संजय शर्मा
बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती के लिए समय वास्तव में मुश्किल भरा साबित हो रहा है। लोकसभा चुनाव के नतीजों ने बसपा नेत्री को परेशान कर दिया है। वह अपनी पार्टी को नये सिरे से खड़ा करने की योजना बना रही हैं। मगर अब पार्टी का सोशल इंजीनियरिंग का ताना-बाना बिखर रहा है। पार्टी का दलित वोट बैंक अब मायावती के साथ उतनी मजबूती के साथ खड़ा हुआ नजर नहीं आ रहा। दलित वोट बैंक के बिखराव ने माया के माथे पर पसीना ला दिया है। वह अब तक अपने इसी वोट बैंक के दम पर सत्ता में आने का सपना देखती थीं।
मायावती को सपने में भी अपनी इस बुरी हालत का अंदाजा नहीं था। लोकसभा चुनाव से पहले उनके सिपेहसलार उन्हें भारी जीत का भरोसा दिला रहे थे। उनके सबसे विश्वस्त सतीश मिश्र ने उन्हें आश्वासन दिया था कि हर हालत में ब्राह्मण वोट उनको जरूर मिलेगा। कुछ ऐसा ही भरोसा उनके करीबी नसीमउद्दीन सिद्दीकी ने भी दिया था। उन्होंने मायावती से कहा था कि प्रदेश में हुए सांप्रदायिक दंगों के कारण मुस्लिम समाजवादी पार्टी से बहुत नाराज हैं। कांग्रेस इस हालत में नहीं है कि वह कड़ा मुकाबला कर सके। लिहाजा मुस्लिम वोट भी इस बार बसपा को मिलना तय है। मायावती भी अपने इन दो नेताओं पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करके गच्चा खा गयीं। लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने इसी बात को ध्यान में रखकर ज्यादा मेहनत करने की जरूरत महसूस नहीं की। यही नहीं चुनाव से कुछ महीने पहले वह जनपदों में जाने की जगह सिर्फ जातिगत आंकड़ों की रणनीति बनाने में जुटी रहीं। उनको लगता था कि जातिगत आधार पर प्रत्याशी खड़ा करने से उन्हें सफलता मिल जायेगी। अब तक होता भी यही था। मगर इस बार के चुनाव ने सबसे ज्यादा नुकसान बसपा को ही पहुंचा दिया। लोकसभा चुनाव के नतीजों ने मायावती को एहसास करा दिया कि उनके जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा अब शुरू होने जा रही है। बीस साल में दलित वोट बैंक में इतना अविश्वास कभी नहीं हुआ। मुस्लिम मतदाताओं ने भी बसपा पर भरोसा नहीं किया। जब दलित मतदाता ही बसपा को वोट नहीं दे रहे थे तब बाकी मतदाताओं ने भी बसपा में ज्यादा रुचि नहीं दिखायी और बसपा लोकसभा में अपना खाता तक नहीं खोल सकी। चुनाव नतीजों के बाद मायावती को समझ आ गया कि उन्हें जमीनी स्तर पर उतरकर संघर्ष करना होगा और फिर से अपनी ताकत बढ़ानी होगी। यही कारण रहा कि बदायूं में दो किशोरियों के बलात्कार और उसके बाद उनकी हत्या के मामले में न सिर्फ मायावती ने घटना स्थल का दौरा किया बल्कि पीड़ित को मदद न दिये जाने एवं उसे आतंकित किये जाने की स्थिति में उस पेड़ के नीचे ही बैठने का ऐलान कर दिया जहां बच्चियों को लटकाया गया था।
मगर सब कुछ इतना आसान नहीं है। जातियों के टूटे हुए भरोसे को फिर से कायम करना मुश्किल भरा काम है। कांग्रेस के विधान परिषद सदस्य नसीब पठान का कहना है कि मायावती तो पहले ही कह रही थीं कि उन्हें मुस्लिम वोट नहीं देते हैं। इस बार मुस्लिमों ने वोट वास्तव में नहीं दिया जिससे उनकी हालत खराब हो गयी। उनका मानना है कि दलित-मुस्लिम और ब्राह्मण वास्तव में कांग्रेस का ही वोट बैंक रहा है। कांग्रेस की स्थिति बिगडने के बाद यह वोट बैंक काफी हद तक बसपा की तरफ चला गया था। मगर अब कांग्रेस हर हालत में इस वोट बैंक को अपने साथ जोड़ेगी।
भाजपा प्रवक्ता मनीष शुक्ला का मानना है कि दलितों ने यह बात बहुत प्रमुखता के साथ समझ ली थी कि प्रदेश में मायावती के सत्ता में रहते हुए भी उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ था। मायावती खुद तो दौलत बटोरने में लगी रहीं जबकि दलित और गरीब होता चला गया। उनका मानना है कि मायावती लगातार कांग्रेस को समर्थन देती चली गयीं उन्हें इसका भी खामियाजा भुगतना पड़ा क्योंकि लोग कांग्रेस को अच्छी तरह पहचान गये थे। उन्होंने कहा कि दलित भलीभांति जान गया है कि उसका हित भाजपा के साथ ही सुरक्षित है इसलिए अब वह बसपा की तरफ जाने वाला नहीं है।
नवभारत टाइम्स के संपादक सुधीर मिश्रा का भी मानना है कि मायावती को अपना वोट बैंक हासिल करना लोहे के चने चबाने जैसा है। उनका कहना है कि पिछले बीस सालों से क्षेत्रीय दलों के उभार ने प्रदेश को विकास के मामले में बहुत पीछे धकेल दिया है। अब लोग विकास की बात करना चाहते हैं लिहाजा जाति पर आधारित राजनीति कमजोर हो रही है और यह मायावती के लिए बेहद चुनौती भरी बात है।
फोकस टीवी के स्टेट हेड ज्ञानेन्द्र शुक्ला भी मानते हैं कि बसपा सुप्रीमो मायावती के लिए आने वाला समय बेहद मुश्किल भरा है। जिस तरह से दलित समाज उनसे अलग हुआ है यह उनके लिए चिंता की बात है। पत्रकार और चिंतक अमलेन्दु उपाध्याय का भी मानना है कि मायावती को जमीनी स्तर पर बहुत काम करना पड़ेगा वरना वह राजनीति के बियाबान में कहीं गुम हो जायेंगी।
जाहिर है बसपा नेत्री को जहां एक ओर प्रदेश सरकार से दो-दो हाथ करने हैं वहीं अपना वोट बैंक को सहेज कर रखना है। अगर मायावती इसमें कामयाब हो जाती हैं तो एक बार फिर सत्ता की चाभी उन्हें मिल सकती है वरना उन्हें और उनकी पार्टी को अपने सबसे बुरे दौर का सामना करना पड़ सकता है।
संजय शर्मा, लेखक वीक एंड टाइम्स के सम्पादक हैं