मूलतः एक हिन्दू साम्प्रदायिक राजनेता ही रहे अटल
मूलतः एक हिन्दू साम्प्रदायिक राजनेता ही रहे अटल
अटल ’’जी’’ और भारत रत्न
यह सही है कि यदि आज के हिन्दू साम्प्रदायिक नेताओं के भाषणों और तौर-तरीकों को देखा जाए, तो उनके पूर्ववर्ती नेता श्री अटल बिहारी वाजपेई एक उदार व सहिष्णु राजनेता नजर आ सकते हैं। यही कारण है कि श्री वाजपेई को भारत रत्न से अलंकृत किए जाने पर लगभग सभी ने इसे प्रशंसात्मक ढंग से देखा है। लेकिन बात इतनी आसान भी नहीं है।
यह तथ्य है कि श्री वाजपेई अपने लम्बे राजनैतिक जीवन में हमेशा हिन्दू फासिस्ट संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एवं उसके राजनीतिक पटल से जुड़े रहे और उन्होंने उसी के बैनर तले सारी राजनीति की। इसलिए जो लोग साम्प्रदायिकता को भारत के लिए अभी भी एक बड़ा खतरा मानते हों, वह इस तथ्य को कैसे नजरंदाज कर सकते हैं कि श्री वाजपेई हमेशा मूलतः एक हिन्दू साम्प्रदायिक राजनेता ही रहे और उन्होंने कभी अपनी इस भूमिका पर कोई प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया।
सवाल यह है कि आखिर फिर क्यों श्री वाजपेई अन्य साम्प्रदायिक नेताओं से अलग एक प्रखर राजनेता के रूप में स्वयं को लगभग निर्विवाद रूप से स्थापित कर सके। इस लेख का विषय इसी प्रश्न की पड़ताल करना है।
श्री वाजपेई की एक प्रमुख पहचान, जो हिन्दी भाषी क्षेत्रों में मानी जाती रही है, वह उनकी मोहक भाषण कला व वक्तव्य शैली है। जिन लोगों ने उन्हें कभी सुना, वो इस बात की ताकीद करते हैं और इससे इनकार नहीं किया जा सकता। परन्तु राजनीति मात्र शब्दों का जाल नहीं होती। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि कोई राजनेता अपने भाषणों और वक्तव्यों से किस विचारधारा के हक में बयार चलाना चाहता है। यदि इस दृष्टि से श्री वाजपेई की वक्तव्य कला को देखें, तो समझ सकते हैं कि उन्होंने अपनी इस क्षमता का उपयोग मूलतः हिन्दू साम्प्रदायिकता को पढ़े-लिखे वर्ग के जहन में उतारने के लिए इस्तेमाल किया और बहुत ही सूक्ष्म तरीके से उसे हिन्दी भाषी समाज में एक स्वीकार्य तथ्य बनाया। उनकी भाषा शैली और शब्द चयन में एक हिन्दी कवि सम्मेलनीय रूझान और लयबद्धता थी, जिसमें एक ओर तो श्रोता को उसके स्वयं के तार्किक विवेक को स्थगित करते हुए अपने साथ वहां ले जाने की क्षमता थी, वहीं दूसरी ओर बिना कोई ठोस विचार व्यक्त किए मनोरंजनवादी राजनीतिक भाषा का इस्तेमाल था। चुटीली टीका-टिप्पणी, हास्य व्यंग्य के छींटे, आवाज का उतार-चढ़ाव सब कुछ हिन्दी मंचीय तुकबन्दी वाली कविता शैली सा था। कथ्य के रूप में श्री वाजपेई मुख्य रूप से अन्ध कांग्रेस विरोध, प्राचीन भारत के गौरव, ’’हिन्दू’’ संस्कृति का सर्वस्ववादी महात्म्य मुस्लिम समुदाय के प्रति अप्रत्यक्ष हीनताबोध या प्रत्यक्ष उदासीनता व असंवेदनशीलता जैसे बिन्दु उठाते रहे और उन्हें अपनी विशिष्ट शैली से जनमानस के भीतर पहुंचाने में बहुत कामयाब भी रहे। ज्यों-ज्यों हिन्दी भाषी समाज में हिन्दू साम्प्रदायिकता तमाम रूप में विचार के स्तर पर सहज स्वीकार्य होती गई, उसी क्रम में श्री वाजपेई की व्यक्तिगत लोकप्रियता भी बढ़ती गई।
यह भी कह सकते हैं कि श्री वाजपेई की अभूतपूर्व लोकप्रियता का रहस्य उनके द्वारा आम जनता की मुहावरेदार भाषा में बोलना भी था। कांग्रेस एक सत्ताधारी पार्टी होती जा रही थी और उसका सांगठनिक ढ़ांचा धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जा रहा था। कांग्रेस के पास राज्य स्तर पर ऐसे प्रभावी नेताओं की कमी होती जा रही थी, जो कि साम्प्रदायिकता, जातिवाद जैसे राजनीतिक विचारों की गहन समीक्षा कर सकते और आम जनमानस को इन खतरों से आगाह करने वाली आम बोलचाल की राजनीतिक भाषा निर्मित कर सकते। एक अकेले नेहरू क्या-क्या कर सकते थे। आजादी के बाद भारत निर्माण के महायज्ञ में तो नेहरू बहुत हद तक कामयाब रहे और भारत राष्ट्र की एक मजबूत बुनियाद बनी, लेकिन, नेहरू में राजनैतिक संगठनात्मक क्षमता का अभाव था। चूंकि कांग्रेस के पास भारत की आजादी की लड़ाई की विरासत थी और नेहरू पूरे राष्ट्र में सबसे लोकप्रिय नेता भी थे, इसलिए कांग्रेस की चुनावी नैया तो पार होती रही, लेकिन संगठन के स्तर पर कांग्रेस कमजोर पड़ती गई। यह देश का दुर्भाग्य था कि आजादी के बाद लोहिया के नेतृत्व में समाजवादी आन्दोलन मुख्यतः गैर-कांग्रेसवाद की धारणा से संचालित रहा। इन सारी परिस्थितियों में साम्प्रदायिक विचारधारा को एक खुला मैदान सा मिला गया और एक पिछड़ी, प्रतिक्रियात्मक, सांस्कृतिक अवधारणाओं के दम पर हिन्दू साम्प्रदायिकता शनैः शनैः अपनी जड़ें पकड़ती रही। श्री वाजपेई इस साम्प्रदायिक फसल को एक छद्म उदारवादी आवरण के तले फैलाने में मुख्य किरदार बने। 1967 से इस हिन्दू साम्प्रदायिक संगठनों का इस्तेमाल समाजवादी संगठनों ने भी किया। इसका यह आशय नहीं कि समाजवादी चेतना सम्पन्न राजनेता व बुद्धिजीवी साम्प्रदायिकता के खतरों से वाकिफ न थे, बल्कि चुनावी राजनीति की विवशताओं और कांग्रेस के विरूद्ध एक संयुक्त मोर्चे की जरूरत समझने के कारण इस प्रकार की राजनीतिक भूलें हुईं। कांग्रेस भी अपने स्वरूप में एक अहमवादी पार्टी में परिवर्तित होती जा रही थी, जिस कारण से इसमें स्वतंत्र चेतना सम्पन्न समाजवादी विचारधारा के लोगों के लिए जगह कम पड़ती गई। इन सारी राजनीतिक परिस्थितियों ने वह जमीन तैयार की, जिसमें श्री वाजपेई का साम्प्रदायिक चेहरा लोगों के जेहन से गौण होने लगा और उनकी एक उदात्त छवि निर्मित हुई, जो कि आर0एस0एस0 के छद्म स्वरूप के अनुकूल भी थी।
साम्प्रदायिक राजनीति हमेशा एक ही गति से नहीं चलती। चूंकि इसकी बुनियाद मूलतः झूठ पर होती है, इसलिए साम्प्रदायिक नेता हमेशा आशंकित रहते हैं कि कहीं आम जनता उनके खेल को समझ न जाए और उनसे हमेशा के लिए नाता तोड़ ले। इसीलिए इसमें उदारवादी नरम साम्प्रदायिकता और जरूरत अनुसार उग्र हिंसक साम्प्रदायिकता का सामंजस्य बनाए रखा जाता है। 1925 में आर0एस0एस0 की स्थापना हुई और हिन्दू साम्प्रदायिकता के तमाम प्रयासों के बावजूद आज तक भारतीय समाज को पूर्णतः एक साम्प्रदायिक समाज में बदलने में यह असफल रही है। चूंकि आजादी के बाद भारतीय राज्य, उसके तमाम उपादान अभी भी धर्म निरपेक्ष प्रतिबद्धता से जुड़े हुए हैं, इसीलिए हिन्दू साम्प्रदायिकता अभी भी ज्यादातर जोर नरमपंथी (आसानी से न समझ आने वाली) साम्प्रदायिकता पर देती है, ताकि लिबरल सोच वाले लोगों को भी भरमाए रख सके। इस किरदार के लिए श्री वाजपेई एक सबसे उपयुक्त व्यक्ति आर0एस0एस0 के लिए रहे। बल्कि यह भी कह सकते हैं कि रणनीतिक तौर पर श्री वाजपेई ने स्वयं जानबूझ कर अपनी इस छवि को बनाया और इस तरह से हिन्दू साम्प्रदायिकता के विस्तार में ऐतिहासिक योगदान भी किया।
हिन्दी समाज और मुख्य रूप से आर0एस0एस0 की चेतना में सवर्ण जातीय चेतना का गहरे तक समावेश रहा है। जाति विरोधी आन्दोलनों की भी कमी नहीं रही, लेकिन किसी दृष्टि के अभाव में जाति विरोधी आन्दोलनों की भी परिणति मात्र जातीय एकजुटता आन्दोलनों में ही हुई है। चूंकि श्री वाजपेई एक सवर्ण जाति से थे और आर0एस0एस0 में ब्राह्मण वर्चस्व की एक परम्परा रही है, इसका भी राजनैतिक फायदा श्री वाजपेई को मिला।
अन्त में कह सकते हैं कि वास्तव में केन्द्र सरकार ने श्री अटल बिहारी वाजपेई को भारत रत्न से नवाज कर हिन्दू साम्प्रदायिक राजनीति की उस जमीन को सम्मानित किया है, जिसको बनाने में श्री वाजपेई ने अपना सारा राजनीतिक जीवन लगाया।
आलोक वाजपेयी


