दोलन से जुड़कर ही साम्प्रदायिक फासीवाद से मज़बूत लड़ाई लड़ी जा सकती है।
बातचीत का सिलसिला इसके बाद भी अनौपचारिक तौर पर काफी देर तक चलता रहा। कार्यक्रम में कवि नरेश सक्सेना, शकील सिद्दीकी, कात्यायनी, शीला रोहेकर, निवेदिता, अल्पना वाजपेयी, प्रताप दीक्षित, पत्रकार सुभाष राय, संजय श्रीवास्तव, रामबाबू, रिहाई मंच के मोहम्मद शोएब, हरेराम मिश्र, तहरीके निस्वां की रफ़त फ़ातिमा, असग़र मेहदी, प्रो. ए.जे. अंसारी,सी.एल. गुप्ता आदि सहित बड़ी संख्या में लेखक, संस्कृतिकर्मी, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और छात्र-छात्राएं उपस्थित थे। कार्यक्रम के आरंभ में 'प्रत्यूष' की गायन टोली ने साहिर का गीत 'ये किसका लहू है कौन मरा...' प्रस्तुत किया।


