मुद्दा विचारधारा विरोध है
जनसत्ता के शगल आवाजाही और जनतान्त्रिकता के बीच प्रख्यात आलोचक वीरेन्द्र यादव जी ने अपना प्रतिवाद जनसत्ता को भेजा था जिसे बहुत होशियारी के साथ सम्पादक महोदय ने काट-छाँटकर पत्र स्तम्भ में प्रकाशित किया। यहाँ हम वीरेन्द्र जी का मूल लेख (वर्तनी में हमारे कुछ संशोधन) उनकी छोटी सी टिप्पणी के साथ दे रहे हैं। बता दें यह टिप्पणी कुल 1155 शब्दों की थी यानी थानवी जी के मानक 1250 से 95 शब्द कम।
पहले वीरेन्द्र जी की संक्षिप्त टिप्पणी फिर जनसत्ता को भेजा गया प्रतिवाद
जनसता में मेरे द्वारा भेजे गये प्रतिवाद को काट छाँटकर दस जून ओम थानवी ने इस पत्र के रूप में छापा है ताकि उनका झूठ पूरी तरह न उजागर हो सके। स्वयम् तो उन्होंने आधे पेज का इस्तेमाल विवाद को मनमाना मोड़ देने के लिये किया, लेकिन सिर्फ 1100 शब्दों का प्रतिवाद छापने की नैतिकता का भी निर्वाह वे न कर सके। यह है उनके सम्पादकीय जनतन्त्र की असलियत। क्या कह सकते हैं?

वीरेन्द्र यादव

यह वास्तव में दिलचस्प है कि जब न सोवियत संघ रहा और न शीतयुद्ध की बहसें तब 'साहित्य में फिर सीआईए' की गढ़ंत की जा रही है। जाहिर है इस गढ़ंत में तथ्यों और तर्कों का क्या औचित्य ! वामपंथ विरोध के इस 'महायज्ञ' में मेरी आहुति देते हुये ओम थानवी जी ने स्वयम् को मिले एक पुरस्कार का उल्लेख करते हुये लिखा है कि ,"..कुछ कट्टर मार्क्सवादियों को मेरा चयन खल गया। इनमें एक वीरेन्द्र यादव कार्यक्रम में तो नहीं बोले, पर घर लौटकर फेसबुक पर शमशेर सम्मान के संस्थापक प्रतापराव कदम को उन्होंने इस तरह कोसा "..क्या कोई साझा मंच साम्प्रदायिकों और सीआईए के समर्थकों का भी बनाना चाहिये ?" अब इस 'सादगी' पर कौन न मर जाय या खुदा !

सच यह है कि 12 मई को लखनऊ में आयोजित शमशेर सम्मान के इस आयोजन की स्वागत समिति का मैं सदस्य था, निमन्त्रण पत्र पर मेरा नाम घोषित वक्ताओं की सूची में था। आयोजन में मैं थानवी जी के साथ मंच पर था। मुझे कवि नरेश सक्सेना के बारे में वक्तव्य देना था उन्हें भी इस सम्मान से सम्मानित किया गया था। नरेश सक्सेना पर बोलने के पूर्व अपने वक्तव्य में मैंने मंच से सार्वजानिक रूप से ओम थानवी को सम्मान हेतु बधाई दी। समारोह के पहले भी मेरी उनसे अन्य लेखक मित्रों के साथ मुलाकात हुयी और मंच पर भी अन्य लोगों के साथ बैठे हम दोनों के बीच सहज संवाद हुआ। लेकिन इस सब पर उन्होंने धूल डालकर यह कह दिया कि मैं वहाँ तो चुप रहा लेकिन 'घर लौटकर' सम्मान के संस्थापक को कोसा। अब घर तो मैं उसी दिन लौटा था लेकिन प्रताप राव कदम से ओम थानवी को सम्मान दिये जाने के बाबत उस दिन से लेकर आज तक न तो फेसबुक पर कोई चर्चा हुयी और न ही फोन पर। ओम थानवी जी ने जिस आधे वाक्य को मेरे द्वारा स्वयम् को 'कोसने' के लिये उद्धृत किया है वह समारोह के 13 दिन बाद 25 मार्च की फेसबुक की उस बहस का हिस्सा है जिसका प्रसंग मनसे के पदाधिकारी की संस्था में अशोक वाजपेयी के काव्यपाठ से सम्बद्ध है।

हुआ यह कि जब कुछ लोगों द्वारा साम्प्रदायिक लोगों के मंच से अशोक वाजपेयी के काव्यपाठ को प्रश्नांकित किया गया तो प्रताप राव कदम ने साझा मंच पर 'अपनी बात' कहने की दलील दी थी। इस पर मेरी टिप्पणी थी कि, ".साझा मंचों पर अक्सर शालीनता की दरकार होती है जैसा की आपके मंच पर लखनऊ में मैंने स्वयम् महसूस किया था। जरा सोचिये कि जब आप अपने मंच पर ओम थानवी का सम्मान कर रहे थे और जब वे मंच से अपने पिता जी का हवाला देकर स्वयम्

को वाम मित्र बता रहे थे और जब हमारे मित्र रमेश दीक्षित थानवी जी की जनतान्त्रिकता की पताका लहरा रहे थे, तब यदि मैं उसी मंच का सहभागी होने के कारण 'अपनी बात' कहते हुये उनकी जनतान्त्रिकता की धज्जियाँ उड़ा देता, तो क्या होता आपके कार्यक्रम का ? मैं यह कर सकता था क्योंकि वे वहाँ सोशल मीडिया पर अपनी आलोचना की चर्चा कर रहे थे और उसके पहले ही अज्ञेय पर बहस के चलते मुझे ब्लॉक कर चुके थे। इसलिये यह स्वीकार करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिये कि साझा मंचों की अपनी सीमायें हैं। फिर क्या कोई साझा मंच साम्प्रदयिकों और सीआईए के समर्थकों से भी बनाना चाहिये ?"

यहाँ ओम थानवी की चर्चा उनके उन 'जनतान्त्रिक ' दावों को लेकर थी जो उन्होंने उस आयोजन में किये थे, वह भी इस कारण कि इसके पूर्व अज्ञेय पर हुयी बहस के कारण वे मुझे फेसबुक पर ब्लॉक कर चुके थे। यहाँ साम्प्रदायिक से तात्पर्य मनसे के कार्यकर्ता से था और ओम थानवी का सम्मान प्रसंग इस बहस में कहीं भी लक्षित नहीं था लेकिन उन्होंने यह गढ़ंत पेश कर दी, जैसे कि मेरी यह टिप्पणी उनके इस पुरस्कार के चयन से सम्बद्ध थी। इसके साथ उन्होंने यह अनैतिकता भी बरती कि जिसे वे फेसबुक पर ब्लॉक कर चुके थे उसकी फेसबुक टिप्पणी को अपने लेख में प्रसंग से काटकर पेश कर रहे थे।

दरअसल जब सब कुछ काले उजले में बाँटकर देखा जाता है तब ऐसा ही होता है। आखिर 'कट्टर मार्क्सवाद' और 'जनतांत्रिक आवाजाही' के एक साथ सम्भव होने की कल्पना भी कैसे की जा सकती है ! मार्क्सवादी यदि किसी कार्यक्रम में न जायें तो यह उनकी संकीर्ण गोलबन्दी और यदि जायें तो उसके मनमाना भाष्य, शायद यही अब जनतान्त्रिकता का तकाजा शेष है। खैर,यह तो अपनी अपनी जनतान्त्रिकता है, इसका क्या गिला ! वैसे इस समूची बहस में यह शिकायत सही है कि कवि कमलेश का वह बहुचर्चित वाक्य ठीक से उद्धृत नहीं किया गया क्योंकि ऋणी सिर्फ सीआईए का ही नहीं बल्कि अमेरिका के भी होने की बात कही गयी थी। पूरा वाक्य इस प्रकार था,"...शीतयुद्ध के दौरान इस सत्य का सहधर्मी साहित्य धीरे धीरे उपलब्ध होने लगा। यह सब शीतयुद्ध के दौरान अपने कारणों से अमरीका और सीआईए ने उपलब्ध कराया, इसके लिये मानव जाति अमरीका और सीआईए की ऋणी है।"

यह स्वीकार करना होगा कि मार्क्सवादी हों या मार्क्सवाद विरोधी हिन्दी में अब पढ़ने -पढ़ाने की परम्परा क्षीण से क्षीणतर होती जा रही है। वरना बहस इस बात पर भी होनी चाहिये थी कि जिन कमलेश ने मानव जाति को अमरीका और सीआईए का ऋणी होने की बात कही है उन्होंने ही यह भी क्यों कहा कि हिटलर के दार्शनिक गुरू हाइडेगर नाजीवादी पार्टी के सदस्य तो थे लेकिन ' ...वैचारिक स्तर पर उनका चिन्तन नात्सी विचारधारा से अलग ही नहीं था, बल्कि उसका गम्भीर प्रत्याख्यान भी था।'

यह सचमुच दिलचस्प है कि जिन दिनों हाइडेगर के नाजी सम्बंधों को लेकर सायेमन हेफर की 'हिटलर'र्ज सुपरमैन' और इमनेल फाई की पुस्तक 'हाइडेगर -दि इंट्रोडक्सन आफ नाजिज्म इन्टू फिलासफी' सरीखी पुस्तकें समूचे विश्व के बुद्धिजीवियों के बीच गम्भीर चर्चा के केन्द्र में हों तब हिन्दी का एक विचारक बुद्धिजीवी कवि हाइडेगर की औचित्यसिद्धि कर रहा हो। यह महज संयोग नहीं है कि उनके ये विचार भी 'समास 'पत्रिका के ही अंक छह में प्रकाशित हैं। ध्यान देने की बात है कि 'समास' के प्रकाशक रजा फाऊण्डेशन के न्यासी अशोक वाजपेयी हैं और उसके सम्पादक उदयन वाजपेयी हैं। अशोक वाजपेयी ने यह याद दिलाकर कि वे 'विचारधारा विरोधी' हैं इस समूची बहस को सार्थकता प्रदान कर दी है। कमलेश जी को भी लगता है कि अमरीका और सीआईए द्वारा इतना साहित्य उपलब्ध होने के बाद भी यदि 'लोग कम्युनिस्ट हो सकते हैं तो यह भारतवर्ष में फैले हुये अज्ञान के घोर अँधेरे में ही सम्भव है'।

ओम थानवी जी भी भोपाल के वनमाली समरोह में यह कह ही चुके हैं कि 'साहित्य को विचारधारा से मुक्त रखना होगा'। अतः मसला 'विचारधारा बनाम विचारधारा विरोध' का विचारधारा द्वारा फैलाये गये 'घोर अँधेरे' को मिटाने का है। विचारधारा के विरोधी अपनी मुहिम में एकजुट हैं लेकिन जो विचारधारा के पक्षधर हैं वे साम्प्रदायिकता विरोध की चोर गली से अभी भी 'आवाजाही' के नाम पर कुछ भ्रम बनाये हुये हैं। जरूरत है आत्मावलोकन की, क्योंकि बकौल धूमिल यह कब तक सम्भव है कि "मुठ्ठी भी तनी रहे और काँख भी ढकी रहे!"