क्या सच में नरेन्द्र मोदी से डरे हुए हैं मुसलमान
संजय शर्मा
इमराम इदरीस युवा हैं, पेशे से डॉक्टर हैं। मोदी सरकार बनने के बाद उन्होंने फेसबुक पर लिखा मुसलमान अल्लाह के अलावा किसी से नहीं डरता। इससे मिलती जुलती बातें अलग-अलग कोने से लगातार सुनाई पड़ती रहीं। इन बातों की गहराई में जायें तो लगता है एक बेचैनी है इस देश के मुसलमानों में। वे सकते में हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि अब उनके साथ क्या होने वाला है। भले ही तरक्की पसंद मुसलमान टीवी चैनल पर आकर यह भरोसा दिलाने की कोशिश करें कि सब ठीक रहेगा मगर इस देश का आम मुसलमान सही मायनों में खौफजदा है कि पता नहीं इस मुल्क में अब उसका भविष्य क्या होने वाला है।

आम मुसलमान का यह डर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पहली बार अपने ऊपर लगे दाग को धोने का मौका भी दे सकता है कि वह अल्पसंख्यक विरोधी हैं। हकीकत यह है कि आजादी के बाद पहली बार यह देश वैचारिक स्तर पर इतने भयंकर द्वंद के साथ खड़ा हुआ है। मुल्क में रहने वाले बीस फीसदी आबादी अपने भविष्य को लेकर सशंकित भी है और आतंकित भी। वह अपनी पीड़ा किससे कहे, यह भी उसे समझ नहीं आ रहा। नरेन्द्र मोदी इतने बड़े व्यक्तित्व और इतनी बड़ी ताकत के साथ उनके सामने आये हैं कि वह हतप्रभ हैं। उसे इस बात का सपने में भी अंदाजा नहीं था।

दरअसल गुजरात दंगों ने नरेन्द्र मोदी की छवि मुस्लिमों के बीच खलनायक जैसी बना दी है। खुद नरेन्द्र मोदी ने भी अपनी इस छवि को तोड़ने के कोई ज्यादा प्रयास नहीं किए। उग्र हिन्दुत्व की विचारधारा के लोग नरेन्द्र मोदी के इसी रूप को पसंद करते हैं। नरेन्द्र मोदी की रणनीति उस हिन्दू समुदाय के वोटों को अपनी ओर आकर्षित करने की थी जो तटस्थ रहते हैं। उनके सामने विकास का लंबा चैड़ा मॉडल रखा गया। मोदी इसमें कामयाब हुए और भारी बहुमत के साथ उन्हें देश की बागडोर मिल गयी।

देश के आम मुसलमानों को सपने में भी इस बात का अंदाजा नहीं था मगर राजनीतिक बदलाव ने उन्हें भारी शंका में डाल दिया। नरेन्द्र मोदी की गुजरात दंगे की छवि और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से उनके जुड़ाव से आम मुसलमान भयाक्रांत है। इस भय से निपटने का कोई रास्ता भी उसे नजर नहीं आ रहा। मगर इसके उलट एक और तस्वीर भी बनने की उम्मीद कुछ लोगों को जगी है। लखनऊ के अमीनाबाद में चाय की दुकान चला रहे राशिद का कहना है कि अगर उन्हें हुकूमत अच्छी तरह से चलानी है तो वह मुसलमानों की हिफाजत करेंगे। अध्यापन के पेशे से जुड़े हसन जैदी का कहना है कि यह मोदी के लिए भी एक मौका है कि जब वह खुद को अटल बिहारी वाजपेई जैसा सेक्युलर नेता साबित कर सकते हैं। आखिर बाकी दलों ने भी मुसलमानों को एक वोट बैंक के अलावा और समझा भी क्या है।

समाचार प्लस के यूपी हेड आलोक पाण्डेय का मानना है कि मुसलमान मोदी से नहीं डरते। उनके डरने की बात बेवजह कुछ लोगों ने फैलाई है। उनका कहना है कि गुजरात में मुसलमान सार्वजनिक रूप से मोदी को वोट देते हैं। गरीब मुसलमान अपने काम में तरक्की चाहता है इसलिए वह किसी से नहीं डरता है। सोशल साइट पर कुछ मुसलमान जरूर डरते दिख जाते हैं। देश के जाने माने शायर मुनव्वर राना का कहना है कि डर आदमी का नहीं होता सिस्टम का होता है। गुजरात दंगों पर उन्होंने कभी माफी नहीं मांगी। जिस सिस्टम ने निर्दोषों को घर से उठा कर एनकाउण्टर के नाम पर मार दिया जाता हो, वहां मुस्लिमों में डर तो वाजिब ही है। किसी भी मुसलमान को आतंकी कह कर बंद कर दिया जाता है और कई साल बीत जाने पर वह अदालत से छूट जाता है मगर उसके और उसके परिवार के दामन पर जो दाग लग जाता है वह कभी नहीं छूटता। मगर इन सब हालातों के बीच मुसलमानों को यहीं रहना है। अच्छा हो कि मोदी ईमानदार बादशाह साबित हों। वह एक शेर के माध्यम से अपनी कहते भी हैं कि मुजाहिदीन से अच्छे तो परिंदे हैं शिकार होते हैं लेकिन कहीं नहीं जाते। मुनव्वर राना का कहना है कि अगर देश का नसीब अच्छा होगा तो मोदी अच्छा काम कर के जायेंगे।

भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता चंद्रमोहन इस बात को निराधार बताते हैं कि मुसलमान भाजपा से डरते हैं। मुसलमानों ने बड़ी संख्या में मोदी जी को वोट दिया है क्योंकि वह जानते हैं कि मोदी जी की सरकार में सबका विकास होगा। उनका कहना है कि राजस्थान में यूनुस खान को पीडब्लूडी का मंत्री बनाया गया है और बेहतर काम कर रहे हैं। मोदी जी ने कहा है कि वह 125 करोड़ देशवासियों के नेता हैं। भाजपा सबका साथ और सबका विश्वास लेकर चलने वाली पार्टी है।

एनडी टीवी के स्थानीय संपादक और देश के जाने-माने पत्रकार कमाल खान मानते हैं कि मोदी को लेकर मुस्लिम आशंकित रहते हैं। 2002 के दंगों में भले ही मोदी जी बेकसूर साबित हो जायें मगर आम मुस्लिम के मन में यह बात तो है ही कि इन दंगों में कहीं न कहीं राज्य और राज्य सरकार को चलाने वाले लोग शामिल रहे हैं। उनका कहना है कि वह खाना खाने होटल गये तो वहां का वेटर और बाल कटवाने गये तो वहां का हज्जाम कह रहा था कि इंशाअल्लाह हम ठीक तो रहेंगे, आखिर यह डर ही तो है। क्योंकि यह लाइन वह वाजपेयी या मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने पर कभी नहीं बोला। उनका कहना है कि जिस तरह 1984 के दंगों को सिख नहीं भुला पाते इसी तरह 2002 के दंगों को मुसलमान नहीं भुला पाते।

कमाल खान का कहना है कि आम मुस्लिमों को लगता है कि दिल्ली की हुकूमत में जो आदमी बैठा है वह हमारी कौम का दोस्त नहीं है, उसे हर हालत में अपना सम्मान चाहिए। जिस तरह मायावती ने दलितों को जमीन नहीं दी मगर आसमान दे दिया। आम मुसलमानों को भी लगता है कि मजहब के नाम पर उसके साथ भेद-भाव न हो। उनका कहना है कि मोदी जी के ऊपर बड़ी जिम्मेदारी है कि वह खुद को वाजपेयी की तरह सेक्युलर नेता साबित करें और मुस्लिमों में विश्वास पैदा करें।

इण्डिया न्यूज यूपी के हेड विपिन चौबे का मानना है कि यह दुष्प्रचार है कि मुसलमानों को मोदी का डर है। चुनाव से पहले कुछ दलों ने मोदी पर इसी तरह के आरोप लगाये। मगर जनता अब जागरुक हो चुकी है। विकास सबसे बड़ा मुद्दा है अब मुस्लिम भी हकीकत समझने लगे हैं। यह सम्भव नहीं है कि मोदी देश को बेहतर बनाने के लिए मुस्लिमों की उपेक्षा करें।

हालात कुछ भी हों मगर हकीकत यह है कि देश का मुस्लिम सांस रोके अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अगले कदम की प्रतीक्षा कर रहा है जिस पर उसका भविष्य टिका है।

संजय शर्मा, लेखक वीक एंड टाइम्स के सम्पादक हैं