1857 की पहली लड़ाई ने अंग्रेजों को चौंका दिया था। यदि बहादुर शाह ज़फ़र बुड्ढा न होता और लखनऊ में बेगम हजरत महल को दूसरे नबावों और राजाओं से अपेक्षित सहयोग मिल गया होता (जो कि उसे महिला और वाजिद अली शाह की तलाकशुदा पत्नी होने की वजह से नहीं मिला ) तो इतिहास के पन्नों में और ही कुछ लिखा जाता। अंग्रेज समझ गए थे, फूट डालो और राज करो (divide & rule ) की नीति पर काम किया। उन्हें सफलता भी मिली पहले हिंदुओं और मुसलमानों के बीच दरार डाली फिर दलितों और गैर दलितों के बीच खाई खोदने का प्रयास किया। किंतु गांधी ने अपनी जान की बाजी लगाकर पूना पैक्ट पर अम्बेडकर को हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर कर दिया।

यह घटना 1932 की है। 1947 तक आते-आते शायद गांधी थक गए थे, इसलिए विभाजन रोक नहीं सके।
गांधी व्यक्ति नहीं एक विचारधारा थे, एक अद्भुत विचारधारा।
विभाजन क्यों हुआ, सबको पता है इसलिए इस पर कुछ और कह कर और समय जाया नहीं करूँगा, किंतु इतना अवश्य याद दिलाना चाहूंगा, कि विभाजन के तुरंत बाद जिन्ना ने स्वीकार किया था, कि बंटबारा उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल थी। 30 जनवरी 1948 को गांधी ही नहीं, उनके साथ उनकी विचारधारा ही मर गई। मानव के विकास के इतिहास में पहली बार ऐसा घटा था। अंग्रेजों ने जो बोया उसे हमने तफ्सील के साथ काटा। तब उन पर हमारा जोर नहीं था, किंतु हमने क्यों नहीं सबक लिया ? मेरा तो बस इतना कहना है कि यदि मुरगन आदि को माफी मिल सकती थी तो याकूब मेमन को क्यों नहीं। लेकिन तब भावनाएं कैसे भड़कतीं, वोटों की फसल कैसे लहलहातीं ?

प्रिये !

तुम करो या न करो यकीं

मगर ये सच है

इस मजहब ने हमारे दरम्यां

सुकून छीने हैं।
यह आवाज याकूब मेमन की पत्नी की हो सकती है या पश्चिम उ.प्र. अथवा हरियाणा के ऐसे प्रेमी युगल की हो सकती है जिन्हें जिन्दा जला दिया गया। आखिर ये आवाजें हमें क्यों नहीं सुनाई देतीं?

30 जनवरी 1948 एक महत्वपूर्ण तिथि है। आज से पांच सौ साल बाद जब भारत का इतिहास लिखा जाएगा, तब हमारी सभ्यता को विभाजित करने वाली यही तिथि होगी। विभाजन के पश्चात जो खून खराबा हुआ उससे लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं। गांधी की हत्या के पश्चात मुस्लिमों ने अपना एक पैरोकार खो दिया। तब उन्होंने यह भी महसूस किया होगा कि अच्छा होता कि वे पाकिस्तान चले जाते। गांधी के बाद किसी भी भारतीय नेता का कद इतना बड़ा नहीं था, जो दोनो समुदायों को एकजुटता के साथ आगे बढ़ने को प्रेरित कर सकता। अचानक पैदा हुई इन परिस्थितियों ने RSS और VHP जैसी मजहबी नफरत फैलाने वाली संस्थाओं के लिए स्थिति माकूल बना दी। जो संस्थायें स्वतंत्रता आन्दोलन के समय राजाओं जमींदारों और व्यवसायियों के हितों को साधने मे लगी थीं, वे ही आज देशभक्ति का पाठ पढ़ाने लगी थी। वाह रे कृतघ्न देश इतनी जल्दी गांधी को भुला दिया!

शोषणवादी व्यवस्था के पोषक, दूसरे के श्रम पर पलने वाले जमींदारों राजाओं, कुंठित ब्राह्मणों जो गांधी के हरिजन प्रेम को पचा नहीं पाये थे और ऐसे व्यवसायी जो स्वतंत्रता आन्दोलन को व्यवसाय विरोधी मानते थे, ने मिलजुल कर एक दल का गठन किया, जिसे जनसंघ कहा गया, जो अब भाजपा के नाम से जाना जाता है। मैंने भाजपा की उत्पत्ति को विस्तार से इसलिए बताया कि भाजपा के समर्थक अपने दल की कैफियत तो जाने।

गांधी की मौत के बाद स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक बड़ी घटना का जिक्र अवश्य किया जाएगा और वह था बाबरी मस्जिद का विध्वंस। इस विध्वंस ने हमारी संवैधानिक व्यवस्था को तार तार कर दिया। धर्मनिरपेक्षता के लिए बहुत बड़ा धक्का था। निस्संदेह यह बहुत बड़ी घटना थी। हिन्दुओं को लगा कि उन्होंने बाबर से बदला ले लिया है, लेकिन ये विश्वासघात था, भारत की धर्मनिरपेक्षता पर प्रश्न चिन्ह लग गया था। देश के संविधान की रक्षा करने का दायित्व नागरिकों पर होता है, किंतु देश के बहुसंख्यकों ने अल्पसंख्यकों के विश्वास को तोड़ दिया। मुसलमानों के लिए चुभने वाली बात यह भी थी कि जिन्होंने यह कुकृत्य किया था, उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, आज भी वे देश के बड़े-बड़े संवैधानिक पदों पर विराजमान हैं। क्या ये सब देश के मुसलमानों के लिए कम कष्टकारी नहीं है? इसके बाद भी हम उम्मीद करें कि वे उफ् न करें।